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स्पर्श की अनुभूति का उत्सव :  भारत में ब्रेल से संबंधित अधिकार और समावेश

 

 

 

-A PIB Feature –
प्रतिवर्ष 4 जनवरी को मनाया जाने वाला ‘विश्व ब्रेल दिवस’ ब्रेल लिपि को केवल पढ़ने की एक प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए शिक्षा, गरिमा और समान भागीदारी के प्रवेश द्वार के रूप में रेखांकित करता है। इस महत्व की झलक भारत के उन प्रयासों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहाँ समावेशी शिक्षण के लिए ब्रेल को अपनाया और मानकीकृत किया गया है। भारत में ब्रेल लिपि का आगमन 1887 में हुआ था। हालाँकि, 1951 में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारती ब्रेल को एकमात्र राष्ट्रीय मानक के रूप में स्वीकार किया गया, जिसने विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए साझा कोड निर्धारित किए। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में दृष्टिबाधित व्यक्तियों की संख्या 50,32,463 है, जिन्हें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और रोजगार प्राप्त करने में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इस विशाल जनसंख्या की आवश्यकताओं को समझते हुए, भारत में ब्रेल को अब एक अधिकार-आधारित इकोसिस्टम का हिस्सा बना दिया गया है। यह ढांचा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 जैसी पहलों और नीतियों पर आधारित है। ये निरंतर प्रयास ब्रेल को न केवल साक्षरता के एक साधन के रूप में, बल्कि सार्वजनिक पहुँच के एक अनिवार्य मानक के रूप में स्थापित करते हैं।

ब्रेल क्या है और यह कैसे काम करती है?
ब्रेल एक स्पर्शजन्य (छू कर लिखने और पढ़ने) लेखन और पठन प्रणाली है, जिसका उपयोग उन लोगों द्वारा किया जाता है जो दृष्टिबाधित हैं या जिनकी दृष्टि कमजोर है। यह छह-बिंदुओं वाले एक सेल पर आधारित होती है, जिसमें तीन-तीन बिंदुओं की दो पंक्तियाँ होती हैं। उभरे हुए इन बिंदुओं के विभिन्न संयोजन अक्षरों, संख्याओं, विराम चिह्नों और प्रतीकों को दर्शाते हैं, जिससे यूजर्स स्पर्श के माध्यम से पढ़ने में सक्षम होते हैं।
ब्रेल (जिसका नाम 19वीं सदी के फ्रांस में इसके आविष्कारक लुई ब्रेल के नाम पर रखा गया) स्वयं में कोई भाषा नहीं है, बल्कि एक कोड है जो विभिन्न भाषाओं को स्पर्शजन्य रूप (छूकर पढ़ने और लिखने) में पढ़ने और लिखने की सुविधा प्रदान करता है।

ब्रेल का महत्व
दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए साक्षरता, स्वतंत्रता और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने में ब्रेल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह समावेशी शिक्षा और सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में समान भागीदारी का मुख्य आधार है।

संयुक्त राष्ट्र के दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन (यूएनसीआरपीडी) के एक हस्ताक्षरकर्ता देश के रूप में, भारत ब्रेल सहित अन्य सुलभ प्रारूपों में सूचना और शिक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
भारत सरकार: ब्रेल समर्थित नीतिगत और कार्यक्रम इकोसिस्टम
भारत सरकार ने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के समावेशन और सशक्तिकरण के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में, ब्रेल के विकास, प्रसार और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक इकोसिस्टम स्थापित किया है। समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की संवैधानिक प्रतिबद्धताओं में निहित ये पहलें—शिक्षा, सामाजिक कल्याण, कौशल विकास और डिजिटल एक्सेसिबिलिटी के क्षेत्रों तक विस्तृत हैं।
1) कानूनी आधार: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम)
भारत का ब्रेल इकोसिस्टम दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के माध्यम से एक अधिकार-आधारित कानूनी ढांचे से जुड़ा हुआ है। यह अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समावेशी शिक्षा को अनिवार्य बनाता है, जिससे ब्रेल तक पहुँच और ब्रेल साक्षरता एक बुनियादी आवश्यकता बन गई है।
•    शैक्षणिक संस्थानों का कर्तव्य (समावेशी शिक्षा): यह अधिनियम सरकार द्वारा वित्तपोषित या मान्यता प्राप्त सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए समावेशी शिक्षा और सुलभ बुनियादी ढांचा (भवन/कैंपस/सुविधाएं) सुनिश्चित करना अनिवार्य बनाता है। इसके साथ ही, संस्थानों को छात्रों की जरूरतों के अनुसार उचित आवास और उपयुक्त सहायता प्रदान करनी होगी।
•    स्कूली शिक्षा में ब्रेल और संचार के माध्यम: दृष्टिबाधित (या बधिर-दृष्टिबाधित) छात्रों के लिए, यह अधिनियम संचार के सबसे उपयुक्त माध्यमों और भाषाओं में शिक्षा देने पर जोर देता है। यह स्पष्ट रूप से ब्रेल और उससे संबंधित सुलभ प्रारूपों के उपयोग का समर्थन करता है।
•    मुफ्त शिक्षण सामग्री और सहायक उपकरण (18 वर्ष की आयु तक): अधिनियम के तहत बेंचमार्क दिव्यांगता वाले छात्रों के लिए 18 वर्ष की आयु तक पाठ्यपुस्तकें, शिक्षण सामग्री और सहायक उपकरण (जैसे ब्रेल किट, पर्किन्स ब्रेलर आदि) मुफ्त उपलब्ध कराने के उपाय शामिल हैं।
2) भारती ब्रेल: भारत की मानकीकृत ब्रेल लिपि

