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नेहरू ने अंतिम चार दिन देहरादून में ही बिताये थे

Nehru’s love for the mountains needed no introduction. Dehradun and Mussoorie, nestled in the lap of the Himalayas, were not mere places for him but centers of spiritual peace and contemplation. Dehradun’s jail had practically become a second home, where he not only spent long periods but also laid the foundation for some of his most significant ideological writings. In his autobiography, he mentioned these mountain days with deep affection. His extended imprisonment in Almora jail was also a crucial milestone in his political and philosophical transformation. Interestingly, Nehru took his first major leap in politics from Dehradun itself. The bond between Nehru and the mountains was not just personal; it extended familially across generations. Stories of his father, Motilal Nehru, connected to Mussoorie are still recounted in local folklore like ancient tales. Nehru’s daughter Indira Gandhi, grandson Rajiv Gandhi, and the newer generation of the Gandhi family also received their schooling in Dehradun. This reveals that the soil of Uttarakhand was not only pivotal to Nehru’s political life but also the land of his family’s memories and values

 


-जयसिंह रावत

नेहरू का पहाड़ों से प्रेम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। हिमालय की गोद में बसे देहरादून और मसूरी उनके लिए मात्र स्थल नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और चिंतन के केंद्र थे।देहरादून की जेल तो उनके लिए मानो दूसरा घर बन गई थी, जहाँ उन्होंने न सिर्फ लंबे समय बिताए बल्कि अपने कुछ महत्वपूर्ण वैचारिक लेखन की नींव भी यहीं रखी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने इन पहाड़ी दिनों का बड़े आत्मीय भाव से उल्लेख किया है। अल्मोड़ा जेल में बिताया गया उनका विस्तृत कारावास भी उनके राजनीतिक और दार्शनिक रूपांतरण का एक अहम पड़ाव रहा। दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के क्षेत्र में अपनी पहली बड़ी छलांग भी नेहरू ने देहरादून से ही लगाई थी. नेहरू और पहाड़ों का यह संबंध केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं था, बल्कि पारिवारिक रूप से भी यह नाता पीढ़ियों तक चला। उनके पिता मोतीलाल नेहरू के मसूरी से जुड़े किस्से आज भी लोक-जीवन में पुराकथाओं की तरह सुनाई देते हैं। नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी, नाती राजीव गांधी और गांधी परिवार की नई पीढ़ी की स्कूली शिक्षा भी देहरादून में ही हुई। इससे पता चलता है कि उत्तराखंड की यह धरती केवल नेहरू के राजनीतिक जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि उनके परिवार की स्मृतियों और सस्कारों की धरा भी रही है।

देहरादून में प्रारंभिक राजनीतिक नेतृत्व
सन् 1920 में जब देहरादून में कांग्रेस ने राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया तो उसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने ही की थी। बिलायत से लौटने के बाद उनका यह पहला राजनीतिक कार्यक्रम था इस सम्मेलन में लाला लाजपत राय और किचलू जैसे बड़े नेता शामिल हुये थे। सन् 1922 में भी देहरादून में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ और उसकी अध्यक्षता भी पंडित नेहरू ने ही की थी। उस सम्मेलन में सरदार बल्लभ भाई पटेल और चितरंजन दास जैसे बड़े नेताओं ने भाग लिया था। देहरादून और यहां की जेल नेहरू के लिये घर जैसे ही थे। एक बार जब अफगान प्रतिनिधि मण्डल देहरादून पहुंचा तो नेहरू को जिला छोड़ने का आदेश हुआ। क्योंकि जिस चार्लविले होटल में नेहरू ठहरे थे, उसी में अफगान प्रतिनिधि मण्डल को भी ठहराया गया था। देसी रियासतों में लोकतांत्रिक आन्दोलनों के लिये कांग्रेस द्वारा गठित ‘‘आल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेस’’ के पहले अध्यक्ष नेहरू ही थे और उनके बाद पट्ठाभि सीतारमैया अध्यक्ष बने थे। टिहरी सहित हिमाचल के सभी प्रजामण्डल इसी संगठन से सम्बद्ध थे।

उत्तराखंड के संदर्भ में नेहरू की सोच
उत्तराखण्ड और खास कर देहरादून से नेहरू की कई यादें जुड़ी हुयी हैं।सन् 30 के दशक में उन्होंने श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में कहा था कि उत्तराखण्ड की विशेष भौगोलिक परिस्थिति के साथ ही अलग सांस्कृतिक पहचान ह,ै इसलिये क्षेत्रवासियों को अपनी अलग पहचान बनाये रखने का हक हैं। उत्तराखण्ड के बारे में इस तरह की टिप्पणी करने वाले वह पहले राष्ट्रीय नेता थे। बाद में 1952 में नेहरू के इस वाक्य की प्रासंगिकता तब सामने आयी जबकि कामरेड पी.सी. जोशी की अध्यक्षता में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग कर डाली। नब्बे के दशक में उत्तराखण्ड आन्दोलन में नेहरू का यह सूक्ति वाक्य भी आन्दोलनकारियों के काम आया। हिमाचल को पंजाब से अलग राज्य बनाने की परमार की मुहिम को भी नेहरू का ही आशिर्वाद प्राप्त था।

