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देश में चिकित्सा विज्ञान के पहले पी एच डी. प्रो देश बंधु बिष्ट

 

-डा0 योगेश धस्माना
भारत ही नहीं समूचे विश्व को नमक में आयोडीन की विधि की खोज करने वाले,और मेडिकल साइंस में पहले कार्डियोलॉजी के साथ मैडिसन में डबल पी एच. डी करने वाले प्रो दीन बंधु बिष्ट का संबंध गढ़वाल जिले के बीरोंखाल ब्लॉक के बंगार गांव से रहा है।

कुशाग्र बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा के धनी दीन बंधु बिष्ट का जन्म 1927 में हुआ था।गांव की प्राइमरी स्कूल फिर पौड़ी मिशन स्कूल ओर इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण करने के बाद देश के प्रतिष्ठित कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एम बी बी एस परीक्षा पास करने के बाद इसी कॉलेज से कार्डियोलोजी में पी एच डी करने वाले पहले छात्र बनने का गौरव भी उन्हें प्राप्त हुआ था।
इस तरह 1959 से उन्होंने पांडिचेरी मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने लगातार 25 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया।
विश्व में अपने शोध पत्रों ओर कार्यों से पहचान बनाने वाले प्रो. बिष्ट को भारत सरकार ने देश के पहले राष्ट्रीय अध्यापन प्रशिक्षण संस्थान का निदेशक बनाया।चिकित्सा विज्ञान में नित नई खोज ओर प्रशासनिक क्षमताओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें दिल्ली में एम्स का निदेशक बनाया।

इससे पूर्व उनकी शोध दृष्टि को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ओर सी वी रमन संस्थान द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।भारत में उनके स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धि को देखते हुए, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उन्हें सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करने के बाद भारत देश का कंट्री हेड बना कर जो सम्मान दिया, उस स्तर तक पहाड़ की कोई प्रतिभा नहीं पहुंच सकी है।
प्रो देश बंधु ने अपने प्रारंभिक जीवन में 10 से अधिक मेडल स्कॉलरशिप प्राप्त किए थे। पांडिचेरी में प्रोफसर बनने से पूर्व इन्होंने कलकत्ता,लखनऊ, लुधियाना मेडिकल कॉलेजों में अध्यापन कार्य किया।
प्रो देश बंधु बिष्ट विष विज्ञान विषय में खास रुचि थी।उन्होंने विज्ञान की विशेषकर टेक्सोलॉजी पर कुछ पुस्तकों का भी प्रकाशन किया। विलेगटन अस्पताल दिल्ली में आधुनिक उपकरणों से लैस पहली कोनोनेरी केयर यूनिट की स्थापना भी उनके प्रयासों से ही संभव हुई थी।नमक को आयोडाइज्ड बनाने की खोज आपके मौलिक चिंतन की खोज माना जाता हैं।बनारस,अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेजों,चिकित्सालयों और यूजीसी द्वारा नियुक्त स्पेशल कमीशन के आप अध्यक्ष रहे।आपकी प्रसिद्ध कृति बेसिक प्रिंसिपल ऑफ मेडिकल रिसर्च पुस्तक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा पुरस्कृत है। अपने अध्ययन काल में आप नेताजी सुभाष चंद्र बोस वालीएंटियर ब्रिगेड में सार्जेंट मेजर रह चुके थे। इसी क्रम में 1952 में गणतंत्र दिवस परेड के अवसर पर आपको सम्मानित किया गया था।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रो बिष्ट प्रारंभ से ही कुष्ठ रोग निवारण हेतु अनेक संगठनों के साथ निस्वार्थ सेवा प्रदान करते रहे।इसके चलते विश्व के अनेक देशों ने उन्हें टीबी ओर कुष्ठ रोग नियंत्रण कार्यक्रम का ज्वाइंट प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर भी बनाया था।

जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी रुचि दर्शन ओर अध्यात्म की ओर हो गई थी। पांडिचेरी में रहते हुए डॉ देश बंधु महर्षि अरविंदो सोसायटी से जुड़कर अपनी सेवाएं देते रहे। अरविंदो ओर माताश्री के कार्यों से उनका जुड़ाव जीवन के अंतिम वर्षों तक बना रहा। जीवन के अंतिम वर्ष तक देश बंधु अध्यात्मवाद की प्रख्यात संस्था श्री अरविंद इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फार इंटीग्रल हेल्थ एंड रिसर्च के अध्यक्ष रहे।
एक यादगार शख्सियत की कहानी 16अप्रैल 2009 को पांडिचेरी के इसी आश्रम में समाप्त हुई। उनकी पत्नी श्रीमती प्रभा आज 90 वर्ष की आयु में नोएडा में अपनी पुत्रियों के साथ रह रही हैं।
दुर्भाग्य ओर हैरत की बात देखिए कि वर्तमान शिक्षा ओर स्वास्थ्यमंत्री धन सिंह रावत इलाके से संबंध सरकाने वाले प्रो देश बंधु को उनकी सरकार जानती तक नहीं है। हैरत की बात यह भी हे कि 1994।में मैं कुमाऊं विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी गई थी,किंतु हमारा गढ़वाल विश्वविद्यालय उन्हें जानता तक नहीं है,उन्हें सम्मान देना तो बहुत दूर की बात हे।
क्या हमारी कृतघ्नहीन सरकार राज्य में प्रो दीन बंधु के कद के अनुरूप कोई स्वास्थ्य पारी योजना का निर्माण करने के साथ ही, राज्य के मेडिकल कॉलेज में उनके नाम की चियर स्थापित कर व्याख्यानमाला श्रृंखला का आयोजन कर सकती हे। याद हम इस कार्य में सफल होते हैं तो यह हमारी उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ कि मैंने तीन बार उनके दर्शन किए। पहलीबार जब वह पौड़ी एजेंसी स्थित नरेंद्र भवन में डॉ आलम सिंह जी के पैतृक भवन में अपनी ससुराल आए थे। दूसरी बार पत्रकार योगेंद्र सिंह भंडारी जी के घर पर पत्रकार उमेश डोभाल के संग उनसे बातचीत करने का अवसर मिला था। तीसरी बार उनके साले प्रसिद्ध फोटोग्राफर धीरेन्द्र रावत जी के पुत्र के विवाह के अवसर पर,जब वे सपरिवार पौड़ी आए थे।
एक बातचीत में उनका स्पष्ट कहना था कि कि जब तक गांव में हम डॉक्टर्स के लिए मूलभूत सुविधाएं नहीं सुलभ करते,तब तक उन्हें पहाड़ पर नौकरी के लिए भेजन संभव नहीं होगा।पहाड़ के प्रति उनकी यह चिंता आज भी नीति नियंताओं के सामने यक्ष प्रश्न बन कर खड़ी है।
पाठकों के लिए बहुत मुश्किल से उनका एक फोटो प्रशांत नेगी जी के सहयोग से मिला। एक अन्य फोटो उनके गांव के पैतृक भवन का मिला,जिसे पाठकों के लिए भेज रहा हूं। जागरूक पाठकों से अनुरोध हे कि पहाड़ की दुर्लभ विभूति को उचित सम्मान दिलाने में सहयोग करे।

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