मोबाइल से बात करने के लिए पार्वतरोहण करना पड़ता है ग्रामीणों को
सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में बीएसएनएल के टावर बने सफेद हाथी

—हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट—
थराली, 6 मार्च। आज जब दुनिया के कई देश चांद और मंगल ग्रह पर अपने ठिकाने बसाने की तैयारी में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के कई गांवों के ग्रामीण आज भी अपने परिजनों से बात करने के लिए ऊंची पहाड़ियों और डांडा-काठियों तक जाने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने इन क्षेत्रों में पांच मोबाइल टावर स्थापित किए हैं, लेकिन वे ग्रामीणों के लिए एक तरह से सफेद हाथी साबित हो रहे हैं।
दरअसल विकासखंड देवाल के अंतर्गत पिंडर क्षेत्र के मेलखेत, खेता-मानमती, चोटिंग, उदेपुर, हरमल, झलिया, रामपुर और तोरती सहित कई गांवों के ग्रामीणों को बेहतर संचार सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बीएसएनएल द्वारा उदेपुर, धार कुंवरपाटा, मुनियाली खेत और मेलखेत में चार 4जी मोबाइल टावर स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा पहले से स्थापित खेता टावर को भी 2जी से अपग्रेड कर 4जी में बदल दिया गया है।
इसके बावजूद इन टावरों से ग्रामीणों को अपेक्षित संचार सुविधा नहीं मिल पा रही है। स्थिति यह है कि अधिकतर समय मोबाइल से सामान्य कॉल तक नहीं हो पाती। कभी-कभार केवल डाटा कॉलिंग ही संभव हो पाती है। ग्रामीणों का कहना है कि इन टावरों को स्थापित किए हुए करीब दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज तक इनका विधिवत संचालन शुरू नहीं हो पाया है।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि बीएसएनएल ने तीन मोबाइल टावरों को स्वीकृति ग्राम पंचायतों के विपरीत दूसरे गांवों में स्थापित कर दिया है, जिससे नेटवर्क कनेक्टिविटी की समस्या और बढ़ गई है। उदाहरण के तौर पर हरमल गांव के नाम से स्वीकृत टावर को उदेपुर में, बजेई (मोपाटा) के नाम से स्वीकृत टावर को मानमती के धार कुंवरपाटा में तथा तोरती गांव के नाम से स्वीकृत टावर को मुनियाली खेत (मानमती) में स्थापित कर दिया गया है।
क्षेत्र पंचायत सदस्य हरमल-चोटिंग रमेश गड़िया का कहना है कि स्थापित बीएसएनएल टावरों को विधिवत रूप से संचालित कराने के लिए लगातार शासन, प्रशासन और बीएसएनएल के उच्च अधिकारियों से पत्राचार किया जा रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
उन्होंने बताया कि संचार सुविधा के अभाव में क्षेत्र के छात्र-छात्राओं को ऑनलाइन शिक्षा में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही मनरेगा जैसी रोजगारपरक योजनाओं में भी दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि अब कार्यों की उपस्थिति और भुगतान की प्रक्रिया ऑनलाइन हो चुकी है। कमजोर नेटवर्क के कारण इन कार्यों के संचालन में भी बाधा उत्पन्न हो रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही टावरों का नियमित संचालन शुरू नहीं किया गया तो उन्हें मजबूर होकर आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। वहीं आम ग्रामीणों को भी रोजमर्रा के संचार कार्यों के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
