लोकतंत्र का चमत्कार : अपराजिता-मैडम द्रौपदी मुर्मू

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–प्रो. श्याम सुंदर भाटिया
सुश्री मायावती यूपी की फर्स्ट टाइम सीएम बनीं तो तत्कालीन पीएम श्री नरसिंम्हा राव विदेशी दौरे पर थे। किसी जर्नलिस्ट ने श्री राव से पूछा, दलित की बेटी सीएम बन गई है, कैसे संभव है? सियासी पुरोधा श्री राव ने अपनी हाजिर जवाबी में कहा, यह लोकतंत्र का चमत्कार है। बरसों पुरानी यह सारगर्भित टिप्पणी मैडम द्रौपदी मुर्मू पर सौ फीसदी खरी उतरती है। यह बात दीगर है, जिंदगी में मुर्मू को गहरे जख़्म दिए, लेकिन सियासी सितारा खूब चमक रहा है। ओडिशा के इस परिचित आदिवासी चेहरे के लिए अब रायसीना की दहलीज चंद कदम दूर है। यदि यह कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि 21 जुलाई को मतगणना की औपचारिकता महज बाकी है।

भाजपा नीत एनडीए गठबंधन ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक राष्ट्रपति पद के लिए उन्हें सर्वसम्मति से अपना प्रत्याशी घोषित करके सियासी गलियारों को चौंका दिया है। प्रतिद्वंदी के रूप में मुर्मू के सामने श्री यशवन्त सिन्हा विपक्ष के उम्मीदवार हैं। लगभग-लगभग चुनावी नतीजे मुर्मू के पक्ष में हैं। रही-सही कमी ओडिशा के सीएम श्री नवीन पटनायक और बिहार के सीएम श्री नीतीश यादव के समर्थन ने पूरी कर दी है। झारखंड की लंबे समय गवर्नर रहीं मुर्मू वहां के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन की सजातीय हैं। सियासी पंडितों का मानना है, समर्थन के सामने राजनीतिक समीकरण घुटने टेक देगा। दीगर दलों का सपोर्ट मुर्मू को मिलने की भी प्रबल संभावना है। वह ओडिशा की फर्स्ट लेडी के संग-संग पहली हस्ती भी हैं, जो झारखंड में गवर्नर सरीखे संवैधानिक पद पर काबिज हुईं। मुर्मू की सादगी इस छोटे से वाक्या से साफ-साफ झलकती है, यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें बधाई फोन किया तो वह निःशब्द रहीं। आंखों में बस आंसू थे। गला रूधां-सा था। मुर्मू ने अपनी बेटी इतिश्री से यह कहकर अपनी खुशी जाहिर की, बेटा- किसी आदिवासी के लिए यह सपने जैसा है।

भावी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का सियासी सफर
ओडिशा के आदिवासी जिले मयूरभंज के कुसुमी ब्लॉक में 20 जून, 1958 को जन्मीं आर्ट ग्रेजुएट द्रौपदी मुर्मू ने अपने करियर की शुरूआत एक क्लर्क के रूप में की थी। फिर वह टीचर बन गईं। 1997 में पहली बार निगम पार्षद बनीं ओडिशा के रायरंगपुर विधानसभा सीट से दो बार बीजेपी विधायक चुनी गईं। 2000 से 2004 के बीच नवीन पटनायक सरकार में मंत्री बनीं। मुर्मू के पास परिवहन, वाणिज्य विभाग, मत्सय पालन विभाग और पशुपालन विभाग की भी जिम्मेदारी रही। 2010 और 2013 में वह मयूरभंज की जिलाध्यक्ष भी रहीं। फिर केन्द्र सरकार ने उन्हें 2015 में झारखंड का राज्यपाल बना दिया। 18 मई 2015 से 12 जुलाई 2021 तक वह इस पद पर काबिज रहीं। वह झारखंड में बतौर गवर्नर छह साल एक माह अठ्ठारह दिन रहीं। मुर्मू को ओडिशा विधानसभा ने सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए नीलकंठ अवार्ड से भी सम्मानित किया।

