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ईरान युद्ध : ट्रम्प का त्वरित जीत का विश्वास साकार होता नज़र नहीं आ रहा

Luke Broadwater-

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राजनीतिक करियर में बार-बार यह दावा किया है कि वे विदेशों में सैन्य कार्रवाई करते हुए अमेरिकी जनजीवन और अर्थव्यवस्था को न्यूनतम नुकसान पहुँचाने में सक्षम हैं। उनकी रणनीति “तेज़, निर्णायक और कम लागत वाली कार्रवाई” पर आधारित रही है। लेकिन ईरान के साथ शुरू हुआ नया युद्ध इस धारणा को चुनौती देता दिखाई दे रहा है।
युद्ध के शुरुआती दिनों में ही छह अमेरिकी नागरिकों की मौत हो चुकी है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों पर हमले हो रहे हैं। शेयर बाज़ार में अस्थिरता है और पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ने लगे हैं। अनुमान है कि अमेरिकी सेना प्रतिदिन सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च कर रही है। दूसरी ओर, ईरान में एक हवाई हमले में 175 स्कूली बच्चियों की मृत्यु की खबर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर दिया है। ट्रंप प्रशासन ने इस घटना की जांच की बात कही है, लेकिन इससे युद्ध की नैतिक और राजनीतिक जटिलता बढ़ गई है।
अब तक अमेरिकी जमीनी सैनिक ईरान की धरती पर नहीं उतरे हैं, परंतु रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने संकेत दिया है कि यह संघर्ष छोटा नहीं होगा। उनका बयान — “हम गति बढ़ा रहे हैं, घटा नहीं रहे” — बताता है कि अमेरिका और अधिक बमवर्षक और लड़ाकू विमान भेज रहा है।
त्वरित सफलताओं से बढ़ा आत्मविश्वास
ट्रंप प्रशासन इससे पहले कई त्वरित सैन्य अभियानों को अपनी सफलता के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, ईरान के परमाणु ठिकानों पर अचानक हमला, यमन में हूती ठिकानों पर कार्रवाई, कैरेबियन में संदिग्ध ड्रग नौकाओं को नष्ट करना, तथा इराक, नाइजीरिया और सोमालिया में आतंकवाद-रोधी हमले—इन सबको कम लागत और सीमित जोखिम वाले अभियान बताया गया।
इन कार्रवाइयों में अमेरिकी जनहानि अपेक्षाकृत कम रही, जिससे ट्रंप का आत्मविश्वास बढ़ा। लेकिन ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल द्वारा शुरू किया गया यह युद्ध उन त्वरित अभियानों से अलग और कहीं अधिक व्यापक है। यदि यह “रेजीम चेंज” यानी सत्ता परिवर्तन की दिशा में बढ़ता है, तो इसकी कीमत कहीं अधिक हो सकती है।
अनंत युद्ध’ की आशंका
कोलोराडो के डेमोक्रेट सांसद और पूर्व सैनिक जेसन क्रो ने चेतावनी दी है कि अमेरिका फिर से “अनंत युद्ध” की राह पर बढ़ रहा है—वैसी ही राह, जैसी इराक और अफगानिस्तान में देखी गई थी। उनका कहना है कि ट्रंप ने चुनाव प्रचार में युद्ध समाप्त करने का वादा किया था, क्योंकि अमेरिकी जनता यही चाहती थी। लेकिन अब वही चक्र दोहराया जा रहा है।
ट्रंप ने ईरान की जनता से अपने शासन के खिलाफ उठ खड़े होने का आह्वान किया है, परंतु किसी विशिष्ट संगठन को समर्थन देने की घोषणा नहीं की है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने स्पष्ट किया कि कुर्द नेताओं से बातचीत हुई है, लेकिन उन्हें हथियार देने की कोई योजना नहीं बनी है।
रणनीतिक लाभ बनाम क्षेत्रीय अराजकता
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ विशेषज्ञ एलियट अब्राम्स का मानना है कि यदि ईरान की सैन्य क्षमता और परमाणु कार्यक्रम को नष्ट किया जाता है, तो यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ा लाभ होगा। उनके अनुसार, ईरानी शासन चार दशकों से अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता रहा है।
लेकिन कैटो इंस्टीट्यूट के रक्षा विशेषज्ञ जॉन हॉफमैन इससे सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि यदि अमेरिका ईरान में जातीय अलगाववादी समूहों को हथियार देकर देश को अस्थिर करने की कोशिश करता है, तो यह मध्य पूर्व में अब तक का सबसे बड़ा प्रॉक्सी युद्ध बन सकता है। इससे बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है और आईएसआईएस जैसे चरमपंथी संगठन फिर से पैर जमा सकते हैं। हॉफमैन ने इसे “पैंडोरा बॉक्स खोलने” जैसा बताया।
आर्थिक और वैश्विक असर
युद्ध का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि की चर्चा है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा। अमेरिका के भीतर भी महंगाई और राजनीतिक असंतोष बढ़ सकता है।
क तेज सैन्य अभियान् नहीं लगता यह
ईरान के साथ चल रहा यह संघर्ष केवल एक और “तेज़ सैन्य अभियान” नहीं लगता। यह मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक संरचना को बदलने वाला कदम हो सकता है। प्रश्न यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन सीमित सैन्य दबाव तक ही खुद को सीमित रखेगा, या यह युद्ध इराक और अफगानिस्तान की तरह लंबे, महंगे और अनिश्चित परिणामों वाला संघर्ष बन जाएगा?
इतिहास बताता है कि युद्ध की शुरुआत अक्सर योजनाबद्ध होती है, लेकिन उसका अंत शायद ही कभी योजनानुसार होता है। ईरान युद्ध भी उसी मोड़ पर खड़ा है—जहाँ त्वरित जीत का सपना और दीर्घकालिक अस्थिरता का खतरा आमने-सामने हैं।

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