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तमिलनाडु में 3500 वर्ष पहले भी कोदा- झंगोरा जैसा।मोटा अनाज था मुख्य आहार

चेनई, 6 फरबरी। आज जब मोटे अनाज को ‘सुपर फूड’ और भविष्य की खेती का आधार बताया जा रहा है, तब यह जानना रोचक ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण भी है कि दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, मोटे अनाज की खेती और खपत कोई नई परंपरा नहीं है। एक हालिया पुरातात्विक-वनस्पति विज्ञान (आर्कियोबॉटनिकल) अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि पश्चिमी घाट की तलहटी में रहने वाले लोग लगभग 3500 वर्ष पहले भी बाजरा, कोदो, सामा और रागी जैसे मोटे अनाजों पर आधारित जीवन जी रहे थे।
यह अध्ययन कोयंबटूर के पास पश्चिमी घाट क्षेत्र में स्थित मोलापलायम नामक नवपाषाणकालीन स्थल से प्राप्त नमूनों पर आधारित है, जिसकी तिथि लगभग 1600 ईसा पूर्व मानी गई है। यह शोध पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया, जिसमें जले हुए बीजों और अनाज के अवशेषों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में जिन फसलों के प्रमाण मिले हैं, उनमें कोदो मिलेट (वरागु), लिटिल मिलेट (सामाई), प्रोसो मिलेट (पणिवारागु), ब्राउनटॉप मिलेट (कुला-सामाई), फॉक्सटेल मिलेट (तिनै) और बरनयार्ड मिलेट (कुथिरवाली) प्रमुख हैं। उल्लेखनीय है कि इन अनाजों का उल्लेख संगम साहित्य में भी मिलता है, जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी तक के काल को दर्शाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि मोटे अनाज केवल भोजन नहीं, बल्कि तमिल सभ्यता की कृषि और सांस्कृतिक संरचना का अभिन्न हिस्सा थे।
शोधकर्ताओं ने बताया कि पहली बार नवपाषाण काल में इतनी विविधता वाले मोटे अनाजों की खेती के ठोस प्रमाण सामने आए हैं। इसके अलावा, काले चने, हरे चने, कुल्थी (हॉर्स ग्राम), हायसिंथ बीन और बेर जैसे फलों के बीज भी पाए गए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय की कृषि व्यवस्था बहुफसली और पोषण-समृद्ध थी।
इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि तमिलनाडु में तुअर दाल (तूर) के उपयोग का यह अब तक का सबसे प्राचीन प्रमाण है। इसका अर्थ है कि दाल-अनाज आधारित संतुलित आहार की परंपरा यहां कम से कम 3500 वर्ष पुरानी है।
पशुपालन और शिकार के भी ठोस साक्ष्य मिले हैं। बकरी, भेड़, गाय और भैंस की हड्डियों से यह संकेत मिलता है कि पशु पाले जाते थे, जबकि हिरण और एंटीलोप की हड्डियां शिकार की प्रथा को दर्शाती हैं। इससे स्पष्ट है कि उस समय की जीवनशैली केवल खेती तक सीमित नहीं थी, बल्कि मिश्रित आजीविका पर आधारित थी।
चावल की खेती के संदर्भ में भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण जानकारी देता है। तमिलनाडु में चावल की सबसे प्रारंभिक खेती के प्रमाण तामिराबरानी नदी बेसिन से मिले हैं, जिनमें आदिचनल्लूर और शिवगलाई जैसे स्थल शामिल हैं। बाद के लौह युगीन और प्रारंभिक ऐतिहासिक स्थलों पर बाजरा और चावल दोनों की खेती के प्रमाण मिलते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि समय के साथ कृषि प्रणाली और अधिक विकसित हुई।
विशेषज्ञों के अनुसार, मोटे अनाजों की खेती मुख्यतः वर्षा आधारित थी और यह अर्ध-शुष्क से उप-आर्द्र परिस्थितियों में की जाती थी। मानसून के दौरान बाजरा उगाया जाता था, जबकि मानसून के बाद दलहन की खेती होती थी। यह एक सुव्यवस्थित मौसमी कृषि कैलेंडर की ओर इशारा करता है, जो उस समय के लोगों की पर्यावरणीय समझ और अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।
आज के संदर्भ में यह अध्ययन इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि मोटे अनाज कम पानी में उगने वाले, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील और पोषण से भरपूर होते हैं। आधुनिक भारत में जब सूखा, जल संकट और कुपोषण जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब प्राचीन तमिल कृषि प्रणाली से सीख लेकर भविष्य की खेती की दिशा तय की जा सकती है।
यह शोध न केवल तमिलनाडु की प्राचीन कृषि परंपरा को उजागर करता है, बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि भारत में मोटे अनाज कोई वैकल्पिक भोजन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से मानव सभ्यता का आधार रहे हैं। इतिहास की यह झलक हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि शायद भविष्य की खाद्य सुरक्षा का रास्ता अतीत की समझ से होकर ही जाता है।

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