राजनीतिक खोखलापन और पहाड़ी विकास का प्रश्न

-देवेंद्र कुमार बुडाकोटी-
भारतीय मध्यम वर्ग जब निजी दायरों में राजनीति पर चर्चा करता है, तो वह प्रायः व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व में व्याप्त भ्रष्टाचार का उल्लेख करता है। भ्रष्टाचार को सामान्यतः खराब शासन और सरकारी तंत्र में काम करवाने के लिए धन के लेन-देन तक सीमित समझ लिया जाता है। किंतु नीतियों, योजना-निर्माण और कार्यक्रमों की दिशा से जुड़े गहरे प्रश्नों पर अपेक्षित विमर्श नहीं हो पाता। इस आलोचनात्मक समझ के अभाव से समाज में राजनीतिक खोखलापन पनपता है।
James Madison, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के चौथे राष्ट्रपति थे, ने कहा था—“यदि मनुष्य देवदूत होते, तो किसी सरकार की आवश्यकता न होती।” यह कथन शासन-व्यवस्था की अनिवार्यता के साथ-साथ उसकी शुचिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। वरिष्ठ स्तंभकार M. Shanmugam लिखते हैं, “राजनीति को भारी धनराशि की आवश्यकता होती है। बहुत कम राजनेता बिना भ्रष्टाचार का सहारा लिए और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किए राजनीति में टिक पाते हैं।” यह टिप्पणी समकालीन राजनीतिक व्यवस्था के संरचनात्मक दबावों को उजागर करती है।
सत्ता में बैठे अनेक राजनेताओं और उनसे जुड़े लोगों ने अपनी ज्ञात आय से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की है। इसके बावजूद वे बिना किसी पश्चाताप, कानून के भय या राजनीतिक परिणामों की चिंता के सक्रिय बने रहते हैं—यहाँ तक कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के भीतर भी। कुछ पर केवल अवैध लेन-देन के आरोप हैं, जबकि कुछ न्यायालयों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं और राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए दल-बदल करते रहते हैं। इसके बावजूद उन्हें मतदाताओं के एक वर्ग का समर्थन प्राप्त रहता है। कई नेताओं ने चुनाव प्रबंधन और हेरफेर की कला में महारत हासिल कर ली है। राजनीतिक समझ, नेतृत्व क्षमता या सामाजिक दृष्टि के बजाय “हाई कमान” से निकटता के आधार पर टिकट वितरण की प्रवृत्ति मजबूत हुई है। चुनाव जीतना ही अंतिम लक्ष्य बन जाता है, जो राजनीतिक विवेक और सामाजिक सरोकारों से कट जाता है। राजनैतिक दूरदर्शिता अनेक आकांक्षियों की बौद्धिक परिधि से बाहर प्रतीत होती है।
अनेक नेता पार्टी की विचारधारा और नेतृत्व के प्रति शपथ तो लेते हैं, परंतु विचारधारात्मक आधार की वास्तविक समझ और राष्ट्रीय विकास की स्पष्ट दृष्टि का अभाव दिखता है। ऐसी स्थिति में सिविल सेवक नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को दिशा देते हैं और निर्वाचित प्रतिनिधियों को सूक्ष्म रूप से नौकरशाही सोच की ओर मोड़ देते हैं।
जिला स्तर का उदाहरण लें। मुख्य विकास अधिकारी अपने संगठित प्रशासनिक तंत्र के साथ निर्णय-प्रक्रिया पर प्रभावी पकड़ रखते हैं। खंड स्तर पर खंड विकास अधिकारी (BDO) और अधीनस्थ अधिकारी भी शासन-प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि—जैसे ज़िला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और ग्राम प्रधान—अक्सर पहले से तैयार “विकास स्क्रिप्ट” का पालन करते हुए आधिकारिक दिशा-निर्देशों का अनुसरण करते हैं। जब विकास की संरचना यथास्थिति बनाए रखने के लिए दृढ़तापूर्वक खड़ी हो, तो क्या वास्तविक “नीचे से ऊपर” (Bottom-up) दृष्टिकोण संभव है?
निस्संदेह, कुछ पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के सदस्य संपत्ति अर्जित कर सकते हैं। परंतु मूल प्रश्न यह है कि विकास निधियों के प्रबंधन का प्रारूप, तंत्र और कार्य-संस्कृति उन्हें कौन उपलब्ध कराता है? निर्वाचित प्रतिनिधि बदल सकते हैं, परंतु स्थायी नौकरशाही बनी रहती है—और नए प्रतिनिधियों को उसी व्यवस्था में ढाल देती है।
ऐसे में जिला विकास तंत्र को सुधारने या पुनर्गठित करने की दृष्टि और क्षमता किसके पास है? जब राजनीतिक दल लगभग हर वर्ग को सरकारी नौकरी का वादा करते हैं, तो विशाल सरकारी विकास तंत्र को कम करने या पुनर्संरचित करने की कल्पना कौन करेगा? क्या हम निर्वाचित PRI प्रतिनिधियों को वास्तविक जमीनी शासन सौंपने की कल्पना कर सकते हैं? यदि राजनीति सरकारी रोजगार के वादों और बेरोज़गारों को संतुष्ट करने तक सीमित हो जाए, तो क्या यह भारतीय समाज में राजनीतिक खोखलेपन का संकेत नहीं है?
Uttarakhand में, जब तक Gairsain को स्थायी राजधानी घोषित नहीं किया जाता और व्यापक भू-संकेन्द्रण (चकबंदी) लागू नहीं होती, तब तक “रिवर्स माइग्रेशन” एक रोमानी कल्पना ही बना रहेगा, न कि ठोस नीतिगत वास्तविकता। सामाजिक परिवर्तन में “रिवर्स गियर” नहीं होता। संरचनात्मक बदलाव के लिए स्पष्ट दृष्टि, राजनीतिक साहस और संस्थागत सुधार अनिवार्य हैं। प्रश्न यह है कि क्या हमारे सार्वजनिक बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के पास शासन और सार्वजनिक नीति के मुद्दों पर प्रभावी हस्तक्षेप करने तथा ठोस रूपरेखा प्रस्तुत करने का कोई सशक्त मंच है?
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लेखक एक समाजशास्त्री हैं और Jawaharlal Nehru University के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध कार्य का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता Amartya Sen की पुस्तकों में किया गया है।
