न्यायिक अव्यवस्था की विडंबना : 24 साल जेल में बिताने के बाद निर्दोष साबित हुआ आज़ाद खान
24 साल जेल में बिताने के बाद भी आसानी से आज़ाद नहीं हो पाया आज़ाद खान
लखनऊ, 23 जनवरी। किसी व्यक्ति को अपराधी ठहराना जितना आसान है, उतना ही कठिन होता है उसे उस कलंक से मुक्त करना—भले ही अदालत उसे निर्दोष घोषित कर दे। उत्तर प्रदेश के आज़ाद ख़ान की कहानी भारतीय न्याय व्यवस्था की इसी विडंबना का जीवंत उदाहरण है। 24 वर्षों तक जेल में बंद रहने के बाद, और इलाहाबाद हाईकोर्ट से बरी होने के बावजूद एक अतिरिक्त महीना सलाखों के पीछे बिताने को मजबूर आज़ाद ख़ान की रिहाई केवल एक व्यक्ति की आज़ादी नहीं है, बल्कि यह हमारे आपराधिक न्याय तंत्र पर एक गंभीर सवाल भी है।
जेल से बाहर निकला व्यक्ति, लेकिन भीतर टूटा हुआ इंसान
54 वर्षीय आज़ाद ख़ान जब बरेली जेल से बाहर निकले, तो वह केवल शारीरिक रूप से ही कमजोर नहीं थे, बल्कि मानसिक रूप से भी टूट चुके थे। दशकों की कैद, अनिश्चित भविष्य और न्याय की अंतहीन प्रतीक्षा ने उन्हें भीतर से झकझोर दिया था। जेल अधिकारियों द्वारा यह कहना कि वह “मानसिक रूप से नाजुक” थे, इस बात की गवाही है कि लंबी कैद केवल स्वतंत्रता नहीं छीनती, बल्कि व्यक्ति की पहचान, आत्मसम्मान और जीवन की दिशा भी छीन लेती है।
आज का भारत उस व्यक्ति से यह अपेक्षा करता है कि वह अचानक एक ऐसी दुनिया में लौट आए, जो उसके बिना 24 साल आगे बढ़ चुकी है—जहां तकनीक, समाज और रिश्तों के मायने बदल चुके हैं। यह पुनर्वास नहीं, बल्कि एक और परीक्षा है।
एक टूटा हुआ मामला, जो वर्षों तक चलता रहा
आजाद ख़ान को अक्टूबर 2001 में गिरफ्तार किया गया था और डकैती के मामले में दोषी ठहराकर जेल भेज दिया गया। लेकिन 19 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने सजा रद्द करते हुए स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष एक भी प्रत्यक्षदर्शी या ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, जो उन्हें अपराध से जोड़ता हो। सवाल यह नहीं है कि अदालत ने अंततः न्याय क्यों किया, बल्कि यह है कि जब सबूत नहीं थे, तो 24 साल तक न्याय क्यों नहीं हुआ?
यह देरी केवल कानूनी प्रक्रिया की सुस्ती नहीं, बल्कि एक जीवन की बर्बादी है।
बरी होने के बाद भी जेल—प्रणाली की भयावह विफलता
इस मामले की सबसे भयावह सच्चाई यह है कि हाईकोर्ट से बरी होने के बाद भी आज़ाद ख़ान को एक महीने तक जेल में रहना पड़ा, क्योंकि बरी किए जाने का प्रमाणित आदेश संबंधित अधिकारियों तक नहीं पहुंच पाया। यह महज कागजी चूक नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और जेल प्रशासन के बीच समन्वय की गंभीर कमी को उजागर करता है।
जब तक टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर संज्ञान नहीं लिया गया, तब तक व्यवस्था मौन रही। यह सवाल उठाता है कि यदि मीडिया ने हस्तक्षेप न किया होता, तो क्या आज़ाद ख़ान और कितने दिन जेल में रहते?
निर्दोषों की कैद: एक अदृश्य संकट
आजाद ख़ान कोई अपवाद नहीं हैं। देश की जेलों में बड़ी संख्या में ऐसे कैदी बंद हैं, जो या तो बरी हो चुके हैं, या जिनके मामले वर्षों से लंबित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बार-बार बताते हैं कि जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या दोषसिद्ध कैदियों से कहीं अधिक है। इनमें से कई लोग अंततः निर्दोष साबित होते हैं, लेकिन तब तक वे अपने जीवन का सबसे कीमती हिस्सा खो चुके होते हैं।
न्याय के बाद मुआवज़ा और पुनर्वास—अब भी अधूरा अध्याय
भारतीय न्याय प्रणाली में अब भी यह स्पष्ट व्यवस्था नहीं है कि वर्षों तक गलत तरीके से कैद में रखे गए व्यक्ति को मुआवज़ा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सामाजिक पुनर्वास कैसे मिलेगा। आज़ाद ख़ान जैसे लोगों के लिए न कोई संस्थागत सहयोग है, न ही कोई पुनर्वास नीति।
एक व्यक्ति जो युवावस्था में जेल गया और अधेड़ उम्र में बाहर निकला—उसके लिए रोजगार, सामाजिक स्वीकृति और मानसिक स्थिरता तीनों ही बड़ी चुनौतियां हैं। सवाल यह है कि क्या सिर्फ “रिहाई” ही न्याय है?
निष्कर्ष: आज़ादी नहीं, चेतावनी है यह मामला
आजाद ख़ान की कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है—न्याय व्यवस्था के लिए, प्रशासन के लिए और समाज के लिए। यह मामला बताता है कि न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर है; और बरी होने के बाद भी जेल में रहना, व्यवस्था की असंवेदनशीलता का सबसे क्रूर रूप है।
जब तक अदालत, जेल प्रशासन और शासन के बीच जवाबदेही, तकनीकी समन्वय और मानवीय दृष्टिकोण विकसित नहीं होगा, तब तक आज़ाद ख़ान जैसे नाम बदलते रहेंगे, लेकिन त्रासदी वही रहेगी।
