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सत्ता का मद और नियति का न्याय

–उषा रावत

​मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि शक्ति जब अपने चरम पर होती है, तब वह एक अत्यंत खतरनाक भ्रम को जन्म देती है। यह भ्रम है स्वयं को अजेय मानने का विश्वास। जब कोई राष्ट्र या व्यक्ति यह मान लेता है कि नियम, मर्यादाएं और सीमाएं उनके लिए नहीं बनीं, तो इसी बिंदु से उस अनियंत्रित अहंकार का जन्म होता है जिसे प्राचीन दर्शन में ‘ह्यूब्रिस’ कहा गया है। इस अहंकार का परिणाम सदैव ‘नेमेसिस’ यानी पतनकारी न्याय के रूप में सामने आता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ शक्तियां तेजी से बदल रही हैं, यह शाश्वत सत्य पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

अहंकार की पराकाष्ठा और नेतृत्व का पतन

​आधुनिक राजनीति में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल इस अहंकार के सबसे जीवंत उदाहरण के रूप में देखा जाता है। उनके नेतृत्व की शैली केवल स्वयं के विचारों को प्राथमिकता देने और स्थापित वैश्विक व्यवस्थाओं को ठेंगा दिखाने पर आधारित थी। ट्रंप ने दशकों पुराने उन सैन्य और रणनीतिक गठबंधनों पर सवाल उठाए जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से दुनिया में एक प्रकार की स्थिरता बनाए रखी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन और पेरिस जलवायु समझौते जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से अचानक अलग हो जाना उनके इसी विश्वास का हिस्सा था कि अमेरिका को किसी की आवश्यकता नहीं है और वह शेष विश्व के बिना भी सर्वशक्तिमान बना रह सकता है।

​उनके द्वारा शुरू किया गया व्यापारिक युद्ध और विभिन्न देशों पर थोपे गए भारी आयात शुल्क इसी मानसिकता का परिणाम थे। उन्होंने न केवल प्रतिद्वंद्वी देशों बल्कि भारत, कनाडा और यूरोप जैसे अपने पारंपरिक मित्रों को भी आर्थिक मोर्चे पर चुनौती दी। उन्हें अटूट विश्वास था कि अमेरिकी बाजार की विशालता किसी भी राष्ट्र को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगी। किंतु हकीकत इसके उलट रही। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं छिन्न-भिन्न हो गईं और अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। सत्ता के इसी मद का चरम तब देखने को मिला जब उन्होंने लोकतांत्रिक चुनाव के परिणामों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। यह इस धारणा का परिणाम था कि सत्ता केवल एक व्यक्ति की इच्छा पर टिकी हो सकती है, न कि जनता के सामूहिक जनादेश पर।

बदलती वैश्विक व्यवस्था और नई चुनौतियां

​आज की दुनिया अब वैसी नहीं रही जहाँ केवल एक महाशक्ति का आदेश अंतिम होता था। अमेरिका की आक्रामक नीतियों को अब न केवल उसके विरोधियों बल्कि उसके पुराने सहयोगियों से भी कड़ी चुनौती मिल रही है। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ परमाणु समझौते से एकतरफा बाहर निकलना एक ऐसी कूटनीतिक चूक सिद्ध हुई जिसने क्षेत्र में अस्थिरता का नया दौर शुरू कर दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल व्यापार का सबसे संवेदनशील मार्ग है, वहां बढ़ते तनाव ने साबित कर दिया कि सैन्य शक्ति हमेशा शांति की गारंटी नहीं होती।

​यूरोपीय देशों की बदली हुई नीति इसका एक और स्पष्ट प्रमाण है। जर्मनी और फ्रांस जैसे देश अब खुलकर यह स्वीकार करने लगे हैं कि वे अपनी सुरक्षा और हितों के लिए पूरी तरह वाशिंगटन पर निर्भर नहीं रह सकते। जब अमेरिका ने अन्य देशों पर अपनी व्यापारिक शर्तें थोपने की कोशिश की, तो यूरोपीय देशों ने अपना स्वतंत्र मार्ग तलाशना शुरू कर दिया। जर्मनी के रक्षा नेतृत्व ने तो यहाँ तक कह दिया कि जब महाशक्ति स्वयं अपनी विशाल नौसैनिक शक्ति के बावजूद समुद्रों में सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही, तो वह दूसरों से बलिदान की अपेक्षा कैसे कर सकती है? यह स्थिति दर्शाती है कि विश्व अब एकध्रुवीय नहीं रहा और प्रभुत्व जमाने की कोशिशें अब विपरीत परिणाम दे रही हैं।

संसाधनों का युद्ध और आर्थिक निर्भरता

​व्यापार के मोर्चे पर भी अहंकार को करारी चोट पहुंची है। लंबे समय तक तकनीक और वित्त पर अपना एकाधिकार मानने वाले देशों को अब चीन जैसी शक्तियों ने आईना दिखाया है। चीन ने दुर्लभ खनिजों जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों को एक रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया है। ये खनिज आधुनिक युग की अनिवार्यताओं जैसे मोबाइल फोन, बिजली से चलने वाले वाहन और अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए रीढ़ की हड्डी के समान हैं। चीन के पास इन संसाधनों का विशाल भंडार है और उसने स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक निर्भरता अब एकतरफा नहीं हो सकती। अमेरिका सहित कई विकसित देशों को इस झटके ने यह समझने पर मजबूर कर दिया कि आर्थिक अहंकार के दिन अब लद चुके हैं।