भारत सरकार ‘भारती ब्रेल’ को कई भारतीय भाषाओं के लिए एक एकीकृत लिपि के रूप में मान्यता देती है। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग और राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (एनआईईपीवीडी) के तत्वावधान में, 04 जनवरी 2025 को एक ‘मानक भारती ब्रेल कोड’ (यूनिकोड मैपिंग के साथ) प्रकाशित किया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षा और एक्सेसिबिलिटी के लिए सभी भारतीय भाषाओं में एक समान ब्रेल प्रणाली को आधिकारिक रूप से अपनाना है। इस कोड को 03 दिसंबर 2024 को प्रकाशित मसौदे पर सार्वजनिक परामर्श के बाद अंतिम रूप दिया गया है।
भारती ब्रेल के काम करने के मुख्य सिद्धांत
1. भारतीय भाषाओं के लिए यूनिफाइड ब्रेल सिस्टम
•    भारती ब्रेल: यह अधिकांश भारतीय भाषाओं के लिए उपयोग की जाने वाली मानकीकृत स्पर्शजन्य (स्टैंडर्ड टैक्टाइल) लेखन प्रणाली है।
•    सामंजस्य और एकीकरण: इसका विकास विभिन्न भाषाओं में मौजूद अलग-अलग ब्रेल लिपियों के बीच सामंजस्य बिठाने और उन्हें एक एकल, सुसंगत ‘कोड’ में बदलने के लिए किया गया था।
•    साझा उपयोग: यह सुनिश्चित करता है कि दृष्टिबाधित पाठक कई भारतीय भाषाओं में एक ही सामान्य ब्रेल प्रणाली को सीख सकें और उसका उपयोग कर सकें।
•    मानक संरचना: यह मानक छह-बिंदु वाले ब्रेल सेल का उपयोग करती है।
2. मानकीकरण और यूनिकोड मैपिंग
•    मानकीकृत कोड का विमोचन: सरकार ने (एनआईईपीवीडी/डीईपीडब्ल्यूडी के माध्यम से) ‘मानक भारती ब्रेल कोड’ जारी किए हैं जिनमें यूनिकोड मैपिंग शामिल है, जो डिजिटल कम्पैटिबिलिटी सुनिश्चित करती है।
•    डिजिटल पठन-पाठन: इसका अर्थ है कि प्रत्येक ब्रेल सेल पैटर्न को एक विशिष्ट यूनिकोड ‘कोड पॉइंट’ के साथ जोड़ा गया है, जिससे डिजिटल रीडिंग-राइटिंग, स्क्रीन रीडर सपोर्ट, ब्रेल डिस्प्ले और सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन का उपयोग आसान हो जाता है।
•    डिजिटल एक्सेसिबल का आधार: भारती ब्रेल में एक्सेसिबल डिजिटल कंटेंट तैयार करने के लिए यूनिकोड मैपिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
3. सभी भाषाओं में सुसंगत प्रतिनिधित्व
•    कॉमन टैक्टाइल फ्रेमवर्क: मानक भारती ब्रेल कोड एक कॉमन टैक्टाइल फ्रेमवर्क का उपयोग करते हुए हिंदी, मराठी, बंगाली, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम जैसी विभिन्न भारतीय लिपियों में स्वर, व्यंजन, अंक और विराम चिह्नों को दर्शाने के लिए नियम प्रदान करते हैं।
•    भाषाओं के बीच सहज बदलाव: यह प्रणाली दृष्टिबाधित शिक्षार्थियों को ब्रेल पढ़ते समय अलग-अलग ब्रेल कोड दोबारा सीखने की आवश्यकता के बिना, एक भाषा से दूसरी भाषा में आसानी से  स्विच करने में मदद करती है।
4. शिक्षण, प्रकाशन और डिजिटल पहुंच का आधार
•    भारती ब्रेल भारत में ब्रेल शिक्षा, ट्रांसक्रिप्शन, एक्सेसिबल मटेरियल प्रोडक्शन के उत्पादन के लिए आधार के रूप में कार्य करती है।
•    इन मानकों का उपयोग प्रकाशकों, ब्रेल प्रेस और एक्सेसिबिलिटी लागू करने वाले संस्थानों द्वारा ऐसी पाठ्यपुस्तकें, शिक्षण सामग्री और डिजिटल ब्रेल सामग्री तैयार करने के लिए किया जाता है जो सुसंगत और विश्वसनीय हों।
•    यह मानक समावेशी शिक्षा और साक्षरता के लिए चलाई जा रही राष्ट्रीय पहलों को सशक्त बनाता है।
हाल की पहलें:
•    नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद विजुअल डिसेबिलिटीज (एनआईईपीवीडी) ने तकनीकी एकीकरण के लिए संशोधित भारती ब्रेल के वैलिडेशन पर एक परियोजना संचालित की है और ‘लिबलुईस’ टेबल को वैलिडेट करने के बाद भारती ब्रेल 2.1 का मसौदा तैयार किया है। इस मसौदे को देश के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित सत्यापन कार्यशालाओं और फोकस ग्रुप चर्चाओं के माध्यम से विकसित किया गया है। यह मसौदा 04 जनवरी 2026 (विश्व ब्रेल दिवस) को 15 दिनों की अवधि के लिए एनआईईपीवीडी की वेबसाइट पर अपलोड किया जा रहा है, ताकि शिक्षकों, ब्रेल विशेषज्ञों, दृष्टिबाधित व्यक्तियों, प्रकाशकों, शोधकर्ताओं और प्रौद्योगिकी डेवलपर्स सहित सभी हितधारकों से टिप्पणियाँ और फीडबैक आमंत्रित किए जा सकें।
