जब सबूत चूहे खा जाते हैं और कानून कटघरे में खड़ा हो जाता है
–उषा रावत/ आदित्य सिंह
भारतीय अदालतों में इन दिनों एक अजीब लेकिन बेहद गंभीर कहानी बार-बार दोहराई जा रही है। हर बार कहानी का कथानक लगभग एक-सा होता है—पुलिस द्वारा भारी मात्रा में नशीले पदार्थों की जब्ती, लंबा मुकदमा, और फिर एक दिन अदालत के सामने यह सफ़ाई कि सबूत अब मौजूद नहीं हैं, क्योंकि उन्हें चूहों ने खा लिया। यह तर्क जितना असामान्य लगता है, उतना ही बार-बार अदालतों के रिकॉर्ड में दर्ज हो रहा है। सवाल यह नहीं रह गया है कि चूहे नशीले पदार्थ खाते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या कानून-व्यवस्था का पूरा तंत्र इसी बहाने के पीछे छिपता जा रहा है।
झारखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जहाँ पुलिस और अन्य प्रवर्तन एजेंसियों ने अदालतों को बताया कि मालखानों में रखे गए गांजा, हेरोइन या शराब जैसी जब्त सामग्री चूहों द्वारा नष्ट कर दी गई। अदालतें अक्सर इन दावों को संदेह की दृष्टि से देखती हैं, लेकिन एनडीपीएस जैसे सख़्त कानूनों में जब भौतिक साक्ष्य ही पेश न किया जा सके, तो अभियोजन का पूरा मामला ढह जाता है और आरोपियों को बरी करना अदालत की मजबूरी बन जाती है।
चूहों ने नमूने तक खा लिए ?
जनवरी 2025 के दौरान सामने आए दो मामलों ने इस प्रवृत्ति को फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। इन मामलों में दावा किया गया कि चूहों ने न केवल जब्त नशीले पदार्थ, बल्कि उनके नमूने तक खा लिए। नतीजतन, छह अभियुक्त बरी हो गए, जबकि कुल जब्ती 300 किलो से अधिक नशीले पदार्थों की थी। यह संयोग नहीं, बल्कि एक ऐसे पैटर्न का हिस्सा है, जो वर्षों से अदालतों के सामने मौजूद है।
सबसे चौंकाने वाला मामला झारखंड के रांची का
जनवरी 2022 में रांची पुलिस ने दावा किया था कि उसने एक वाहन से 200 किलो गांजा बरामद किया है, जिसे विशेष रूप से बनाए गए गुप्त खानों में छिपाकर ले जाया जा रहा था। मामला विशेष एनडीपीएस अदालत में चला, अभियुक्त वर्षों तक हिरासत में रहे, लेकिन जब अदालत ने जब्त सामग्री पेश करने को कहा, तो पुलिस ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि पूरा 200 किलो गांजा मालखाने में चूहों द्वारा खा लिया गया। स्टेशन डायरी की एक प्रविष्टि को इस दावे के समर्थन में पेश किया गया। अदालत ने इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह का दावा न केवल अविश्वसनीय है, बल्कि यह पूरी जब्ती और उसके पुलिस प्रबंधन पर गंभीर संदेह खड़ा करता है।
रांची अकेला उदाहरण नहीं है
धनबाद में 2018 और 2024 के बीच गांजा जब्ती के दो अलग-अलग मामलों में पुलिस यही कहती रही कि सबूत चूहों ने नष्ट कर दिए। चंडीगढ़ में 2023 में 22 किलो गांजा कथित रूप से चूहों द्वारा खाए जाने के बाद दो अभियुक्त बरी कर दिए गए। मथुरा में 2022 में अदालत को बताया गया कि विभिन्न थानों में रखे गए 500 किलो से अधिक गांजा अब मौजूद नहीं है। बरेली में 2018 में एक हजार लीटर से अधिक जब्त शराब के गायब होने पर भी यही तर्क दिया गया। हर बार कहानी बदली, पर बहाना वही रहा।
इन मामलों ने उच्च न्यायालयों को भी असहज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में स्पष्ट टिप्पणी की थी कि एनडीपीएस मामलों में अधिकतर नशीले पदार्थ मालखाने के भीतर से ही बाहर जाते हैं, न कि बाहर से तस्करी होकर अंदर आते हैं। न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने यह सवाल उठाया था कि जब कोई नहीं जानता कि जब्त पदार्थ तीन-चार साल बाद मालखाने में मौजूद भी है या नहीं, तो हर बार चूहों को दोषी ठहरा देना व्यवस्था की विफलता को छिपाने का तरीका बन जाता है। जनवरी 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने भी पुलिस मालखानों की बदहाल स्थिति पर गहरी चिंता जताई।
समस्या केवल चूहों की नहीं
गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि समस्या केवल चूहों की नहीं है। देश भर के पुलिस थानों के मालखाने जर्जर अवस्था में हैं, जहाँ नमी, पानी टपकती छतें और कीटों का प्रकोप आम बात है। जब्त साक्ष्यों की नियमित इन्वेंटरी और रख-रखाव की व्यवस्था कई जगह नाम मात्र की है। नमूनों की सीलिंग, सैंपलिंग और स्वतंत्र गवाहों की प्रक्रिया में भी गंभीर लापरवाही सामने आती रही है। एक मामले में तो अदालत ने यह तक दर्ज किया कि एक महत्वपूर्ण फोरेंसिक रिपोर्ट बारिश और चूहों की वजह से नष्ट हो गई।
इस पूरी तस्वीर का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई मामलों में पुलिस और जेल कर्मियों की सीधी संलिप्तता भी सामने आई है। मुंबई में एक विशेष एनडीपीएस अदालत ने 1995 बैच के आईपीएस अधिकारी साजिद मोहन को 37 किलो हेरोइन रखने के मामले में 15 साल की सजा सुनाई थी। अलग-अलग मामलों में यह भी उजागर हुआ है कि जेल के भीतर से ही मोबाइल फोन के माध्यम से ड्रग नेटवर्क संचालित किए जा रहे थे, जिनमें पुलिस और जेल स्टाफ की भूमिका संदिग्ध पाई गई।
चूहे गांजा खाते हैं या नहीं
आज अदालतें यह समझने लगी हैं कि “चूहों ने खा लिया” केवल एक हास्यास्पद तर्क नहीं, बल्कि साक्ष्य प्रबंधन में गहरी प्रणालीगत विफलता का संकेत है। सवाल अब यह नहीं रह गया है कि चूहे गांजा खाते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या कानून के सबूत इतने असुरक्षित हैं कि उन पर भरोसा ही न किया जा सके। अगर साक्ष्य सुरक्षित नहीं हैं, तो कड़े कानून भी अर्थहीन हो जाते हैं और न्याय व्यवस्था की साख पर सीधा आघात होता है। शायद यही कारण है कि अब अदालतें चूहों से ज़्यादा उस सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर रही हैं, जिसने उन्हें यह बहाना देने का मौका दिया।
