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घी से बनेगा सौंदर्य का भविष्य: पूर्वोत्तर के वैज्ञानिकों ने खोजा हानिकारक केमिकल्स का प्राकृतिक विकल्प

चित्र: घी को वसायुक्त सब्सट्रेट के रूप में उपयोग करके लैक्टोबैसिलस प्लांटारम जेबीसी5 से बायोसरफैक्टेंट उत्पादन का योजनाबद्ध निरूपण जिसमें प्रक्रिया अनुकूलन, लक्षण वर्णन और अनुप्रयोग शामिल हैं

The compound has been found to act effectively against bacterium Staphylococcus aureus responsible for skin and wound infections, and demonstrates enhanced stain removal efficiency when blended with commercial face washes.

नई दिल्ली | 25 फरवरी। क्या आप जानते हैं कि आपके किचन में मौजूद ‘शुद्ध देसी घी’ जल्द ही आपके फेस वॉश और क्रीम का मुख्य हिस्सा बन सकता है? पूर्वोत्तर भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जो ब्यूटी और फार्मा इंडस्ट्री की तस्वीर बदल सकती है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत संस्थान (IASST) के शोधकर्ताओं ने घी का उपयोग करके एक ‘बायोसरफैक्टेंट’ (Bio-surfactant) तैयार किया है। यह न केवल पूरी तरह प्राकृतिक है, बल्कि उन हानिकारक कृत्रिम केमिकल्स का विकल्प भी है जो हमारी त्वचा और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं।

इस खोज में क्या है खास?

  • घी का जादू: प्रोफेसर आशीष के. मुखर्जी और उनकी टीम ने प्रोबायोटिक बैक्टीरिया (Lactobacillus plantarum JBC5) और घी के मेल से इस नए तत्व को लैब में विकसित किया है।

  • बैक्टीरिया का काल: यह यौगिक स्टैफिलोकोकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया को खत्म करने में सक्षम है, जो त्वचा के संक्रमण और घावों के लिए जिम्मेदार होते हैं।

  • दाग-धब्बों की छुट्टी: जब इसे सामान्य फेस वॉश में मिलाया गया, तो गंदगी और दाग हटाने की क्षमता में जबरदस्त इजाफा देखा गया।

  • बेजोड़ स्थिरता: यह बायोसरफैक्टेंट 276°C जैसे ऊंचे तापमान और अलग-अलग pH लेवल पर भी स्थिर रहता है। इसका मतलब है कि यह हर मौसम और परिस्थिति में असरदार रहेगा।

केमिकल को क्यों कहें अलविदा?

आजकल कॉस्मेटिक्स में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर सरफैक्टेंट (जो झाग और सफाई का काम करते हैं) प्रकृति में घुलते नहीं हैं और जहरीले हो सकते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा तैयार यह ‘लिपोपेप्टाइड’ विकल्प न केवल सुरक्षित है, बल्कि बायोडिग्रेडेबल (प्रकृति में घुलनशील) भी है।

“हमारा लक्ष्य इस तकनीक को लैब से निकालकर सीधे मार्केट तक पहुँचाना है, ताकि आम उपभोक्ता को सुरक्षित और प्रभावी उत्पाद मिल सकें।”प्रोफेसर मुखर्जी, निदेशक (IASST)

आगे क्या?

वैज्ञानिक अब इसके ‘कमर्शियल प्रोडक्शन’ के लिए इसकी सुरक्षा (Toxicity evaluation) और सही खुराक पर काम कर रहे हैं। जल्द ही आप ऐसे सौंदर्य प्रसाधन देख पाएंगे जिनमें ‘प्राचीन आयुर्वेद’ और ‘आधुनिक विज्ञान’ का सटीक संतुलन होगा।

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