नर गैंडा नेपोलियन नें मादा से मिलन में बाधक शावक को मार डाला
दुधवा, 28 जनवरी। दुधवा टाइगर रिज़र्व में छह माह के भीतर दूसरे गैंडे के शावक की मौत ने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। ताज़ा मामले में मृत शावक के आसपास मिले निशानों और व्यवहार संबंधी साक्ष्यों के आधार पर वयस्क नर गैंडे ‘नेपोलियन’ की भूमिका की जांच की जा रही है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, घटना टाइगर रिज़र्व के उस क्षेत्र में हुई जहां गैंडा पुनर्स्थापन परियोजना के तहत कई गैंडे विचरण कर रहे हैं। शावक का शव मिलने के बाद जब स्थल का निरीक्षण किया गया तो संघर्ष के स्पष्ट निशान पाए गए। प्रारंभिक आकलन में यह मामला गैंडों के आपसी टकराव या आक्रामक व्यवहार से जुड़ा माना जा रहा है।
यह उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी लगभग छह माह पूर्व एक अन्य गैंडे के शावक की मौत इसी क्षेत्र में हुई थी। दोनों घटनाओं में समानताएं पाए जाने के बाद वन विभाग ने वयस्क नर गैंडे ‘नेपोलियन’ की गतिविधियों पर विशेष निगरानी शुरू कर दी है।
अधिकारियों का कहना है कि टाइगर रिज़र्व होने के बावजूद इस घटना में किसी बाघ या अन्य मांसाहारी वन्यजीव के शामिल होने के संकेत नहीं मिले हैं। शव पर पाए गए घाव, पदचिह्न और आसपास की परिस्थितियां अंदरूनी प्रजातीय संघर्ष की ओर इशारा करती हैं।
फिलहाल वन विभाग की एक विशेषज्ञ टीम पूरे मामले का व्यवहारिक और पारिस्थितिक अध्ययन कर रही है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि क्या शावकों की मौतें क्षेत्रीय वर्चस्व, प्रजनन प्रतिस्पर्धा या आवासीय दबाव के कारण हो रही हैं।
गैंडे की प्रवृत्ति: कब और क्यों आक्रामक हो जाता है नर गैंडा
एक सींग वाला भारतीय गैंडा सामान्यतः शांत और एकाकी स्वभाव का शाकाहारी जीव माना जाता है, लेकिन वयस्क नर गैंडे अत्यंत क्षेत्रीय (territorial) होते हैं। वे अपने निर्धारित इलाके में किसी अन्य नर या कभी-कभी मादा और शावक की उपस्थिति को भी चुनौती के रूप में देख सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रजनन काल या सीमित आवास वाले क्षेत्रों में नर गैंडों का आक्रामक व्यवहार बढ़ जाता है। ऐसे समय में वे शावकों को भी अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुँचा सकते हैं—या तो उन्हें खदेड़ने के दौरान या प्रभुत्व जताने की कोशिश में।
गैंडा शावक जन्म के बाद शुरुआती दो से तीन वर्षों तक बेहद संवेदनशील होते हैं। वे मां के आसपास ही रहते हैं और तेज़ गति या अचानक टकराव से गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं। यदि किसी क्षेत्र में गैंडों की संख्या बढ़ जाती है और सुरक्षित खुले क्षेत्र सीमित हो जाते हैं, तो इस तरह की घटनाओं की आशंका भी बढ़ जाती है।
संरक्षण प्रबंधन के लिए चेतावनी
दुधवा टाइगर रिज़र्व में गैंडा पुनर्स्थापन परियोजना देश की महत्वपूर्ण संरक्षण योजनाओं में शामिल है। शावकों की लगातार मौतें इस बात का संकेत हैं कि अब केवल संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि व्यवहार प्रबंधन और आवास संतुलन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
वन विभाग का कहना है कि जरूरत पड़ने पर आक्रामक नर गैंडों की निगरानी बढ़ाई जाएगी और शावक वाली मादाओं के लिए सुरक्षित क्षेत्र चिह्नित किए जाएंगे, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