भारत की संतुलित और यथार्थवादी कूटनीति

​इस उथल-पुथल भरे दौर में भारत ने स्वयं को अहंकार के जाल से दूर रखते हुए एक संतुलित कूटनीति का परिचय दिया है। भारत इस सत्य को समझता है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान और अन्य खाड़ी देश कितने महत्वपूर्ण हैं, जबकि सामरिक सुरक्षा के लिए उसे अन्य बड़ी शक्तियों के साथ भी तालमेल बिठाना होगा। भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा उसी होर्मुज मार्ग से आता है जहाँ तनाव बना रहता है। इसलिए भारत ने किसी एक खेमे में खड़े होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा है। यह रणनीति किसी अहंकार पर नहीं बल्कि यथार्थवाद और संवाद की शक्ति पर आधारित है, जो आज के बहुध्रुवीय विश्व की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

इतिहास की सीख और सत्ता का मद

​शक्ति से उपजे अहंकार की यह कहानी केवल आधुनिक राष्ट्रों तक सीमित नहीं है। इतिहास के पन्ने ऐसे उदाहरणों से रंगे हैं जहाँ नेताओं ने अपनी सीमाओं को विस्मृत किया और पतन का शिकार हुए। भारत में सत्तर के दशक में जब सत्ता एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट गई और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास हुआ, तो जनता ने अपने मताधिकार के माध्यम से उस अहंकार को चकनाचूर कर दिया। वह ऐतिहासिक हार इस बात का प्रमाण थी कि जनता से बड़ी कोई शक्ति नहीं होती।

​केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि खेल और कला के जगत में भी यही नियम लागू होता है। साइकिलिंग की दुनिया में अजेय माने जाने वाले लांस आर्मस्ट्रांग ने वर्षों तक अपने रसूख और ताकत के बल पर नियमों को ताक पर रखा, लेकिन जब सच्चाई सामने आई तो उन्हें न केवल अपने सारे खिताब खोने पड़े बल्कि उनकी प्रतिष्ठा भी धूल में मिल गई। इसी तरह हॉलीवुड के शक्तिशाली निर्माता हार्वे वाइंस्टीन का मामला यह सिद्ध करता है कि पद और प्रभाव का दुरुपयोग अंततः विनाश की ओर ही ले जाता है। इन सभी मामलों में एक बात समान थी कि नायक ने स्वयं को नियमों से ऊपर मान लिया था।

सैन्य शक्ति का भ्रम और वैश्विक अशांति

​वर्तमान समय में सैन्य खर्च के आंकड़े डराने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थाओं के अनुसार दुनिया का रक्षा बजट ढाई खरब डॉलर के करीब पहुँच गया है, जिसमें अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह विशाल खर्च दुनिया में शांति और स्थिरता ला सका है? अफगानिस्तान का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ दो दशकों तक खरबों डॉलर बहाने और आधुनिकतम हथियारों का प्रयोग करने के बाद भी अंततः वही स्थिति बनी रही जिसे बदलने का दावा किया गया था। इराक और लीबिया में किए गए सैन्य हस्तक्षेपों ने उन देशों को अराजकता के गर्त में धकेल दिया। यह इस अहंकार का परिणाम था कि किसी एक विशेष शासन प्रणाली या विचारधारा को पूरी दुनिया पर बंदूक के बल पर थोपा जा सकता है।

शक्ति का वास्तविक अर्थ और भविष्य का मार्ग

​आज का विश्व पूरी तरह बदल चुका है। अब रूस, चीन, भारत और यूरोपीय संघ जैसे कई शक्ति केंद्र उभर आए हैं जो अपने निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसे में “मेरा रास्ता ही सही रास्ता है” वाली सोच न केवल अप्रासंगिक है बल्कि खतरनाक भी है। शक्ति का वास्तविक अर्थ दूसरों को दबाना या नियंत्रित करना नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखना और जिम्मेदारी का निर्वाह करना है। जो राष्ट्र या नेता इस शाश्वत संतुलन को नहीं समझ पाते, वे इतिहास के उसी चक्र में फंस जाते हैं जहाँ शक्ति से अहंकार पैदा होता है और अहंकार अंततः पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है।

​अंततः हमें यह समझना होगा कि स्थायी प्रभाव और सम्मान केवल संवाद, आपसी सहयोग और एक-दूसरे की संप्रभुता के सम्मान से ही प्राप्त किया जा सकता है। इतिहास की चेतावनी बहुत स्पष्ट है कि जब भी मनुष्य या राष्ट्र अपनी शक्ति के मद में अंधा होकर प्राकृतिक और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो नियति उसे दंड देने के लिए अवश्य आती है। भविष्य का रास्ता अहंकार में नहीं, बल्कि समावेशी विकास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में निहित है। यदि हम अतीत की इन गलतियों से सीख नहीं लेते, तो हम उसी पतन की ओर बढ़ने के लिए अभिशप्त रहेंगे जिसका सामना पूर्व के अहंकारी साम्राज्यों ने किया है।

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