20 को मना बर्थ-डे, 21 को भाजपा का गिफ्ट
आदिवासी हितों की पुरोधा कही जाने वाली कद्दावर महिला शख्सियतों में मुर्मू भी शुमार हैं, लेकिन उनकी सादगी भी बेमिसाल है। बतौर गवर्नर अंतिम दिन 12 जुलाई 2021 को वह झारखंड के राजभवन से सीधे ओडिशा के अपने पैत्रक गांव रवाना हो गईं। इस साल उन्होंने 20 जून को अपनी बेटी और दामाद के संग सादगी से दिल्ली से सोलह सौ किमी दूर अपने पैत्रक गांव में जन्मोत्सव मनाया। 21 जून को उन्हें विधिवत सूचना मिली कि एनडीए उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना चाहता है। एक तरह से एनडीए ने मुर्मू को 64वें बर्थ-डे से अगले दिन बड़ा तोहफा दे दिया। फर्श से अर्श तक पहुंचने में उन्हें करीब-करीब 25 साल लग गए। मुर्मू की छवि सख्त प्रशासक की तो है, लेकिन एकदम बेदाग है। राज्यपाल के तौर पर मुर्मू झारखंड सरकार को समय-समय पर आईना दिखाने में कभी नहीं हिचकीं।

जिंदगी में जख़्म-दर-जख़्म पहाड़ की मानिंद
मुर्मू ने जीवन में दो बेटों और पति को खोने के बाद हर बाधा का डटकर मुकाबला किया। 2009 उनके जीवन में बड़ा कू्रर बनकर आया। उनके पुत्र की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। वह इस सदमे से निकलने में जुटी ही थीं, लेकिन ईश्वर को कुछ और मंजूर था। महज तीन साल के अंतराल में उनके दूसरे बेटे को 2012 में सड़क हादसे ने लील लिया। दोनों पुत्रों की मृत्यु से अरसा पहले उनके पति श्री श्याम चरण मुर्मू की हर्ट अटैक से मौत हो गई थी। द्रौपदी मुर्मू की एक ही विवाहित पुत्री इतिश्री है। वह अपने पति के साथ जमशेदपुर में रहती है। संथाल परिवार से ताल्लुक रखने वाली मुर्मू को घर चलाने और बेटी को पढ़ाने के लिए बेहद दिक्कतों का सामना करना पड़ा। टीचर बनीं। बाबू बनीं। बैंक में नौकरी की। किसी तरह से अपनी बेटी इतिश्री मुर्मू को पढ़ाया-लिखाया। द्रौपदी मुर्मू अब आद्याश्री की नानी बन चुकी हैं।

मुर्मू बोलीं, आश्चर्यचकित हूं और खुश भी
अपनी उम्मीदवारी का ऐलान होने के बाद झारखंड की पूर्व गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने मीडिया से कहा, टीवी देखकर ही पता चला है, मुझे राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया गया है। यह एक संवैधानिक पद है। यदि मैं इस पद के लिए चुन ली गई तो संवैधानिक प्रावधानों और अधिकरों के अनुसार काम करूंगी। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उम्मीद जताई, वह एक महान राष्ट्रपति बनेंगी। बतौर झारखंड की फर्स्ट लेडी विशेषकर विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में उनकी पारी यादगार रही है। झारखंड में उन्होंने 2016 में उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर खुद लोक अदालत लगवाई थी, जिसमें विवि शिक्षकों और कर्मचारियों के पांच हजार मामलों का निपटारा हुआ था। बतौर गवर्नर जनजातीय मामलों, शिक्षा, कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर वह हमेशा सजग रहीं। उन्होंने राज्य सरकार के निर्णयों में संवैधानिक गरिमा और शालीनता के साथ हस्तक्षेप किया।

मुर्मू के गांव में ढोल-नगाड़ों के बीच जश्न का माहौल
रायरंगपुर से करीब 25 किमी दूर उनके पैतृक गांव उपरबेड़ा में करीब 300 घर हैं, जिसकी आबादी करीब छह हजार है। गांव में खुशी का माहौल है। युवा जोश से भरे हैं। ढोल-नगाड़ों के बीच ग्रामीण जश्न में डूबे हैं। मुर्मू का घर छोटा है, लेकिन खूबसूरत है। द्रौपदी मुर्मू अपने सर्किल में मैडम जी के नाम से जानी जाती हैं। मुर्मू का गांव पूरी तरह से डिजिटल है। पेयजल की पाइपलाइन बिछी है। सभी के घर शौचालय है। गरीबों के लिए पीएम आवास है। गांव वाले कहते हैं, यह सब अपनी द्रौपदी मुर्मू की ही देन है। उल्लेखनीय है, 2017 में भी द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति चुनाव की रेस में थीं। दिल्ली रवाना होने से पूर्व उन्होंने शिव मंदिर में तड़के झाडू लगाई। स्नान किया। विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। नंदी के कानों में अपनी मनोकामना भी कही। राज्यपाल के रूप में अपनी सेवानिवृति के बाद से यह दिनचर्या रोजमार्रा की है।

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट और रिसर्च स्कॉलर हैं)

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