अगर भिलंगना हिमनद झील फटी तो मचेगी भारी तबाही
तेजी से बढ़ रही हिमालयी झील बन सकती है घातक GLOF का कारण
-Uttarakhand Himalaya Desk-
देहरादून। तेजी से बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के तीव्र पिघलने ने हिमालय को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के लिए सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में बदल दिया है।एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने भिलंगना झील के तेजी से विस्तार को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है । वैज्ञानिकों के अनुसार लगातार फैलती ग्लेशियल झीलें उत्तराखंड में निचले इलाकों की बस्तियों, बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बड़ा खतरा बनकर उभर रही हैं।
वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि बढ़ती गर्मी, पीछे हटते ग्लेशियर और अस्थिर मोरैन बाँधों से बनी झीलें ऐसी परिस्थितियाँ तैयार कर रही हैं, जिनमें अचानक और विनाशकारी GLOF की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। ऐसे विस्फोटक बाढ़ कुछ ही मिनटों में लाखों घनमीटर पानी नीचे की ओर छोड़ सकती हैं।
इसी तेजी से बदलते और बेहद नाजुक परिदृश्य के बीच एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने भिलंगना झील के तेज विस्तार को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। उत्तराखंड के मध्य हिमालय में लगभग 4,750 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह अलग-थलग ग्लेशियल झील तेजी से फैल रही है और इसका लगातार बढ़ना भविष्य में विनाशकारी GLOF का कारण बन सकता है, जिससे निचले क्षेत्रों की बस्तियाँ और जलविद्युत परियोजनाएँ बुरी तरह प्रभावित होंगी।
बिजली परियोजनाएँ बाढ़ के बड़े खतरे में
यह अध्ययन Hydrological Processes नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसे केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा वित्तपोषित किया गया और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (देहरादून), नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (हैदराबाद), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (दिल्ली), IIT मद्रास, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (रुड़की) सहित कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने मिलकर पूरा किया।
अध्ययन में उपग्रह चित्रों, मैदानी आंकड़ों, मौसम विज्ञान संबंधी विश्लेषण और हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग की मदद से झील के 1968 से 2025 तक के विकासक्रम का पुनर्निर्माण किया गया।
अध्ययन में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि 1968 से पहले यह झील अस्तित्व में थी ही नहीं। यह झील 1980 के आसपास बनना शुरू हुई और 2001 तक अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ी। 2001 के बाद इसका विस्तार तेजी से बढ़ने लगा।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और WIHG के वरिष्ठ शोधकर्ता पवन पाटीदार के अनुसार इस तेजी के पीछे का कारण ग्लेशियर का पतला होना और पीछे हटना है। पाटीदार के अनुसार :-
> “मूल ग्लेशियर का 1990 के मध्य से अब तक 0.7 वर्ग किलोमीटर भाग समाप्त हो चुका है और यह प्रति वर्ष 0.7 मीटर तक पतला हो रहा है।”
हाइड्रोडायनामिक मॉडलों का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने मोरैन बाँध के अचानक टूटने पर आधारित सबसे भयावह GLOF परिदृश्य का विश्लेषण किया। परिणाम अत्यंत चिंताजनक रहे। अध्ययन के अनुसार:
संभावित GLOF में 3,645 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड तक पानी निकल सकता है,ऊपरी हिस्सों में 30 मीटर प्रति सेकंड से अधिक की प्रवाह गति हो सकती है, घुत्तू, घन्साली और भिलंगना जलविद्युत परियोजनाएँ सीधे इस बाढ़ मार्ग में आती हैं,और इन क्षेत्रों में 8 से 10 मीटर तक गहरी बाढ़ आ सकती है।
अध्ययन में यह भी कहा गया कि सड़कों, पुलों और बिजली से जुड़ा बुनियादी ढांचा ऐसे GLOF के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील है।
