नए अनुसंधान लाखों मधुमेह रोगियों के लिए उम्मीद की किरण
The utilization of nano-technological methods for the treatment of renal disorders is the core subject of this review. Additionally, kidney-specific delivery strategies, as well as approaches for limiting NP accumulation in distant organs and ensuring optimal duration for blood clearance, have been taken into account. Besides, the impact of the NPs’ functional and physicochemical features on their capability to target specified kidney regions has been thoroughly examined.
By-Jyoti Rawat-
डायबिटिक नेफ्रोपैथी लंबे समय तक मधुमेह (Diabetes) रहने के कारण होने वाली एक अत्यंत गंभीर जटिलता है, जो टाइप-1 मधुमेह के लगभग 20 से 50 प्रतिशत रोगियों को प्रभावित करती है। इस स्थिति में शरीर की किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती है, जो अक्सर ‘एंड-स्टेज रीनल डिजीज’ (ESRD) यानी किडनी फेलियर तक पहुँच जाती है। मधुमेह के रोगियों में रक्त शर्करा का उच्च स्तर किडनी में ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा करता है और सूजन बढ़ाने वाले अणुओं को सक्रिय कर देता है, जिससे किडनी की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। वर्तमान में इस समस्या के समाधान के लिए प्राकृतिक अणुओं और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों पर गहन शोध किया जा रहा है।
जिंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल्स का नया मार्ग
हाल ही में पुणे स्थित अघारकर अनुसंधान संस्थान (ARI) के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण खोज की है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल्स (ZnO NPs) किडनी के कार्य को बेहतर बनाने और मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं को रोकने में प्रभावी हो सकते हैं। दरअसल, मधुमेह के रोगियों में अक्सर जिंक की कमी देखी जाती है। ये नैनोपार्टिकल्स शरीर में जिंक आयनों को धीरे-धीरे और निरंतर रिलीज करने वाले एक ‘डिपो’ की तरह काम करते हैं। एआरआई के पशु मॉडलों पर किए गए अध्ययनों ने यह साबित किया है कि ये नैनोपार्टिकल्स न केवल ग्लूकोज के स्तर को कम करते हैं, बल्कि इंसुलिन की तरह प्रभाव डालकर बीटा कोशिकाओं के प्रसार में भी मदद करते हैं।
अनुसंधान के उत्साहजनक परिणाम
विस्टार चूहों पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि जिंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल्स से किया गया उपचार इंसुलिन के सामान्य उपचार की तुलना में किडनी की कार्यक्षमता सुधारने में अधिक प्रभावी रहा। यह उपचार उच्च रक्त शर्करा के कारण मरने वाली कोशिकाओं (Podocytes) को सुरक्षा प्रदान करता है और उन आवश्यक प्रोटीनों को संरक्षित करता है जो किडनी के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं। ‘जर्नल लाइफ साइंसेज’ में प्रकाशित यह शोध दुनिया का पहला ऐसा अध्ययन है जो पोडोसाइट कोशिकाओं पर जिंक ऑक्साइड के व्यवस्थित प्रभावों को प्रदर्शित करता है।
भविष्य की संभावनाएं और प्रभाव
यद्यपि इन निष्कर्षों को पूरी तरह से मानव चिकित्सा (Clinical use) में बदलने के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है, लेकिन यह अध्ययन लाखों मधुमेह रोगियों के लिए आशा की एक नई किरण लेकर आया है। नैनोटेक्नोलॉजी का यह प्रयोग भविष्य में एक ‘सप्लीमेंट्री थेराप्यूटिक एजेंट’ के रूप में उभर सकता है, जो न केवल किडनी की बीमारी को रोकने में सक्षम होगा बल्कि रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार करेगा। चिकित्सा जगत अब ऐसे भविष्य की ओर देख रहा है जहाँ नैनो-मेडिसिन के माध्यम से मधुमेह की जटिलताओं को जड़ से प्रबंधित किया जा सके।

