नया बांग्लादेश: सत्ता परिवर्तन के बीच भारत के लिए कूटनीतिक चुनौतियां
-जयसिंह रावत –
बांग्लादेश की राजनीति ने एक लंबा सफर तय कर 2026 के आम चुनावों के साथ एक नया मोड़ ले लिया है। अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन और शेख हसीना के नाटकीय ढंग से सत्ता त्याग के बाद, यह चुनाव महज एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बांग्लादेश के भविष्य का जनमत संग्रह था। रुझानों और नतीजों ने साफ कर दिया है कि बांग्लादेश की जनता ने ‘परिवर्तन’ को चुना है। तारीक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बहुमत का आंकड़ा पार कर ढाका की सत्ता पर अपनी वापसी सुनिश्चित कर ली है।
जनादेश का संदेश
इस चुनाव में करीब 60 प्रतिशत मतदान होना इस बात का प्रमाण है कि बांग्लादेशी आवाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के लिए कितनी उत्सुक थी। 2024 के विवादित चुनावों के मुकाबले इस बार की भागीदारी ने नई सरकार को एक मजबूत ‘लेजिटिमेसी’ (वैधानिकता) दी है। बीएनपी की जीत के साथ ही जमात-ए-इस्लामी का एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरना यह संकेत देता है कि देश की राजनीति अब दक्षिणपंथी और धार्मिक पहचान की ओर अधिक झुक सकती है। अवामी लीग, जो पिछले डेढ़ दशक से सत्ता के केंद्र में थी, इस बार मुकाबले से लगभग बाहर रही, जो एक युग के अंत जैसा है।
भारत के लिए बदलता परिदृश्य
भारत और बांग्लादेश के संबंध शेख हसीना के 15 साल के कार्यकाल में ‘स्वर्ण युग’ कहे जाते थे। कनेक्टिविटी से लेकर आतंकवाद विरोधी अभियानों तक, ढाका ने नई दिल्ली का भरपूर साथ दिया। लेकिन अब सत्ता की चाबी बीएनपी के पास है, जिसका अतीत भारत के प्रति बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। भारत के लिए अब ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति की असली परीक्षा शुरू होती है।
प्रमुख कूटनीतिक पेच
- सुरक्षा की चिंता: भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा है। हसीना सरकार ने उल्फा (ULFA) जैसे उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश से उखाड़ फेंका था। नई सरकार के साथ भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल दोबारा भारत विरोधी गतिविधियों के लिए न हो।
- समझौतों का पुनर्संतुलन: बीएनपी ने हमेशा आरोप लगाया कि हसीना ने भारत को ट्रांजिट और बिजली जैसे मुद्दों पर ‘एकतरफा’ लाभ दिया। अब नई सरकार इन समझौतों की समीक्षा की मांग कर सकती है, जो व्यापारिक और रणनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा।
- तीस्ता का अनसुलझा सवाल: तीस्ता जल बंटवारा दशकों से दोनों देशों के बीच फांस बना हुआ है। नई सरकार इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाकर घरेलू राजनीति को साधने की कोशिश करेगी। भारत को इस पर कोई मध्यम मार्ग निकालना ही होगा।
- चीन और पाकिस्तान का दखल: यह जगजाहिर है कि बीएनपी का झुकाव बीजिंग की ओर अधिक रहा है। यदि ढाका में चीन का प्रभाव बढ़ता है, तो यह भारत के लिए ‘घेराबंदी’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
व्यावहारिक कूटनीति पर ध्यान देना होगा
बांग्लादेश में नई सरकार का गठन दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को पूरी तरह बदल देगा। भारत को अब ‘इमोशनल डिप्लोमेसी’ के बजाय ‘प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी’ (व्यावहारिक कूटनीति) पर ध्यान देना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पड़ोसी देश में अब एक ऐसी सरकार है जो अपने हितों को प्राथमिकता देगी।
भारत की ओर से एक संतुलित और समावेशी संवाद की आवश्यकता है। बांग्लादेश के साथ हमारे आर्थिक हित और साझा संस्कृति इतनी गहरी है कि कोई भी सरकार उसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती। दिल्ली को अब ढाका के साथ नए सिरे से विश्वास बहाली का पुल बनाना होगा, जिसमें सुरक्षा, व्यापार और जल साझाकरण जैसे मुद्दों पर पारदर्शिता और सम्मान हो।

