सिद्धांत से वास्तविक दुनिया तक क्वांटम श्रेष्ठता का प्रदर्शन

A new study on how a quantum system can outperform its classical counterpart reshapes our understanding of what is possible with quantum systems and hints at a future where quantum technologies might solve problems classical computers cannot, even when resources are scarce. In the race to build the ultimate computer, quantum systems are often hailed as the future, capable of outclassing their classical counterparts in ways that could revolutionize technology. But proving this quantum advantage has been no small feat. Experiments are notoriously tricky, and fundamental limitations often seem to dash our hopes. They’ve shown that even the simplest quantum system—a single qubit—can outperform its classical counterpart, the bit, in a communication task where no extra help, like shared randomness, is allowed. The theoretical study conducted by Professor Manik Banik and his team at the S. N. Bose Centre, published in the journal Quantum, alongside their collaborative experiment, featured as an Editors’ Suggestion in Physical Review Letters, provides a rare and compelling demonstration of quantum advantage in a real-world scenario.

-UTTARAKHANDHIMALAYA.IN-
एक नया अध्ययन, क्वांटम प्रणाली अपने प्रथम श्रेणी समकक्ष से बेहतर प्रदर्शन कैसे कर सकती है, इस बारे में हमारी समझ को नया आकार देता है कि क्वांटम प्रणालियों के साथ क्या-क्या किया जा सकता है और एक ऐसे भविष्य की उम्मीद जगाता है जहां क्वांटम प्रौद्योगिकियां उन समस्याओं को हल कर सकती हैं जिन्हें प्रथम श्रेणी के कंप्यूटर नहीं कर सकते, खासकर उस स्थिति में जब संसाधन सीमित हों।
सर्वश्रेष्ठ कंप्यूटर बनाने की दौड़ में, क्वांटम सिस्टम को अक्सर भविष्य के रूप में देखा जाता है, जो अपने प्रथम श्रेणी कंप्यूटर को पीछे छोड़ देने में सक्षम है कि वे तकनीक में क्रांति ला सकते हैं। लेकिन इस क्वांटम श्रेष्ठता को साबित करना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। प्रयोग बेहद मुश्किल होते हैं, और बुनियादी सीमित संसाधन अक्सर हमारी उम्मीदों पर पानी फेर देते हैं।
हाल ही में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, एस.एन. बोस राष्ट्रीय मूल विज्ञान केंद्र के शोधकर्ताओं ने क्वांटम सूचना और क्रिप्टोग्राफी की हेनान की लैबोरेटरी, लैबोरेटोयर डी इंफॉर्मेशन क्वांटिक, यूनिवर्सिटी लिब्रे डी ब्रुक्सेल्स और आईसीएफओ-बार्सिलोना इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की टीमों के साथ मिलकर काम करते हुए सफलता हासिल की है।
शोधकर्ताओं ने कर दिखाया है कि सबसे सरल क्वांटम सिस्टम – एक सिंगल क्यूबिट – संचार कार्य में अपने प्रथम श्रेणी समकक्ष से बेहतर प्रदर्शन कर सकता है, जहां साझा रेन्डम्रस जैसी कोई अतिरिक्त सहायता की अनुमति नहीं है। एसएन बोस सेंटर में प्रोफेसर माणिक बानिक और उनकी टीम द्वारा किए गए सैद्धांतिक अध्ययन को क्वांटम पत्रिका में प्रकाशित किया गया है, साथ ही उनके सहयोगी प्रयोग को फिजिकल रिव्यू लेटर्स में संपादकों के सुझाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो वास्तविक दुनिया के परिदृश्य में क्वांटम श्रेष्ठता का एक दुर्लभ और सम्मोहक प्रदर्शन है।
यह इतना रोमांचक क्यों है: पारंपरिक संचार आमतौर पर साझा संसाधनों पर निर्भर करता है जैसे कि कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए पहले से तय रेन्डम्रस संख्याएं। इन साझा सहसम्बंधों के बिना, संचार कार्य बहुत अधिक कठिन हो सकते हैं। हालांकि, एक क्यूबिट को इस सहायता की आवश्यकता नहीं होती है।
शोधकर्ताओं ने दिखाया कि, समान परिस्थितियों में, एक क्यूबिट एक क्लासिकल बिट से अधिक प्राप्त कर सकता है – एक ऐसा परिणाम जो क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही मान्यताओं को चुनौती देता है। इसे प्रदर्शित करने के लिए, टीम ने एक फोटोनिक क्वांटम प्रोसेसर और एक नया उपकरण विकसित किया जिसे वैरिएशनल ट्राइएंगुलर पोलरिमीटर कहा जाता है। इस उपकरण ने उन्हें सकारात्मक ऑपरेटर-मूल्यवान माप (पीओवीएम) नामक तकनीक का उपयोग करके अत्यधिक सटीकता के साथ प्रकाश ध्रुवीकरण को मापने की क्षमता प्रदान की। ये माप शोर सहित वास्तविक परिस्थितियों में क्वांटम प्रणालियों के व्यवहार को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यह अध्ययन महज एक अकादमिक उपलब्धी नहीं है बल्कि उस भविष्य की ओर एक कदम है जहां क्वांटम प्रौद्योगिकियां सूचना के प्रसंस्करण और संचार के तरीके को बदल देंगी, जिससे क्वांटम और प्रथम श्रेणी के बीच का अंतर थोड़ा और दिलचस्प हो जाएगा।
