क्षेत्रीय समाचार

पत्रकार व स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बहुगुणा को श्रद्धापूर्वक किया गया स्मरण


गोपेश्वर से महिपाल गुसाईं की रिपोर्ट
महान स्वतंत्रता सेनानी और उत्तराखंड के गौरव, मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय रामप्रसाद बहुगुणा को उनकी 37वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया गया। रामप्रसाद बहुगुणा उन विरले स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे, जिन्होंने बहुत कम उम्र में ही आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
आठवीं कक्षा में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता चुन लिया था। उस समय चमोली गढ़वाल जिले का हिस्सा था और इसे अपर गढ़वाल के नाम से जाना जाता था। स्व. बहुगुणा अपर गढ़वाल के पहले संपादक रहे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अपनी कलम को हथियार बनाया और आज़ादी के बाद जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को और अधिक सशक्त ढंग से उठाया।
उन्होंने सर्वप्रथम हस्तलिखित समाचार पत्र ‘समाज’ का संपादन किया और वर्ष 1953 में स्वयं का प्रिंटिंग प्रेस स्थापित कर साप्ताहिक ‘देवभूमि’ का गौरवशाली प्रकाशन आरंभ किया। उस दौर में जब क्षेत्र से कोई समाचार पत्र प्रकाशित नहीं होता था, यह प्रयास अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। वे न केवल अख़बार वितरित करते थे, बल्कि कम पढ़े-लिखे लोगों को स्वयं पढ़कर सुनाया भी करते थे।
रामप्रसाद बहुगुणा सांस्कृतिक गतिविधियों में भी समान रूप से सक्रिय रहे। नंदप्रयाग की रामलीला में उनके द्वारा प्रस्तुत संपूर्ण रामायण के प्रसंग आज भी लोगों को स्मरण हैं। वृद्धावस्था में भी वे अद्भुत ऊर्जा के साथ नृत्य और अभिनय के माध्यम से रामलीला के प्रसंगों को जीवंत कर देते थे।
20 दिसंबर 1920 को नंदप्रयाग की पावन भूमि पर जन्मे रामप्रसाद बहुगुणा के पिता श्री गोपाल दत्त बहुगुणा और माता श्रीमती राघवी देवी थीं। मात्र डेढ़ वर्ष की आयु में माता का साया सिर से उठ गया और 14 वर्ष की उम्र में पिता का भी निधन हो गया। इसके बाद उन्हें अपने चाचा, प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी ‘गढ़केसरी’ अनुसूया प्रसाद बहुगुणा का संरक्षण प्राप्त हुआ, जिनके पदचिन्हों पर चलते हुए उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अतुलनीय योगदान दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन को धार देने और जनचेतना जागृत करने के उद्देश्य से वे उस समय की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन करने लगे। उनके लेखों में देशभक्ति की भावना और स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा स्पष्ट रूप से झलकती थी।
आज से 37 वर्ष पूर्व यह देशभक्त योद्धा इस नश्वर संसार से विदा हो गया, लेकिन अपनी लेखनी, विचारों और सामाजिक योगदान के माध्यम से वह लोकसमाज में अमिट छाप छोड़ गया है।

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