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पंचायतों को केरल जैसी शक्तियाँ मिलनी चाहिए थीं, लेकिन विधायक नहीं चाहते सत्ता का हस्तांतरण

 

हिमालयी संवाद व्याख्यान में बोले पूर्व कमिश्नर सुरेंद्र सिंह पांग्ती

शीशपाल गुसाईं

उत्तराखंड के आदर्श जननेता, पूर्व विधायक व मंत्री स्व. मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ की पुण्यतिथि पर आयोजित “हिमालयी संवाद” व्याख्यान में उत्तर प्रदेश के समय गढ़वाल मंडल के दो बार कमिश्नर रहे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और राज्य के हर जन हित के मुद्दों पर जनता के साथ सड़कों पर खड़े रहने वाले श्री सुरेंद्र सिंह पांगती ने पंचायत व्यवस्था और सत्ता के विकेंद्रीकरण को लेकर बेहद तीखा और विचारोत्तेजक वक्तव्य दिया।

सुरेंद्र सिंह पांगती ने कहा कि ‘गांववासी’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार था—गांव का आदमी, गांव की पीड़ा और गांव के अधिकारों की लड़ाई। उन्होंने कहा कि स्व. मोहन सिंह रावत वास्तव में अपने नाम के अनुरूप गांव के सच्चे प्रतिनिधि थे। पांगती ने स्मरण करते हुए बताया कि जब वे पौड़ी मंडल मुख्यालय में कमिश्नर थे, उस दौर में गांववासी जी से उनके आत्मीय संबंध थे। दोनों के बीच जनहित, राजनीति और उत्तराखंड के भविष्य से जुड़े अनेक मुद्दों पर गहन संवाद होता रहता था।

उन्होंने अपने संबोधन में कहा—“केरल जैसे राज्य में ग्राम पंचायतों को पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं, वहां सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। ऐसे अधिकार उत्तराखंड को कब के मिल जाने चाहिए थे।” उन्होंने खुलकर कहा कि दुर्भाग्य से उत्तराखंड के विधायक नहीं चाहते कि पंचायतें वास्तव में सशक्त हों। “मैंने इस विषय पर कई विधायकों से बात की, लेकिन बात नहीं बनी। पंचायतों के असली अधिकार आज भी विधायकों के पास हैं। विधायक सत्ता का हस्तांतरण करना ही नहीं चाहते।”

सुरेंद्र सिंह पांगती ने दो टूक कहा— “हम यह कहकर खुद को भ्रम में रख रहे हैं कि पंचायतों को मजबूत किया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि बिना अधिकार दिए कोई भी संस्था मजबूत नहीं हो सकती।”

स्व. मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा— “गांववासी जी ने जितना संभव हो सका, उतना किया। लेकिन एक अकेला व्यक्ति पूरी व्यवस्था नहीं बदल सकता। उन्होंने संघर्ष किया, आवाज उठाई, लेकिन सत्ता संरचना ने उन्हें वह शक्ति नहीं दी, जिसकी वास्तव में जरूरत थी।” गौरतलब है कि, गांववासी जी उत्तरांचल राज्य अंतरिम सरकार में ग्राम्य विकास, पंचायती राज, मंत्री थे।

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