नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आईएनए–आज़ाद हिंद फ़ौज और रानी झांसी रेजिमेंट

-देवेंद्र कुमार बुडाकोटी एवं स्वगता सिन्हा रॉय-
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती कुआलालंपुर, मलेशिया में नेताजी वेलफेयर फ़ाउंडेशन द्वारा, भारत के उच्चायोग तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंडियन कल्चरल सेंटर के सहयोग से मनाई गई। यह कार्यक्रम नेताजी की विरासत को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ-साथ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आईएनए–आज़ाद हिंद फ़ौज द्वारा निभाई गई निर्णायक भूमिका को स्मरण करने का भी अवसर था।
कार्यक्रम के अंतर्गत आईएनए–आज़ाद हिंद फ़ौज पर आधारित एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया। विद्यार्थियों द्वारा नेताजी के जीवन और आदर्शों पर मंच प्रस्तुतियाँ दी गईं तथा स्थानीय कलाकारों और प्रतिभागियों ने वंदे मातरम् जैसे देशभक्ति गीत प्रस्तुत किए। आईएनए की सैन्य संरचना और वैचारिक सिद्धांतों पर विद्वतापूर्ण प्रस्तुतियों के साथ-साथ 1943 में मलाया में आईएनए के पुनरुत्थान पर हुई चर्चा ने कार्यक्रम को अकादमिक गहराई प्रदान की। आईएनए की वर्दी में सजे प्रतिभागियों ने उस ऐतिहासिक काल के वातावरण को सजीव कर दिया।
हमारे लिए यह कार्यक्रम अत्यंत भावनात्मक और स्मृतियों से परिपूर्ण था। इसने कुछ वर्ष पूर्व आईएनए के उन पूर्व सैनिकों से हुई मुलाक़ातों की यादें ताज़ा कर दीं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। साथ ही, इसने आईएनए और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उसकी भूमिका पर हमारे अध्ययन और शोध से जुड़ी स्मृतियों को भी पुनर्जीवित किया।
वर्तमान समय में मलेशिया और सिंगापुर के भारतीय प्रवासी समुदाय के लिए आईएनए का विशेष महत्व इस तथ्य में निहित है कि इस सेना की स्थापना और संगठन इसी क्षेत्र में हुआ था। युद्धबंदी (POWs) प्रारंभ में आईएनए के प्रशिक्षित मानवबल का आधार बने, किंतु स्थानीय भारतीय नागरिक आबादी ने स्वयंसेवकों के रूप में इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेष रूप से महिलाओं की रेजिमेंट—रानी झांसी रेजिमेंट—में वे भारतीय महिलाएँ शामिल थीं जिन्होंने कभी भारत नहीं देखा था, फिर भी वे अपने माता-पिता और दादा-दादी से प्राप्त भारतीय संस्कृति और मूल्यों में गहराई से रची-बसी थीं।
आज भारत में महिला अधिकारी हैं, जिनमें पायलट भी शामिल हैं, किंतु कुछ अपवादों—जैसे सैन्य पुलिस कोर (सीएमपी)—को छोड़कर अन्य रैंकों में महिला सैनिकों की नियुक्ति नहीं है। पैदल सेना और बख़्तरबंद रेजिमेंटों में महिला अधिकारियों की भागीदारी का विषय अभी भी विचाराधीन है। इस पृष्ठभूमि में, 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा एक पूर्णतः महिला रेजिमेंट का गठन किया जाना एक अत्यंत दूरदर्शी निर्णय के रूप में उभरता है। 1857 के विद्रोह की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर इसका नामकरण कर उन्होंने भारतीय महिलाओं के साहस, सामर्थ्य और नेतृत्व क्षमता में अपने गहरे विश्वास को अभिव्यक्त किया।
रानी झांसी रेजिमेंट की कमान कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन के हाथों में थी। इस रेजिमेंट ने अनेक महिलाओं को स्वयंसेवक बनने के लिए प्रेरित किया, कई बार पारिवारिक विरोध के बावजूद। विशेष रूप से किशोरियों के मामलों में, परिवारों की सहमति प्राप्त करने के लिए कैप्टन लक्ष्मी स्वयं उनसे भेंट करती थीं। अधिकांश भर्तियाँ बुनियादी रूप से साक्षर थीं और मलाया के रबर बागानों से आती थीं, फिर भी उन्होंने असाधारण प्रतिबद्धता, साहस और अनुशासन का परिचय दिया।
आईएनए का अभियान अपार बलिदानों से भरा हुआ था। विशेषकर इंफाल और कोहिमा मोर्चों पर अनेक सैनिकों ने अपने प्राण न्यौछावर किए, जबकि कुछ ऐसे भी थे जो बिना पर्याप्त अभिलेख या दस्तावेज़ छोड़े जीवित बचे। उनकी कहानियाँ मुख्यतः पारिवारिक स्मृतियों और मौखिक इतिहास के माध्यम से ही आज तक जीवित हैं।
यह काल सियाम–बर्मा ‘डेथ रेलवे’ के निर्माण के दौरान जापानी सेनाओं द्वारा किए गए अत्याचारों की भी स्मृति कराता है। मलाया के हज़ारों भारतीयों को अमानवीय परिस्थितियों में जबरन श्रम के लिए फुसलाया गया या बाध्य किया गया, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक पीड़ा और मृत्यु हुई। समुचित दस्तावेज़ों के अभाव में भारतीय हताहतों की सटीक संख्या अज्ञात है, हालाँकि इस त्रासदी का चित्रण द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई (1957) जैसी पुस्तकों और फ़िल्मों में किया गया है।
आईएनए के पूर्व सैनिकों के लिए युद्धोत्तर जीवन अनेक कठिनाइयों से भरा रहा। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात ही उन्हें औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई, जब अनेक को पुलिस बलों में पुनर्वास मिला और बाद में पेंशन प्रदान की गई। इस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को अंततः स्वीकार किया गया।
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लेखक जेएनयू के पूर्व छात्र हैं। डी. के. बुडाकोटी समाजशास्त्री हैं तथा डॉ. स्वगता सिन्हा रॉय मलेशिया के एक विश्वविद्यालय में अध्यापन करती हैं।
