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पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में बड़ी कटौती, कीमतों में राहत नहीं बल्कि स्थिरता पर जोर

 

नई दिल्ली, 28 मार्च। केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर तक की कटौती कर एक बड़ा निर्णय लिया है। वित्त मंत्रालय द्वारा 26 मार्च की रात जारी अधिसूचना के अनुसार, यह कदम वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में तनाव के बीच घरेलू बाजार को स्थिर रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।

कर संरचना में बदलाव के तहत पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को ₹13 प्रति लीटर से घटाकर ₹3 प्रति लीटर कर दिया गया है, जबकि डीजल पर ₹10 प्रति लीटर का यह शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। इस कटौती के बाद पेट्रोल पर कुल केंद्रीय उत्पाद शुल्क घटकर ₹11.90 प्रति लीटर और डीजल पर ₹7.80 प्रति लीटर रह गया है।
हालांकि, इस कटौती के बावजूद आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बड़ी राहत मिलने की संभावना नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सरकारी तेल विपणन कंपनियां—इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल—पिछले कई सप्ताह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 149 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने के बावजूद घरेलू कीमतों को स्थिर बनाए हुए थीं। इस दौरान कंपनियां पेट्रोल पर करीब ₹24 और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का घाटा झेल रही थीं। ऐसे में यह कर कटौती मुख्य रूप से कंपनियों के घाटे की भरपाई के लिए की गई है।
सरकार के इस कदम का उद्देश्य कीमतों में सीधी कमी करना नहीं, बल्कि संभावित बढ़ोतरी को रोकना है। यदि यह कटौती नहीं होती, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹10 से ₹15 प्रति लीटर तक की वृद्धि हो सकती थी। निजी क्षेत्र की कंपनियों, जैसे नायरा एनर्जी, द्वारा हाल में ₹3 से ₹5 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी ने भी बाजार में दबाव बढ़ाया था।
इस फैसले का असर सरकारी खजाने पर भी पड़ेगा। अनुमान है कि इस कटौती से केंद्र सरकार को सालाना ₹1.5 लाख करोड़ से ₹1.75 लाख करोड़ तक के राजस्व का नुकसान हो सकता है। इस घाटे की भरपाई के लिए सरकार ने डीजल के निर्यात पर ₹21.5 प्रति लीटर और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पर ₹29.5 प्रति लीटर का निर्यात शुल्क लगाया है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह निर्णय उस समय आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान-इजराइल तनाव के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। सरकार का लक्ष्य घरेलू स्तर पर ईंधन की उपलब्धता बनाए रखना और महंगाई पर नियंत्रण रखना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत तभी मिलेगी, जब राज्य सरकारें भी वैट में कटौती करें। फिलहाल पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमतें राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले वैट पर निर्भर बनी

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