गांधी की हत्या: व्यक्ति, विचार और न्याय का अंतहीन संघर्ष
–जयसिंह रावत-
महात्मा गांधी की हत्या केवल एक देह का अंत नहीं थी, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में दो विरोधी विचारधाराओं के चरम टकराव का परिणाम थी। जब 30 जनवरी 1948 को बिड़ला भवन की प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गांधी के सीने में तीन गोलियां दाग दीं, तो उस क्षण केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई, बल्कि एक ऐसे दर्शन पर प्रहार किया गया जो समावेशिता, अहिंसा और सर्वधर्म समभाव की नींव पर खड़ा था। अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि गांधी को किसने मारा? क्या वह एक उन्मादी व्यक्ति था जिसने ट्रिगर दबाया, या वह एक ऐसी विचारधारा थी जिसने उस उंगली को निर्देशित किया? सत्य यह है कि हत्यारा व्यक्ति तो केवल एक माध्यम था, असली वार उस विचार ने किया था जिसे गांधी का ‘सत्य’ अपनी राह का सबसे बड़ा रोड़ा लग रहा था।
गांधी की हत्या को समझने के लिए उस दौर की सांप्रदायिक विषाक्तता और विभाजन की त्रासदी को समझना अनिवार्य है। नाथूराम गोडसे कोई सड़क छाप अपराधी नहीं था, बल्कि वह एक सुशिक्षित और वैचारिक रूप से गहरे तक प्रभावित व्यक्ति था। वह उस कट्टरपंथी राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व कर रहा था, जो भारत को एक सांस्कृतिक और धार्मिक इकाई के रूप में परिभाषित करना चाहता था। गोडसे और उसके समर्थकों की दृष्टि में गांधी एक ऐसे ‘दुर्बल’ नेता थे, जिन्होंने तुष्टीकरण की नीति अपनाकर राष्ट्र के विभाजन को स्वीकार किया। उनके लिए गांधी की अहिंसा का सिद्धांत नपुंसकता का प्रतीक था। यहाँ हत्यारा ‘विचार’ वह संकीर्ण उग्रवाद था, जो विविधता को एकता के सूत्र में पिरोने के बजाय उसे शत्रुता के नजरिए से देखता था। गांधी की हत्या का उद्देश्य केवल उन्हें भौतिक रूप से मिटाना नहीं था, बल्कि उस सहिष्णु भारत की कल्पना को मारना था, जिसे गांधी गढ़ने का प्रयास कर रहे थे।
प्रश्न उठता है कि क्या वह हत्यारा विचार आज भी जीवित है? वैचारिक इतिहास गवाह है कि शरीर को नष्ट करना आसान है, लेकिन विचार को मारना लगभग असंभव है। गांधी का हत्यारा विचार ‘घृणा’ और ‘विभाजन’ का विचार था। यदि हम आज के समाज का सूक्ष्म निरीक्षण करें, तो पाएंगे कि जब भी धर्म, जाति या भाषा के नाम पर एक नागरिक दूसरे के प्रति द्वेष पालता है, तो वह गोडसे वाला विचार ही सिर उठा रहा होता है। सोशल मीडिया के दौर में जब गांधी के सिद्धांतों का उपहास किया जाता है या उनकी हत्या को तर्कसंगत ठहराने की कोशिश की जाती है, तब स्पष्ट हो जाता है कि वह घातक विचार मरा नहीं है। वह विचार आज भी उन लोगों के मानस में जीवित है जो संवाद के बजाय हिंसा को और तर्क के बजाय उन्माद को प्राथमिकता देते हैं। यह विचार समय-समय पर अपने रूप बदलता है, लेकिन इसका मूल तत्व वही रहता है—असहिष्णुता।
जब हम दंड की बात करते हैं, तो न्यायपालिका की सीमाएं स्पष्ट हो जाती हैं। कानून ने नाथूराम गोडसे को दोषी पाया और उसे फांसी की सजा दी गई। यह एक व्यक्ति को दिया गया दंड था। लेकिन क्या किसी विचार को फांसी दी जा सकती है? क्या किसी दर्शन को कारागार में बंद किया जा सकता है? विचार की हत्या केवल एक बेहतर और शक्तिशाली विचार के माध्यम से ही संभव है। कानून किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित कर सकता है, लेकिन वह उस घृणा का उपचार नहीं कर सकता जो किसी के मस्तिष्क में घर कर गई हो। हत्यारे विचार को दंडित करने का एकमात्र तरीका उसे बौद्धिक और सामाजिक धरातल पर पराजित करना है। जब समाज घृणा के संदेशों को अस्वीकार कर देता है, तभी उस ‘विचार’ को दंड मिलता है। एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र में शिक्षा, तर्क और संवेदना ही वे औजार हैं जिनसे हत्यारे विचारों की धार को कुंद किया जा सकता है।
गांधी की प्रासंगिकता और उनकी हत्या की त्रासदी आज भी हमें आत्ममंथन के लिए विवश करती है। गांधी ने कहा था कि ‘मेरे विचार मेरे बाद जीवित रहेंगे’। विडंबना यह है कि उनके हत्यारे का विचार भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुआ। आज की वैश्विक और राष्ट्रीय परिस्थितियों में गांधीवाद और गोडसेवाद के बीच का यह द्वंद्व और भी तीखा हो गया है। गांधी का विचार शांति और सह-अस्तित्व का है, जबकि हत्यारा विचार प्रभुत्व और अलगाव का है। यदि हम गांधी के हत्यारे विचार को दंडित करना चाहते हैं, तो हमें अपने भीतर के उस ‘अंश’ को मारना होगा जो दूसरों के प्रति पूर्वाग्रह रखता है। गोडसे को फांसी देना कानूनी न्याय था, लेकिन गांधी के विचारों को पुनः जीवित करना और उन्हें आचरण में उतारना ही उस हत्यारे विचार की वास्तविक पराजय होगी।
अंततः, गांधी की हत्या एक निरंतर चल रही प्रक्रिया है। जब भी सत्य को सत्ता द्वारा कुचला जाता है, जब भी अहिंसा को कायरता कहा जाता है, और जब भी मानवता पर सांप्रदायिकता हावी होती है, गांधी दोबारा मारे जाते हैं। हत्यारे विचार को दंडित करने की जिम्मेदारी किसी अदालत की नहीं, बल्कि समाज के विवेक की है। हमें यह समझना होगा कि बंदूक की गोली केवल शरीर को छेद सकती है, लेकिन जिस घृणा ने उस गोली को जन्म दिया, वह केवल प्रेम और करुणा के संवर्धन से ही समाप्त हो सकती है। गांधी का हत्यारा विचार तब तक जीवित रहेगा जब तक हम न्याय और समानता के संघर्ष को त्याग कर नफरत के बाजार में शामिल होते रहेंगे। इस वैचारिक युद्ध में निष्पक्षता का अर्थ तटस्थ होना नहीं, बल्कि उस सत्य के साथ खड़ा होना है जिसके लिए मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। ( लेखक प्रतिष्ठित लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं , लेकिन लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं जिनसे एडमिन का सहमत होना जरूरी नही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान है। — एडमिन )

