स्वदेशी सैन्य गैस टरबाइन इंजन: भारत की वायु शक्ति को नई मजबूती
Interacting with the scientists and officials, Raksha Mantri praised GTRE for its efforts towards bolstering national security through self-reliance, describing DRDO as the foundation of India’s strategic capability. He underscored the critical importance of achieving Aatmanirbharta in aero engine technology in the present rapidly evolving geopolitical landscape, and stated that every effort is being made to prioritise the development of aero engines in India. “Supply chains are breaking and new ecosystems are developing. Nations possessing indigenous critical technologies will remain safe, secure, and sustain themselves,” he stated, reiterating Prime Minister Shri Narendra Modi-led Government’s commitment to achieving self-reliance in every field.

बेंगलुरु, 16 फरबरी। रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने 6 फरवरी, 2026 को बेंगलुरु स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के गैस टरबाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान (जीटीआरई) का दौरा किया और स्वदेशी सैन्य गैस टरबाइन इंजन विकास से सम्बंधित परियोजनाओं की स्थिति की समीक्षा की।
राजनाथ सिंह के हालिया दौरे के दौरान गैस टरबाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान (जीटीआरई) में चल रही स्वदेशी सैन्य गैस टरबाइन इंजन विकास परियोजना एक बार फिर केंद्र में रही। हालांकि दौरे में कई पहलुओं पर चर्चा हुई, लेकिन सबसे अधिक महत्व उस तकनीक को दिया जा रहा है जो भविष्य में भारत की वायु शक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ बन सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व
आधुनिक लड़ाकू विमान का हृदय उसका इंजन होता है। यदि इंजन स्वदेशी है तो युद्ध या तनाव की स्थिति में किसी विदेशी आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता नहीं रहती। अब तक उन्नत एयरो इंजन प्रौद्योगिकी कुछ गिने-चुने देशों तक सीमित रही है, जिसके कारण भारत को आयात या तकनीकी सहयोग पर निर्भर रहना पड़ा। स्वदेशी गैस टरबाइन इंजन के सफल विकास से यह स्थिति बदल सकती है। इससे न केवल स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव देश में ही संभव होगा, बल्कि किसी भी प्रकार के प्रतिबंध या तकनीकी अवरोध का जोखिम भी कम होगा।

तकनीक की जटिलता और क्षमता
सैन्य गैस टरबाइन इंजन अत्यंत जटिल तकनीक पर आधारित होता है। इसमें अत्यधिक तापमान को सहन करने वाली विशेष मिश्रधातुएं, सटीक द्रव-गतिकी डिजाइन, उन्नत कंप्रेसर और टर्बाइन ब्लेड, तथा डिजिटल फुल अथॉरिटी इंजन कंट्रोल (FADEC) जैसी प्रणालियां शामिल होती हैं। आफ्टरबर्नर तकनीक इंजन को अतिरिक्त थ्रस्ट प्रदान करती है, जिससे लड़ाकू विमान सुपरसोनिक गति हासिल कर सकता है।
इन इंजनों का उच्च थ्रस्ट-टू-वेट अनुपात विमान को तेज चढ़ाई, बेहतर पेलोड क्षमता और लंबी दूरी तक मिशन संचालित करने में सक्षम बनाता है। साथ ही, कम इन्फ्रारेड सिग्नेचर जैसी विशेषताएं स्टेल्थ क्षमता को भी मजबूत करती हैं, जो आधुनिक हवाई युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए आधार
भारत उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (एएमसीए) जैसे अगली पीढ़ी के प्लेटफॉर्म पर कार्य कर रहा है। ऐसे विमानों के लिए स्वदेशी इंजन अनिवार्य है, क्योंकि इंजन और एयरफ्रेम का डिजाइन परस्पर जुड़ा होता है। यदि इंजन देश में विकसित होता है तो भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें बदलाव और उन्नयन भी आसानी से किया जा सकता है। इससे दीर्घकाल में लागत कम होगी और तकनीकी नियंत्रण पूरी तरह भारत के हाथ में रहेगा।

दोहरे उपयोग की व्यापक संभावनाएं
गैस टरबाइन तकनीक का लाभ केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। उच्च तापमान कंपोजिट, उन्नत धातु विज्ञान और टर्बोमशीनरी जैसी तकनीकें नागरिक उड्डयन, ऊर्जा उत्पादन और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भी उपयोगी हो सकती हैं। इस प्रकार रक्षा अनुसंधान का प्रभाव व्यापक औद्योगिक और आर्थिक विकास तक पहुंचता है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक कदम
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जीटीआरई में वैज्ञानिकों से संवाद के दौरान एयरो इंजन प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया। परंतु इस परियोजना का वास्तविक महत्व इसके रणनीतिक परिणामों में निहित है। यदि भारत उन्नत सैन्य गैस टरबाइन इंजन के क्षेत्र में पूर्ण क्षमता हासिल कर लेता है, तो वह न केवल अपनी वायुसेना को अधिक सशक्त बनाएगा, बल्कि वैश्विक रक्षा प्रौद्योगिकी मानचित्र पर भी मजबूत स्थान स्थापित करेगा।
स्वदेशी सैन्य इंजन विकास कार्यक्रम इसलिए केवल एक वैज्ञानिक परियोजना नहीं, बल्कि भारत की सामरिक स्वतंत्रता, तकनीकी श्रेष्ठता और दीर्घकालिक सुरक्षा का आधार बनता जा रहा है।
