पर्यावरणब्लॉग

दिल्ली की जहरीली हवा का हिमालय पर प्रहार: बर्फीली चोटियों के अस्तित्व पर संकट

The article highlights a critical environmental crisis: the “transboundary pollution” from metropolitan hubs like Delhi is severely impacting the Himalayan ecosystem. Scientific research from institutions such as ICIMOD and the Wadia Institute reveals that air pollution is no longer just an urban issue; it has reached the remote icy peaks of the Himalayas. The primary culprit is Black Carbon, a byproduct of incomplete combustion from vehicles, biomass, and forest fires. When these fine particles settle on pristine snow, they reduce its Albedo (reflectivity) by 20% to 30%. Consequently, the snow absorbs more solar energy, raising surface temperatures by 2°C to 4°C and accelerating glacial melt.

-जयसिंह रावत —

महानगरों की दमघोंटू हवा अब केवल शहरी फेफड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने दुनिया की सबसे ऊंची और पवित्र पर्वत श्रृंखला हिमालय की सेहत को भी गंभीर रूप से बिगाड़ना शुरू कर दिया है। काठमांडू स्थित अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) और देहरादून के वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के नवीनतम शोध एक भयावह सच्चाई की ओर इशारा कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर और भारत-गंगा के मैदानी इलाकों से निकलने वाला प्रदूषण अब ‘ट्रांसबाउंड्री पॉल्यूशन’ का रूप लेकर हिमालय के ग्लेशियरों पर कालिख की चादर बिछा रहा है। यह स्थिति न केवल पहाड़ों के पारिस्थितिक तंत्र के लिए घातक है, बल्कि आने वाले दशकों में दक्षिण एशिया की जीवनदायिनी नदियों के अस्तित्व को भी खतरे में डाल सकती है।

अल्बीडो का गिरता स्तर और ग्लेशियरों का पिघलाव

वायु प्रदूषण का सबसे खतरनाक घटक ब्लैक कार्बन है, जो हिमालय की सफेद बर्फ पर जमा होकर उसकी सूरज की किरणों को परावर्तित करने की क्षमता यानी अल्बीडो को कम कर देता है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान और एरीज, नैनीताल के अध्ययनों के अनुसार, ब्लैक कार्बन के कारण हिमालयी बर्फ की परावर्तन क्षमता में 20 से 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। जब बर्फ सफेद नहीं रह जाती, तो वह सूरज की ऊष्मा को सोखने लगती है, जिससे सतह का तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। इसी ताप के कारण गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे विशाल ग्लेशियर अपनी औसत गति से कहीं अधिक तेजी से पीछे हट रहे हैं। वाडिया संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि बायोमास और जीवाश्म ईंधन जलने की घटनाओं के दौरान ग्लेशियरों पर ब्लैक कार्बन का निक्षेपण सामान्य से तीन गुना तक बढ़ जाता है।

मैदानों से पहाड़ों तक प्रदूषण का सफर

प्रदूषण के इस सफर में उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति एक बड़ी भूमिका निभाती है। आईआईटी दिल्ली और कानपुर के शोध बताते हैं कि सर्दियों के दौरान जब मैदानी इलाकों में तापमान का व्युत्क्रमण (टेंपरेचर इन्वर्जन) होता है, तो प्रदूषित हवा जमीन के करीब फंस जाती है और धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ हिमालय की ढलानों की ओर बढ़ने लगती है। नासा के उपग्रह आधारित आंकड़ों और वायुमंडलीय मॉडलों से यह स्पष्ट हुआ है कि शहरों से उठने वाले प्रदूषित द्रव्यमान का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा कश्मीर से लेकर सिक्किम तक की चोटियों तक पहुंच रहा है। केवल वाहनों का धुआं ही नहीं, बल्कि कृषि अवशेषों का जलना और जंगलों की आग इस समस्या को और अधिक विकराल बना रही है। देहरादून जैसी घाटियों में स्थानीय वायु प्रवाह इन कणों को ऊपरी वायुमंडल तक धकेलता है, जहां से ये आसानी से मुख्य हिमालयी क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं।

वायुमंडल में भूरे बादलों का जमाव और जलवायु चक्र

ब्लैक कार्बन केवल बर्फ पर ही नहीं जमता, बल्कि यह वायुमंडल में ‘ब्राउन क्लाउड’ यानी भूरे बादलों की एक परत बना देता है। यह परत सूरज की रोशनी को सोखकर ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में वायुमंडलीय तापमान को बढ़ा देती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे न केवल बर्फ पिघल रही है, बल्कि मानसून की दिशा और तीव्रता भी प्रभावित हो रही है। नासा के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में हिमालयी बर्फ की सतह के तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। इस तापीय परिवर्तन के कारण हिमालय में वर्षा और हिमपात के पैटर्न में अनिश्चितता आई है, जिससे पहाड़ों में अचानक आने वाली बाढ़ और ग्लेशियर झील फटने (जीएलओएफ) की घटनाओं का जोखिम बढ़ गया है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि इस प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया, तो गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के जल प्रवाह में भारी अस्थिरता आ सकती है, जिससे कृषि और बिजली उत्पादन प्रभावित होगा।

क्षेत्रीय सहयोग और नीतिगत बदलाव की जरूरत

हिमालय को ‘एशिया का वॉटर टॉवर’ कहा जाता है क्योंकि यह करीब 1.4 अरब लोगों की प्यास बुझाता है। इसकी रक्षा के लिए अब केवल स्थानीय प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, यदि दक्षिण एशियाई देश मिलकर उत्सर्जन मानकों को कड़ाई से लागू करें और फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीक अपनाएं, तो ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को 80 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। इसमें इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और उद्योगों में स्वच्छ ईंधन का उपयोग अनिवार्य करना सबसे प्रभावी कदम हो सकते हैं। वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है कि यदि उत्सर्जन की वर्तमान गति बनी रही, तो वर्ष 2050 तक हिमालय का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अपनी बर्फ खो सकता है। यह न केवल पहाड़ों के लिए, बल्कि मैदानों में बसने वाली विशाल आबादी के लिए भी एक जल संकट की चेतावनी है।

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