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भारत में हर पाँच में से सिर्फ़ एक मौत का ही चिकित्सकीय प्रमाणीकरण

 

अध्ययन में बड़ा खुलासा, स्वास्थ्य नीति पर गंभीर सवाल

 

उषा रावत/आदित्य प्रताप –
भारत दुनिया में सबसे अधिक मौतें दर्ज करने वाले देशों में शामिल है, लेकिन हैरान करने वाली सच्चाई यह है कि देश में होने वाली अधिकांश मौतों के वास्तविक कारण ही आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं हो पाते। एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन के अनुसार भारत में केवल 22.5 प्रतिशत मौतों का ही चिकित्सकीय रूप से प्रमाणन (मेडिकल सर्टिफिकेशन) होता है। इसका अर्थ यह है कि हर पाँच में से लगभग चार मौतें बिना डॉक्टर द्वारा पुष्टि किए गए कारण के दर्ज हो रही हैं।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार यह स्थिति विशेष रूप से उत्तर भारत और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अधिक गंभीर है। उत्तर भारत में मौतों के चिकित्सकीय प्रमाणीकरण की औसत दर महज 13 प्रतिशत है, जबकि दिल्ली में यह दर वर्षों से लगभग 57–59 प्रतिशत पर ही ठहरी हुई है। यह स्थिति तब है जब दिल्ली में अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों का सघन नेटवर्क मौजूद है।
स्वास्थ्य नीति अंधेरे में
विशेषज्ञों का कहना है कि मौत के कारणों की सही जानकारी के बिना सरकारें प्रभावी स्वास्थ्य नीति नहीं बना सकतीं। हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर, मधुमेह, संक्रामक रोग, मातृ मृत्यु, दुर्घटनाएँ और आत्महत्याएँ—इन सभी कारणों से होने वाली मौतों का सही आकलन नहीं हो पा रहा है। इससे न केवल बीमारी के बोझ (डिज़ीज़ बर्डन) के अनुमान गलत होते हैं, बल्कि स्वास्थ्य बजट और संसाधनों के आवंटन में भी भारी विकृति आ जाती है।
पूर्व भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल के अनुसार, “जब मौत के कारणों की सही जानकारी नहीं होती, तो राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बीमारियों की व्यापकता का आकलन कठिन हो जाता है। इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं की योजना और डिलीवरी पर पड़ता है, विशेषकर दूरदराज़ क्षेत्रों में।”
महामारी और निगरानी प्रणाली पर असर
कमज़ोर मृत्यु प्रमाणीकरण का असर केवल रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। इससे बीमारी फैलने (आउटब्रेक) की पहचान में देरी होती है और स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली भी कमजोर पड़ती है। ऐसे समय में, जब गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases) वयस्कों की मौतों में लगातार बढ़ती हिस्सेदारी ले रहे हैं, यह कमी और भी गंभीर हो जाती है।
क्षेत्रीय असमानता बेहद गहरी
अध्ययन में क्षेत्रीय असमानताएँ साफ़ तौर पर उभरकर सामने आई हैं। उत्तर और पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों में मृत्यु प्रमाणीकरण की दर एक अंकीय या निम्न दो अंकीय बनी हुई है, जिससे राष्ट्रीय औसत नीचे खिंच रहा है और हर साल लाखों मौतें बिना चिकित्सकीय व्याख्या के रह जाती हैं।
इसके विपरीत दक्षिण और पश्चिमी भारत के राज्य इस मामले में कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन राज्यों में अस्पतालों की रिपोर्टिंग और प्रशासनिक अनुपालन अधिक मजबूत पाया गया है। कुछ केंद्र शासित प्रदेश लगभग सार्वभौमिक कवरेज के करीब हैं—लक्षद्वीप में 94 प्रतिशत से अधिक मौतों का चिकित्सकीय प्रमाणीकरण होता है, जबकि गोवा में यह कवरेज लगभग पूर्ण है।
डॉक्टरों की कमी ही अकेला कारण नहीं
अध्ययन इस धारणा को भी चुनौती देता है कि केवल डॉक्टरों की कमी ही इस खाई का मुख्य कारण है। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अहम कारक यह है कि अस्पताल वास्तव में मौतों की रिपोर्टिंग करते हैं या नहीं। कमजोर प्रदर्शन वाले राज्यों में केवल लगभग आधे पंजीकृत अस्पताल ही मृत्यु के कारणों का डेटा जमा करते हैं, जबकि बेहतर प्रदर्शन वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत से अधिक है।
प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी असर
मृत्यु के कारणों का सही दस्तावेजीकरण न होने से निर्वाचन सूची संशोधन जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाएँ भी प्रभावित होती हैं, जो इसके व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक दुष्परिणामों की ओर इशारा करता है।

यह अध्ययन भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के एक ऐसे अंधे कोने को उजागर करता है, जिस पर अब तक अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। जब तक मौतों के कारणों का सही और व्यापक चिकित्सकीय प्रमाणीकरण नहीं होगा, तब तक न तो प्रभावी स्वास्थ्य नीति संभव है और न ही जनस्वास्थ्य की वास्तविक तस्वीर सामने आ पाएगी।

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