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हमला ईरान पर और बोझ भारतीय रसोई पर ; महँगी हो गयी गैस

उषा रावत

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में पश्चिम एशिया के देशों के मध्य गहराता सैन्य और कूटनीतिक तनाव केवल मानचित्र की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत के सामान्य जनजीवन की थाली और रसोई तक पहुँच गया है। अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाजार में आई अचानक अस्थिरता के परिणामस्वरूप भारत में घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में 60 रुपये प्रति सिलेंडर की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति उस समय उत्पन्न हुई है जब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे सामरिक मार्गों पर बढ़ते खतरों के कारण बाधित हो रही है। हालांकि, सरकार ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा है, जिससे परिवहन क्षेत्र को तात्कालिक राहत मिली है, किंतु रसोई गैस के बढ़ते दाम मध्यम और निम्न आय वर्ग के बजट को प्रभावित करने लगे हैं।

मूल्य वृद्धि का गणित और आमजन पर पड़ता प्रभाव

सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि दिल्ली जैसे महानगरों में बिना सब्सिडी वाले 14.2 किलोग्राम के सिलेंडर की कीमत अब 913 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गई है। पिछले 11 महीनों के भीतर यह दूसरी बड़ी बढ़ोतरी है, जो मुद्रास्फीति के दबाव को और तीव्र करती है। विशेष रूप से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के 10 करोड़ से अधिक लाभार्थियों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि 300 रुपये की प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) सब्सिडी के उपरांत भी उन्हें अब प्रति सिलेंडर लगभग 613 रुपये का भुगतान करना होगा। हालांकि आधिकारिक तर्क यह है कि भारत में गैस की कीमतें पड़ोसी मुल्कों जैसे श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान की तुलना में अब भी नियंत्रित हैं, जहाँ कीमतें 1000 से 1200 रुपये के मध्य झूल रही हैं, फिर भी भारतीय घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए यह एक अतिरिक्त वित्तीय बोझ है।

व्यावसायिक क्षेत्रों में बढ़ती लागत और सेवा क्षेत्र की चुनौतियाँ

घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ सूक्ष्म और लघु उद्यमों, विशेषकर खाद्य सेवा क्षेत्र पर भी इस मूल्य वृद्धि की गाज गिरी है। होटल, रेस्तरां और ढाबों में प्रयुक्त होने वाले 19 किलोग्राम के व्यावसायिक सिलेंडर की कीमतों में 114.5 रुपये का इजाफा होने से इसकी कीमत 1883 रुपये तक जा पहुँची है। वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों से अब तक व्यावसायिक गैस की कीमतों में कुल 300 रुपये से अधिक की संचयी वृद्धि हो चुकी है। इसका सीधा असर खाद्य पदार्थों की खुदरा कीमतों पर पड़ना तय है, क्योंकि संचालक अपनी बढ़ी हुई इनपुट लागत का बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर ही डालेंगे। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यावसायिक ईंधन इसी दर से महंगा होता रहा, तो सेवा क्षेत्र में छंटनी या गुणवत्ता से समझौते जैसी स्थितियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।

तेल विपणन कंपनियों की रणनीति और ईंधन स्थिरता का रहस्य

एक ओर जहाँ गैस की कीमतें बढ़ रही हैं, वहीं पेट्रोल और डीजल के दामों का स्थिर रहना एक पहेली के समान प्रतीत होता है। सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख तेल विपणन कंपनियों (OMCs)—जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम—ने अपनी बैलेंस शीट के सुदृढ़ीकरण और पिछले त्रैमास में अर्जित लाभ के आधार पर इस अंतरराष्ट्रीय उछाल का भार स्वयं वहन करने का निर्णय लिया है। यह एक रणनीतिक कदम है ताकि देश में माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन की लागत न बढ़े, जिससे थोक मूल्य सूचकांक (WPI) को नियंत्रण में रखा जा सके। परंतु, यह स्थिरता स्थायी नहीं कही जा सकती; यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमतें 93-95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर लंबे समय तक टिकी रहती हैं, तो घरेलू बाजार में भी ईंधन की कीमतों में संशोधन अनिवार्य हो जाएगा।

पश्चिम एशिया का संकट और वैश्विक आपूर्ति का गतिरोध

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में इस उथल-पुथल का मूल कारण पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में छिपा है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘ऑयल चोकपॉइंट’ है, जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में सैन्य सक्रियता बढ़ने से टैंकरों के बीमा प्रीमियम और परिवहन जोखिम में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अमेरिकी कच्चे तेल (WTI) और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में दशकों की सबसे तेज साप्ताहिक वृद्धि देखी जा रही है। इसके अतिरिक्त, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की कीमतें एशियाई बाजारों में 25 डॉलर प्रति MMbtu तक पहुँच गई हैं, जो गैस आधारित अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम और भविष्य की राह

भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जो हमें वैश्विक अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाता है। वर्तमान संकट यह रेखांकित करता है कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय विविधीकरण की दिशा में और तेजी से बढ़ना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा (सौर और पवन), हरित हाइड्रोजन मिशन और इथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) जैसे कार्यक्रम अब केवल पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता बन चुके हैं। दीर्घकालिक समाधान के रूप में भारत को अपनी सामरिक पेट्रोलियम आरक्षित (Strategic Petroleum Reserves) क्षमता को बढ़ाना होगा ताकि भविष्य में ऐसे भू-राजनीतिक झटकों के समय घरेलू कीमतों को झटके से बचाया जा सके। अंततः, रसोई गैस की यह बढ़ती कीमतें हमें याद दिलाती हैं कि एक वैश्वीकृत दुनिया में किसी एक कोने का संघर्ष हर घर के चूल्हे की आंच को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।


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