देहरादून–मसूरी के साथ भावनात्मक रिश्ता
नेहरू उत्तराखण्ड से भावनात्मक तौर पर जुड़े रहे। जेल जीवन के अलावा भी उनका यहंा निरन्तर आना जाना रहा है उन्हें पहाड़ों की रानी मसूरी भी काफी पसन्द थी। वह अपने पिता मोतीलाल नेहरू और माता स्वरूप रानी के साथ सबसे पहले 1906 में मसूरी तब आये थे जब वह 16 साल के थे। उसके बाद वह अपने माता पिता के अलावा बहन विजय लक्ष्मी पंडित, बेटी इंदिरा गांधी और नातियों के साथ आते जाते रहे। अपने जीवन के कुछ अन्तिम पल उन्होंने यहां बिताये थे। 27 मई 1964 को मृत्यु से एक दिन पहले नेहरू देहरादून से वापस दिल्ली लौटेे थे। दरअसल वह कांग्रेस के भुवनेश्वर अधिवेशन में हल्का दौरा पड़ने के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिये 23 मई 1964 को देहरादून पहुंच गये थे। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने मसूरी और सहस्रधारा की सैर भी की। देहरादून का सर्किट हाउस जो आज राजभवन बन गया, नेहरू के आतिथ्य का गवाह है। नेहरू के हाथ से लिखा हुआ प्रशस्ति पत्र आज भी सर्किट हाउस की दीवार पर चिपका हुआ है। हालांकि उस याद पर भी न जाने कब पानी फेर दिया जाय! तत्कालीन विधायक गुलाबसिंह के आमंत्रण पर नेहरू चकराता भी गये थे जहां उन्होंने प्रकृतिपुत्रों की जनजातीय संस्कृति का करीब से आनन्द उठाया।

देहरादून में लेखन और बौद्धिक साधना
उनमें लेखन की अद्भुत क्षमता थी और इसके लिये वह बहुत अध्ययन करते थे इसी वजह से वह भारत से बाहर भी सबसे लोकप्रिय भारतीय नेता थे। नेहरू जी ने एक दर्जन से थोड़े ही कम ग्रन्थ लिखे जिनमें डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एन ऑटोबाइग्रेफी ( टुवार्ड्स फ्रीडम)ए ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री, लेटर फॉर नेशन, लेटर फ्राम अ फादर टु हिज डॉटर एवं द युनिटी ऑफ इंडिया जैसे कालजयी ग्रन्थ शामिल हैं। इनमें से एन ऑटोबाइग्राफी की शुरुआत उन्होंने देहरादून जेल से ही की थी। इस ग्रन्थ में उन्होंने पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य और देहरादून का उल्लेख किया है। भारत के लिये नेहरू की जेल की कोठरी इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेहरू को अपनी विख्यात पुस्तक ”डिस्कवरी आफ इण्डिया“ लिखने की यहीं सूझी थी और उस पुस्तक के अधिकांश हिस्से इसी कोठरी में लिखे गये थे। नेहरू को उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी इसी वार्ड में मिलने आती थी।

जेलों में बिताए कठिन दिन
उनके पास पैतृक वैभव की कमी नहीं थी। इलाहाबाद का आनन्द भवन इसका गवाह है, जिसे बाद में कांग्रेस को दे दिया गया उनके पिता मोती लाल देश के चोटी के वकील थे और दादा गंगाधर नेहरू दिल्ली के अंतिम कोतवाल थे। लेकिन सच्चाई की गवाह लखनऊ, देहरादून, अल्मोड़ा आदि की खामोश जेलें बिन कहे सच्चाई बयां करती हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू 3,259 दिन तक जेल में रहे। उन्होंने सबसे पहले लखनऊ जेल में 6 दिसम्बर 1921 से लेकर 3 मार्च 1922 तक कुल 88 दिन काटे। उनको जब नवीं बार गिरफ्तार किया गया तो कुल 1041 दिन अल्मोड़ा जेल में रखा गया। देहरादून की पुरानी जेल के एक वार्ड में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान पण्डित नेहरू को 4 बार कैद कर रखा गया था। राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू को सबसे पहले 1932 में देहरादून जेल के इस वार्ड में रखा गया था। उसके बाद 1933,1934 और फिर 1941 में उन्हें यहां रखा गया था।

नेहरू परिवार और देहरादून–मसूरी का गहरा संबंधनेहरू ही नहीं पूरे नेहरू परिवार को देहरादून-मसूरी से विशेष लगाव रहा। देखा जाय तो कांग्रेस में होते हुये भी मोतीलाल नेहरू ने अपनी ‘‘इण्डिपेंडेंट पार्टी’’ की नींव भी देहरादून में ही रखी थी। गया काग्रेस में जाने से पहले इस पार्टी के सभी नेता देहरादून में एकत्र हुये थे और मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुयी बैठक में नयी पार्टी के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ था।मसूरी के लोग मोतीलाल को शायद ही कभी भूलें! सर्वविदित है कि मसूरी के मॉल रोड पर हिन्दुस्तानियों का प्रवेश वर्जित था। सड़क के प्रवेश द्वारा पर ही बोर्ड लटका हुआ होता था जिसमें लिखा होता था कि ‘‘इंडियन्स एण्ड डॉग्स आर नॉट अलाउड’’। मोतीलाल नेहरू मसूरी प्रवास के दौरान सदैव जुर्माना भर कर मॉल रोड की

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ABOUT AUTHOR : Jay Singh Rawat is a seasoned senior journalist and prolific author with a deep-rooted connection to Uttarakhand. Known for his incisive reporting and insightful commentary on regional politics, culture, and development, he has contributed extensively to leading Hindi and English dailies. Rawat has penned several acclaimed books that explore the socio-political landscape, history, and environmental concerns of the Himalayan state, blending rigorous research with narrative flair. His works serve as valuable chronicles of Uttarakhand’s journey from a remote hill region to a vibrant state, earning him respect among readers, scholars, and policymakers alike.–ADMIN

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