ब्लॉग

खुशियों को तौलने का सबब

– By Piyoosh Rautela 

एक  तरफ जी 20 की अगुवाई तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की पैरवी, तो वही दूसरी तरफ वैश्विक भुखमरी सूचकांक में 121 देशो में हम पीछे से 15वे स्थान पर और इस सूची में उत्तरी कोरियाइथियोपियासूडानरवांडानाइजीरिया व कांगो जैसे  देश हमसे ऊपर।

इतना ही नहीं खुशियों के वैश्विक सूचकांक की 137 देशो की सूची में हम पीछे से 12वे स्थान पर तथा यूक्रेनइराकपलेस्टाइनम्यांमारबांग्लादेशश्री लंका व पाकिस्तान के निवासी हमसे ज्यादा खुश।

आपको इसमें कुछ विरोधाभास सा नहीं लग रहा हैं?

सच मानिये – भुखमरीगरीबीअशिक्षाअन्धविश्वासबेईमानी व बेरोजगारी को ले कर हमने समझौता कर लिया हैं, और हमारे जैसे कुछ अन्य देश हैं जिनके साथ हमारी इन पक्षों में हमेशा से प्रतिस्पर्धा होती चली आयी हैं। बस इन देशों से ऊपर रहना चाहिये, बाकी रहा अपनी खुद की वैश्विक रैंकिंग का – उसे ले कर न ही हम कभी गम्भीर होते हैं और न ही उसे ले कर हमें बुरा ही लगता हैं – बस शर्त इतनी सी हैं कि हमारी रैंक पाकिस्तान से ज्यादा खराब नहीं होनी चाहिये। पर खुशियों के इस सूचकांक ने तो वह कमी भी पूरी कर दी – सो सच में बुरा लगना तो बनता हैं।

सो खुशियों के सूचकांक में 137 देशों के बीच 126वा स्थान और वो भी पाकिस्तान से नीचे – यह पचा पाना हम में से किसी के लिये भी सरल नहीं हैं।

अब आप यह तो मानेंगे कि अच्छा हो या फिर बुरा, हमें तो यही सिखाया गया हैं कि जो कुछ भी हो रहा हैं, ईश्वर की मर्जी से हो रहा हैं। फिर गीता भी तो यही बताती हैं कि हमें फल का विचार किये बिना निर्विकार भाव से अपना कर्म करना चाहिये। मिलजुल  कर यह सब और कुछ करें या न करें, हमें संतोषी जरूर बना देते हैं।

फिर जब असंतोष ही व्यक्ति के खुश न होने का सबसे बड़ा कारण हो, तो ऐसे में हमसे ज्यादा खुश कौन हो सकता हैं?

वैसे यदि इस सूचकांक को तैयार करने वालों में से किसी एक ने भी होलीदिवाली या हमारे अन्य त्यौहार देखे होते या फिर उन्हें शादीसगाईमुंडन जैसे हमारे पारिवारिक समारोहो में सम्मिलित होने का मौका मिला होता या फिर उन्होंने हमारे लोगो के बीच बैठ कर कोई क्रिकेट मैच देखा होता और कुछ नहीं तो उन्होंने राखी के डोर से जुड़े भाई-बहन के रिश्ते के साथ ही देवर-भाभी के मनुहार तथा रिश्तो की प्रग़ाढ़ता को समझा होता – तो वह स्वतः ही खुशियो के इस सूचकांक को तैयार करने की विधि को नकार देते क्योकि प्रत्यक्ष को तो प्रमाण की आवश्यकता होती नहीं।

फिर इन सब अनुभवों के बाद उन्हें सूचकांक बनाने की अपनी विधि को त्यागने के साथ ही यह स्वीकारने में भी जरा सा शक नहीं रह जाता कि हम हिंदुस्तानी दुनिया के सबसे खुश लोगो में शुमार हैं।

वैसे सच कहूँ तो अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओ द्वारा किये गये सर्वेक्षण व जुटाये गये आंकड़ों पर आधारित व ढोल-नगाड़ो के साथ नामी गिरामी मंचो से प्रसारित इन सूचकांकों व रिपोर्टो को नकार पाना सरल नहीं हैं और कई बार तो इनके फेर में खुद अपनी समझ व बुद्धि पर शक सा होने लगता हैं।

ऐसे में और कुछ हो या न हो, इस सूचकांक को तैयार करने की विधि की जाँच-पड़ताल तो बनती हैं।

सूचकांक के इस खेल में देशों का स्थान निर्धारित करने या फिर यह कहें कि निवासियों की खुशी के स्तर का निर्धारण करने के लिये मुख्यतः देश की प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक या मानवीय प्रयोजनों हेतु नागरिको द्वारा किये गए आर्थिक योगदान या दान व नागरिको को उपलब्ध समाज कल्याण लाभ के साथ ही नागरिको की निर्णय निर्धारण स्वतंत्रता के आंकड़ों को आधार बनाया गया है।

उपयोग में लाये गये मानकों पर एक नजर डालते ही आप समझ गये होंगे कि पलड़ा पहले से ही विकसित व उच्च आय वाले देशो के पक्ष में झुका हुवा है और यह सूचकांक इन देशो को बेहतर प्रदर्शन करने का मौका देता है। इसीलिये तो ज्यादातर निम्न आय वाले देश इस सूचकांक की निचली पायदानो पर ही पाये जाते हैं।

आप यह तो मानेंगे कि व्यक्ति की आय कभी भी उसकी खुशी का पैमाना नहीं हो सकती हैं। वरना तो खुशी टाटाबिरला तक ही सीमित होती और मेरे जैसा गरीब कभी मुस्कुरा ही नहीं पाता।

अब आये दिन हर कोई कुछ नया तो कर ही रहा हैं और आज के समय में इस पर कोई रोक-टोक भी नहीं हैं। ऐसे में हम अपने हिसाब से खुशियों का एक नया वैश्विक सूचकांक भी तैयार कर ही सकते हैं।

इस नये खुशियों के सूचकांक को तैयार करने और इसमें देशो का स्थान निर्धारित करने के लिये अबकी बार हम नागरिको की आर्थिक स्थिति से जुड़े पक्षों के विपरीत नागरिको में व्याप्त अवसाद व तलाक दर, बुजुर्ग व्यक्तियों के बच्चो से मिलने का  अन्तराल, दादा-नानी के पोते-पोतियो से सम्बन्ध व व्यक्ति के ईश्वर के साथ सम्बन्ध को आधार बना सकते हैं।

और खुशियों का वैश्विक सूचकांक तैयार करने वाले विशेषज्ञ भी मानेंगे कि ऐसा करने में कहीं कुछ भी गलत नहीं हैं क्योकि उनके द्वारा उपयोग में लाये गये पक्षों की ही तरह ही यह सब भी लोगो की खुशी के स्तर को ही दर्शाते हैं।

अब तक तो आप शायद समझ ही गये होंगे कि हमारे इस खुशियों के सूचकांक के परिणाम कुछ अलग, अनूठे व चौकाने वाले होने वाले हैं।

बाँकियो का जो हो सो हो, पर अबकी बार न ही हम 126वे नम्बर पर आने वाले हैं और न ही पाकिस्तान से नीचे।

(The post खुशियों को तौलने का सबब appeared first on Risk Prevention Mitigation and Management Forum.)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!