प्रो. मंजुला जैन बोलीं, अछूत की भावना से बड़ी नहीं कोई बीमारी

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खास बातें

  • बापू ने शिद्दत से महसूस कराया, कुष्ठ रोग छूत का रोग नहीं
  • हमने कोरोना काल में अनवांटेड फीलिंग को बहुत करीब से देखा
  • समाज को अपनी सोच बदलने की दरकार: आफताब पाशा

 

    –प्रो. श्याम सुंदर भाटिया

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की एसोसिएट डीन प्रो. मजुंला जैन ने बतौर मुख्य अतिथि कहा, कुष्ठ रोग इतना भयानक नहीं है, जितनी इससे जुड़ी भ्रान्तियाँ हैं। अछूत और अवान्छित होने की भावना से बड़ी कोई बीमारी नहीं है। उन्होंने बताया, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने संसार को दिखाया कि कुष्ठ रोग छूत का रोग नहीं है। उन्होंने वर्धा में कुष्ठ आश्रम की स्थापना की, जहाँ वे स्वयं कुष्ठ रोगियों की सेवा किया करते थे। प्रो. मंजुला कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के मेडिकल लैब टेक्नीशियन विभाग की ओर से कुष्ठ रोग, भ्राँति तोड़ो, जागरूकता लाओ पर आयोजित वर्कशाॅप में बोल रहीं थी। इससे पूर्व माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित करके वर्कशाॅप का शंखनाद हुआ। इस मौके पर सासाकावा- इण्डिया कुष्ठ फाउण्डेशन, दिल्ली के मैनेजर श्री आफताब पाशा और सासाकावा- इण्डिया कुष्ठ फाउण्डेशन के प्रतिनिधि तन्जील खान बतौर गेस्ट ऑफ ऑनर के संग-संग कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल के उप प्राचार्य डॉ. नवनीत कुमार, मेडिकल लैब टेक्नीशियन विभाग की एचओडी डॉ. रूचिकांत आदि की गरिमामयी मौजूदगी रही। इनके अलावा डॉ. अर्चना जैन, फॉरेन्सिक विभाग के एचओडी श्री रवि कुमार, फैकल्टी श्री मनोज दडवाल, श्रीमती शिखा पालीवाल आदि भी उपस्थित रहे।

बतौर मुख्य अतिथि प्रो. मंजुला जैन ने भारत रत्न अवार्ड से पुरस्कृत एवं नामचीन समाजसेवी मदर टेरेसा का स्मरण करते हुए कहा, उन्होंने अपना पूरा जीवन ऐसे रोगियों को ही समर्पित कर दिया था। डॉ. जैन ने अनवांटेड फीलिंग को परिभाषित करते हुए कहा, पिछले दो वर्षों के कोरोना काल में हम सभी ने इसे बहुत करीब से देखा है। उन्होंने कहा, कुष्ठरोग से उतने लोग नहीं मर रहे हैं, जितने इस बात से मर रहे हैं कि यह एक अछूत बीमारी है। यह भ्रम लोगों के दिमाग से निकालना है। बतौर गेस्ट ऑफ ऑनर श्री आफताब पाशा ने कहा, यूं तो कुष्ठ रोग हजारों साल पुराना है, लेकिन इसका उपचार करीब सौ वर्ष पूर्व आया है। यह रोग मनुष्य के अंगों को विकृत और कुरूप कर देता है। इसी के चलते लोग कुष्ठ रोगियों से घृणा और परहेज करने लगते हैं। इतना ही नहीं, इस रोग को गाली, श्राप, और पापों का फल जैसी संज्ञाएं दे दी जाती हैं। कुष्ठ रोगी को समाज से बिल्कुल पृथक कर दिया जाता है। उसका मंदिर या पब्लिक प्लेस पर प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है। मौलिक अधिकार जैसे शिक्षा, रोजगार आदि से भी वंचित कर दिया जाता है। इसका बैक्टीरिया इतना कमजोर होता है कि 99 प्रतिशत लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता है, लेकिन एक प्रतिशत लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता अति दुर्बल होने के कारण इसके शिकार हो जाते हैं। उन्होंने एक जानी-मानी अभिनेत्री का उल्लेख करते हुए कहा, उन्हें युवावस्था में यह रोग हो गया था, लेकिन 2018 में यानी 50 वर्ष बाद स्वीकार किया कि उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने कहा, समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। श्री तन्जील खान ने फाउण्डेशन के बारे में विस्तार से जानकारी दी। अंत में एमएलटी की सीनियर फैकल्टी डॉ. अर्चना जैन ने सभी का शुक्रिया अदा किया। इससे पूर्व अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। वर्कशॉप में एमएलटी के प्रथम एवं तृतीय सेम के करीब 120 छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। वर्कशॉप में फैकल्टी  श्री आकाश चैहान, श्री सागर देवनाथ, श्री देवेन्द्र सिंह, मिस विवेचना देवरा, श्री हिमांशु यादव भी उपस्थित रहे।

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