“सत्ता बनाम नैतिकता : पित्रिम सोरोकिन का अमर प्रश्न — जनता के रक्षकों की रखवाली कौन करेगा?”

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा
” जनता के रक्षकों की रखवाली आखिर कौन करेगा ?- क्या उन्हे ‘ दुष्ट मतलबी समूह’ (‘Rascal Selfish Syndicate’ ) के हवाले छोड़ दोगे या फिर निर्वाचक जनता खुद करेगी ? यह सवाल रूस में पैदा हुए विश्व विख्यात समाजशास्त्री पित्रिम सोरोकिन( Pitirim Sorokin) ने अपनी पुस्तक ‘सत्ता और नैतिकता’ (Power and Morality ) में पूछा था ।
सत्ता और नैतिकता का संयोग बडी मुश्किल से ही बनता है ,क्योंकि नैतिकता का सीधा सम्बन्ध मनुष्यता से है और सत्ता तो कभी-कभी मनुष्यता की बलि देकर प्राप्त की जाती है,शायद यही वजह है मनुष्य को किसी सत्ताधारी ने अपना प्रतीक चिन्ह नहीं बनाया है I अशोक ने अपने सौ भाइयों की हत्या करके सत्ता प्राप्त की , सत्ता के प्रतीक चिन्ह हिंसक जंतु या हथियार ही रहे हैं मनुष्य कभी नहीं रहा I धनुष बाण तलवार कृपाण, शेर ,सांप ,बाज ,चील, ड्रैगन ,मगरमच्छ अभी भी केई डरावने सत्ता के प्रतिक चिन्ह हैं I सोरोकिन की यह पुस्तक Bhawan ‘s Book यूनिवर्सिटी ने साठ के दशक में प्रकाशित की थी I

सोरोकिन सोशल एक्टिविस्ट थे और उन्होंने रूस के निरंकुश शासकों के विरुद्ध वैचारिक बिद्रोह खड़ा किया लिहाज़ा वहाँ के कम्युनिस्ट शासकों ने उनको जेल में बंद कर दिया, गंभीर आरोप लगाये गए लेकिन एक संवेदनशील जज ने समाजशास्त्र में उनके योगदान को देखते हुए फांसी की सजा के बजाय उन्हें देश निष्कासन का दंड दे दिया I १९२३ में सोरोकिन ने अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से criminology में डिग्री हासिल की ,शोध कार्य किया और फिर वहीँ प्रोफेसर नियुक्त हो गए I उन्होंने ही हार्वर्ड विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र को अध्ययन का एक नया विषय जोड़ा और उसी की नक़ल में फिर यह विषय अन्य विश्वविद्यालयों में भी introduce किया गया I
सोरोकिन मूलतः अहिंसावादी थे वह कहते थे -“घृणा घृणा को ही जन्म देती है ,हिंसा से हिंसा पैदा होती है ,पाखण्ड का जबाब पाखण्ड ही बनता है और युद्ध दुसरे युद्धों का कारण बनता है, इसी प्रकार प्रेम से प्रेम पनपता है ” उनकी एक और किताब भवन यूनिवर्सिटी ने प्रकाशित की थी Reconstruction of humanity यह पुस्तक भी समाज शास्त्र के अध्ययन में मील का पत्थर बनी I मैंने सुना था कि गाँधी जन्म शताब्दी से पूर्व उनको हिन्दुस्तान बुलाने का इरादा था कुछ लोगों का लेकिन सोवियत रूस की नाराजी के डर से विचार छोड़ दिया गया I सोरोकिन की मृत्यु ११ फरवरी १९६८ को हो जाने से भी यह संभव न हो सका-
