मसखरेबाज त्यागी जी ……….!

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
महावीर त्यागी बड़े प्रखर बुद्धि के राजनेता थे। उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन में कई तरह की भूमिकाए निभाई। उनका कैरियर ब्रिटिश आर्मी से शुरू हुआ था। जलियां वाला बाग गोली काण्ड के समय उन्होंने विरोध में सेना से त्यागपत्र दिया तो अंग्रेजों ने उनका कोर्ट मार्शल कर उन्हें जेल में डाल दिया था। वे का़ंग्रेस के बड़े सक्रिय सदस्य रहे इसलिए पंडित मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू के बहुत करीबी मित्र भी थे।
एक समय वह देहरादून की जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे, उसी दौरान उन्होंने टिहरी रियासत की सामंतवादी शासन के विरुद्ध श्रीदेव सुमन का भी साथ दिया था और आजादी के बाद रियासत का भारतीय गणतंत्र में विलय के लिए प्रयास किए थे। खैर, यह सब तो इतिहास की बातें हैं ,सबको पता ही है लेकिन यहां इस पोस्ट में होली की मस्ती से संबंधित उनसे जुड़ा एक मनोरंजक किस्सा सुनाने का मन किया।
होली के ऱंगीले मौके पर त्यागी जी जैसे मस्त- मौला स्वभाव और लाजबाव सेंस ऑफ ह्यूमर वाले व्यक्ति की याद आ ही जाती है।
वह नेहरू जी से बहुत लिबर्टी ले लेते थे, जो नेहरू जी के अन्य सहयोगी वैसी हिम्मत कभी न दिखा सके। होली के दिन सभी नेतागण नेहरू जी से होली मिलने उनके आवास पर गये। बाकी सब ने तो रस्मीतौर पर उनके माथे पर गुलाल लगाया लेकिन त्यागी जी ने पहले तो अपने रुमाल से उनका गाल पोंछा फिर अपने दांत उनके गाल पर ऐसे चुभो दिए कि नेहरू जी थोड़ी देर तक बिलबिलाते रह गये थे। साथ में यह भी कहा कि- तुमको तो सबके गाल चूमने की आदत थी यह इसलिए किया अब कौन बूढे आदमी के गाल चूमने आयेगा तुम्हारे पास ? यह सुनकर नेहरु जी भी प्रफुल्लित हो गये …
वह चित्र अगले दिन सभी अखबारों की लीड स्टोरी बनी। मेरे पिता जी ने अखबार में छपा वह फोटो मुझे भी दिखाया था,.इसी प्रसंग पर निराला जी की ये पंक्तियां सुनाता चलूं -नयनों के डोरे लाल गुलाल-भरे, खेली होली! मली मुख-चुंबन-रोली। कली-सी काँटे की तोली। बनी रति की छबि भोली।”—
..उनके और भी दिलचस्प संस्मरण हैं लेकिन वह फिर कभी सही। …
