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भूस्खलन खतरा : पहाड़ों की  रानी मसूरी भी खिसक रही जहां  -तहां 

 

जयसिंह रावत-

कुछ प्राकृतिक तो कुछ मानवीय कारणों से पहाड़ों की रानी मसूरी भी सुरक्षित नही रह गयी। कभी अंग्रेजों की चहेती रही मसूरी की जमीन भूस्खलनों से जहां तहां खिसक रही है । वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति प्राकृतिक कारणों  से अधिक अंधाधुंध विकास और निर्माण कार्यों का परिणाम है। ताज़ा अध्ययन के अनुसार मसूरी और उसके आसपास का लगभग 15 प्रतिशत क्षेत्र अत्यधिक भूस्खलन संभावित जोन में आता है।

यह अध्ययन देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) ने किया है, जो भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है। वैज्ञानिकों ने मसूरी और उसके आसपास के 84 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का सर्वेक्षण किया, जो मध्य हिमालय क्षेत्र में स्थित है। इस अध्ययन के अनुसार, भट्टाघाट, जॉर्ज एवरिस्ट, कैंप्टी फॉल, खत्तापानी, लाइब्रेरी रोड, गलोगीधार और हाथीपांव जैसे इलाके भूस्खलन की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील पाए गए हैं।

इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली क्रोल चूना पत्थर (Krol limestone) नामक चट्टान अत्यधिक दरारदार और अस्थिर है, जिससे यहाँ की ढालें 60 डिग्री से भी अधिक खड़ी हैं। इन ढालों पर अनियंत्रित निर्माण और सड़क कटान ने स्थिति को और अधिक खतरनाक बना दिया है।

वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों ने भूस्खलन संभाव्यता मानचित्रण (Landslide Susceptibility Mapping – LSM) तैयार किया है, जो Journal of Earth System Science में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के अनुसार, 29 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम भूस्खलन जोन में आता है, जबकि 56 प्रतिशत क्षेत्र कम से बहुत कम भूस्खलन संभाव्यता वाले क्षेत्र के अंतर्गत है।

यह अध्ययन आधुनिक तकनीक की मदद से किया गया। वैज्ञानिकों ने Geographic Information System (GIS) और उच्च-रिज़ॉल्यूशन उपग्रह चित्रों का प्रयोग किया तथा Yule Coefficient (YC) नामक सांख्यिकीय पद्धति का उपयोग कर भूस्खलन संभाव्यता का विश्लेषण किया।

भूस्खलनों के कारणों का पता लगाने के लिए टीम ने कई कारकों का अध्ययन किया, जिनमें चट्टानों की बनावट (lithology), भूमि उपयोग और आवरण (land use-land cover), ढाल, ऊँचाई, जल निकासी व्यवस्था, सड़क कटान, दिशा (aspect), और भू-संरचना (lineament) जैसे तत्व शामिल थे। इन सभी कारकों के लिए वैज्ञानिकों ने Landslide Occurrence Favourability Score (LOFS) और Landslide Susceptibility Index (LSI) तैयार किया, जिससे पूरे क्षेत्र को पाँच जोनों में बाँटा गया।

अध्ययन के परिणामों की सटीकता की पुष्टि के लिए Success Rate Curve (SRC) और Prediction Rate Curve (PRC) का उपयोग किया गया। इसमें SRC के लिए 0.75 और PRC के लिए 0.70 का Area Under Curve (AUC) प्राप्त हुआ, जो यह दर्शाता है कि तैयार किया गया मानचित्र वास्तविक भूस्खलन घटनाओं से अच्छी तरह मेल खाता है।

यह अध्ययन केवल मसूरी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है। उत्तराखंड के पर्वतीय नगरों — जैसे नैनीताल, चंपावत, पिथौरागढ़ और जोशीमठ — में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है, जहाँ निर्माण कार्यों ने  पहाड़ी ढलानों को अस्थिर कर फिया है। मसूरी में यह अध्ययन भविष्य की नीति निर्माण के लिए एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

वैज्ञानिकों का मत है कि यदि मसूरी जैसे पर्वतीय शहरों में भूस्खलन जोखिम को कम करना है, तो सबसे पहले अनियंत्रित निर्माण, सड़क कटान और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगानी होगी। जल निकासी प्रणाली को मजबूत करना, ढलानों पर हरियाली को पुनर्जीवित करना और शहरी नियोजन में भूवैज्ञानिक आकलन को अनिवार्य बनाना समय की माँग है।

यह शोध एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि हिमालय जैसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में विकास की कोई भी गतिविधि प्रकृति की सीमाओं को ध्यान में रखे बिना नहीं की जा सकती। यदि हमने समय रहते सबक नहीं लिया तो मसूरी जैसी सुंदर बस्तियाँ आने वाले समय में भूस्खलन के स्थायी खतरे में फँस सकती हैं।

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