लालढांग-चिल्लरखाल सड़क को केंद्र की मंजूरी, अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी निगाहें
–उषा रावत द्वारा-
सामरिक और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए अहम
यह सड़क न केवल हरिद्वार और पौड़ी जिले के बीच की दूरी को कम करेगी, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के बिजनौर क्षेत्र से होकर गुजरने वाले लंबे रास्ते का एक मजबूत विकल्प भी प्रदान करेगी। राज्य सरकार लंबे समय से तर्क दे रही है कि यह मार्ग स्थानीय निवासियों के लिए जीवन रेखा साबित होगा और आपातकालीन स्थिति में गढ़वाल के लिए सीधा संपर्क मार्ग बनेगा।
पर्यावरण बनाम विकास का संघर्ष
यह सड़क परियोजना पिछले कई वर्षों से कानूनी दांव-पेंच में फंसी हुई थी। मुख्य विवाद इसके 11.5 किलोमीटर के उस हिस्से को लेकर है जो हाथियों और बाघों के आवागमन के लिए प्रसिद्ध ‘कोरिडॉर’ के बीच से गुजरता है।
-
पर्यावरणविदों का तर्क: पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पक्की सड़क बनने और ट्रैफिक बढ़ने से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में खलल पड़ेगा और दुर्घटनाएं बढ़ेंगी।
-
सरकार का पक्ष: सरकार का कहना है कि यह नया निर्माण नहीं, बल्कि पुराने कच्चे मार्ग का सुदृढ़ीकरण है।
NBWL की शर्तें और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाली NBWL की समिति ने इस परियोजना को कुछ सख्त सुरक्षा मानकों के साथ मंजूरी दी है। रिपोर्ट के अनुसार:
-
वन्यजीवों के निर्बाध आवागमन के लिए सड़क पर अंडरपास (Underpass) का निर्माण अनिवार्य होगा।
-
वाहन की गति सीमा और रात के समय आवागमन को लेकर कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं।
-
क्योंकि मामला पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए NBWL के इस फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) पहले इस प्रोजेक्ट पर अपनी आपत्ति जता चुकी है। अब बोर्ड की मंजूरी मिलने के बाद, राज्य सरकार शीर्ष अदालत में अपनी दलीलें मजबूती से रखेगी। यदि सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिल जाती है, तो इस सड़क का काम जल्द शुरू हो सकेगा, जिससे कोटद्वार और हरिद्वार के बीच का सफर बेहद आसान संवाददा
