न्यायमूर्ति केशव चंद्र धूलिया स्मृति व्याख्यान एवं निबंध एवं मूट कोर्ट प्रतियोगिता 26 नवम्बर को

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देहरादून, 30 सितम्बर। उत्तराखण्ड की पत्रकारिता की बुनियाद के स्तंभ और सरकार द्वारा स्वतंत्रता सेनानी घोषित अखबार कर्मभूमि के नाम से स्थापित ‘‘कर्मभूमि फाउंडेशन उत्तराखंड’’ ने आगामी 26 नवम्बर को संविधान दिवस के अवसर पर अपना वार्षिकसमारोह मानाने का निर्णय लिया है। जिसमें न्यायमूर्ति केशव चन्द्र धूलिया की समृति में ’’न्यायमूर्ति केशव चंद्र धूलिया स्मृति व्याख्यान एवं निबंध तथा मूट कोर्ट प्रतियोगिता का आयोजन किया जायेगा। प्रतियोगिता में विजयी प्रतिभागियों को उचित पारितोषक दिया जायेगा। इस अवसर पर कानून के जानकार एवं संविधान विशेषज्ञ व्याख्यान देंगे एवम् पुरस्कार वितरण करेंगे।
इस प्रतियोगिता में उत्तराखंड के कानून के छात्र और कानूनी शिक्षा डिग्री प्राप्त छात्र हिस्सा ले सकेंगे। कार्यक्रम का आयोजन देहरादून में होगा। प्रतियोगिता के नियम और अन्य जानकारी शीघ्र उपलब्ध होगी। कर्मभूमि फाउंडेशन इसी वर्ष फरवरी में उत्तराखंड में स्थापित हुआ और फाउंडेशन ने अपना पहला कार्यक्रम ‘‘पंडित भैरव दत धूलिया पत्रकार पुरस्कार’’ 18 मई को आयोजित किया।
जीवन परिचय
न्याय मूर्ति केशव चंद्र धूलिया का जन्म 10 मार्च से 1928 को पौड़ी जिले के मदनपुर ग्राम में एक संपन्न पुरोहितों के परिवार में हुआ था। पिता पंडित भैरव दत्त धुलिया एक जाने माने स्वतंत्रता सेनानी एवं मूर्धन्य पत्रकार थे। उनकी प्राइमरी शिक्षा गांव के समीप बनकंडी स्कूल में हुई। इसके पश्चात वह आगे की शिक्षा के लिए डाडामंडी के मटयाली स्कूल में दाखिले के लिए गये पर क्योंकि उनके पिता एक स्वतंत्रता सेनानी थे तो प्रिंसिपल ने दाखिले से इनकार कर दिया और उन्हें अन्य आसपास के स्कूलों ने भी दाखिला नहीं मिला। लेकिन केशव चलते गए और फिर चेलुसैन, पौड़ी जिला के ईसाई मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर मिस्टर पीटर ने उन्हें दाखिला दिया।
भारत की आजादी के बाद जब उनके पिता जेल से रिहा हुए तब उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की और बी ए. एम. ए. (अर्थशास्त्र) और कानून की शिक्षा की डिग्री ग्रहण की। इस दौरान उनका संपर्क उस दौर के कई उच्च श्रेणि के शिक्षकों एवम स्वतंत्रता सेनानियों से हुआ और उन्होंने उन्हें प्रभावित किया। वह खुद एक सक्रिय छात्र नेता थे और नये भारत में छात्रों की आकांक्षाओं और समस्याओं को लेकर आगे रहते थे। इसके उपरांत वह लैंसडाउन गढ़वाल वापस आ कर वकालत करने के साथ ही अपने पिता के साप्ताहिक अखबार कर्मभूमि में हाथ बंटाने लगे। लेकिन विवाह और परिवारिक जिम्मेदारियां उन्हें इलाहाबाद खींच ले आई। वह इलाहाबाद सन् 1965 में एक छोटे लोहे के ट्रंक के साथ आये और वहां कई वर्षों तक संघर्ष किया। इन सीमित परिस्थितियों में भी वह अपने गढ़वाल के लोगों के कई मसलों के समाधान के लिए शिक्षा विभाग, एजी ऑफिस, बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में जाया करते और पत्र द्वारा सबको सूचित करते थे।
वह हाई कोर्ट इलाहाबाद के ‘‘चीफ स्टैंडिंग कौंसिल’’ नियुक्त हुए और बाद में जज नियुक्त हुये। दिल का दौरा पड़ने से 15 जनवरी 1985 को अकस्मात उनकी मृत्यु से उनके परिवार, मित्र और सहयोगियों की गहरा सदमा पहुंचा। वह एक सजग और खुले विचार के व्यक्ति थे जिन्होंने विपरीत परस्थितियों के बावजूद एक मुकाम हासिल किया। उन्होंने बतौर जज कई महत्वपूर्ण फैसले दिये। वह मुकदमों को जल्दी निपटाने में निपुण थे। वह दूसरे व्यक्ति थे जो कि गढ़वाल से हाइकोर्ट के जज बने थे। वह पहले गढ़वाली वकील थे जो उस मुकाम तक पहुंचे। वह एक ईमानदार, सच्चे थे जो कमजोर और मजलूमों के हिमायती थे।
