मार्च में ही अप्रैल जैसी गर्मी, समय से पहले आम की बौर; जल स्रोतों पर दिखने लगा असर
– दिग्पाल गुसाईं की रिपोर्ट-
गौचर, 12 मार्च। लंबे समय से क्षेत्र में बारिश न होने के कारण मार्च माह में ही अप्रैल जैसी गर्मी का एहसास होने लगा है। मौसम में आए इस बदलाव का असर प्रकृति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। समय से पहले आम के पेड़ों में बौर आ गई है, जबकि गर्मी का प्रभाव अब जल स्रोतों पर भी पड़ने लगा है।
पहले नवंबर माह से शीतकालीन मौसम शुरू होते ही बारिश का दौर शुरू हो जाता था और पहाड़ों में बर्फबारी भी होने लगती थी। यह सिलसिला सामान्यतः फरवरी तक जारी रहता था, जिससे ऊंचाई वाली पहाड़ियां बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती थीं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मौसम चक्र में आए बदलाव के कारण शीतकालीन वर्षा में लगातार कमी देखी जा रही है। इस वर्ष भी जाड़ों में अपेक्षित बारिश और बर्फबारी नहीं हो सकी। नतीजतन ऊंचाई वाले पहाड़ बर्फ विहीन नजर आ रहे हैं और मार्च के महीने में ही तापमान में असामान्य बढ़ोतरी महसूस की जा रही है।
स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां ऊंचाई वाले इलाकों में सामान्यतः अप्रैल के अंतिम दिनों में खिलने वाला बुरांश इस बार पहले ही खिलने लगा है, वहीं निचले क्षेत्रों में आम के पेड़ समय से पहले बौर से लद गए हैं।
बढ़ती गर्मी का असर जल स्रोतों पर भी दिखाई देने लगा है। कई प्राकृतिक स्रोतों में पानी कम होने लगा है, जिससे क्षेत्र में पेयजल संकट के शुरुआती संकेत मिलने लगे हैं। साथ ही किसानों के सामने अपनी फसलों को बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।
नहरों में पानी की मात्रा घटने के कारण महिलाओं को खेतों की सिंचाई के लिए दो से तीन दिन तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा है। दूसरी ओर जंगलों में आग की घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं, जिससे क्षेत्र में धुआं फैल गया है और पर्यावरणीय चिंता बढ़ गई है।
जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते अच्छी बारिश नहीं हुई तो आने वाले दिनों में जल संकट और खेती-किसानी से जुड़ी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