•    एनआईईपीवीडी क्षेत्रीय भाषाओं में भी भारती ब्रेल का प्रशिक्षण आयोजित कर रहा है। हाल ही में, संस्थान ने तमिल, मलयालम और ओडिया ब्रेल पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
3) एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन: इंफ्रास्ट्रक्चर, मोबिलिटी और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों में समावेशी पहुंच को सुदृढ़ बनाना
एक्सेसिबल इंडिया कैंपेन (सुगम्य भारत अभियान), दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (डीईपीडब्ल्यूडी) द्वारा 2015 में शुरू की गई भारत की एक राष्ट्रीय पहल है। इसका उद्देश्य दृष्टिबाधित व्यक्तियों सहित सभी दिव्यांगजनों के लिए एक बाधा मुक्त और समावेशी वातावरण बनाना है। यह अभियान निर्मित वातावरण (भवन, परिवहन), सूचना और संचार इकोसिस्टम (वेबसाइट, मीडिया) तथा परिवहन प्रणालियों को सार्वभौमिक रूप से सुलभ बनाकर सुगम्यता के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण अपनाता है। यह भवनों और सार्वजनिक स्थानों को ब्रेल संकेतों से लैस करने (जिसमें 2,000 से अधिक रेलवे स्टेशन शामिल हैं), रेलवे, मेट्रो स्टेशनों और हवाई अड्डों पर बुनियादी ढांचे में सुधार करने तथा राष्ट्रीय वेबसाइट सुगम्यता दिशानिर्देशों को लागू करने पर केंद्रित है।
4) एनईपी 2020: ब्रेल एकीकरण और समावेशी शिक्षा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 स्पष्ट रूप से स्वीकार करती है कि समावेशन के लिए व्यावहारिक शिक्षण सहायता की आवश्यकता होती है—जिसमें सहायक उपकरण और ब्रेल सहित सुलभ शिक्षण-अधिगम सामग्री शामिल हैं।
•    राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) दिव्यांग बच्चों की भागीदारी को प्राथमिकता देती है, और यह उल्लेख करती है कि कक्षाओं में उनके एकीकरण के लिए भाषा-उपयुक्त शिक्षण और अधिगम सामग्री—जिसमें बड़े प्रिंट और ब्रेल जैसे सुलभ प्रारूपों में पाठ्यपुस्तकें शामिल हैं—उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
•    एनसीईआरटी, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप स्कूली पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें डेवलप करता है और स्कूली शिक्षा के लिए ब्रेल तथा सुलभ प्रारूप वाली पाठ्यपुस्तकों को उपलब्ध और उन्हें सक्षम बनाने के लिए जिम्मेदार है।
5) उच्च शिक्षा और ब्रेल तक संस्थागत पहुंच
जैसे-जैसे दृष्टिबाधित छात्र उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते हैं, ब्रेल और अन्य सुलभ प्रारूपों को मुख्यधारा की शैक्षणिक प्रणालियों में एकीकृत करने की आवश्यकता होती है। सरकार समर्थित डिजिटल पुस्तकालय और इंस्टीट्यूशनल मैंडेट यूनिवर्सिटीज को एड-हॉक व्यवस्थाओं से हटकर, स्ट्रक्चर्ड, कैंपस-वाइड एक्सेसिबिलिटी प्रैक्टिस की ओर बढ़ने में सक्षम बना रहे हैं। डीएएलएम परियोजना अपनी कार्यान्वयन एजेंसियों के माध्यम से मुफ्त ब्रेल पुस्तकें प्रदान करके उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले दृष्टिबाधित छात्रों का समर्थन करती है।
सुगम्य पुस्तकालय
यह दृष्टिबाधित और अन्य प्रिंट दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए एक व्यापक डिजिटल लाइब्रेरी है, जिसमें कई भाषाओं में सुलभ पुस्तकें और वैश्विक स्रोतों के लिंक उपलब्ध हैं। इसे एनआईईपीवीडी (राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान), टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) और डेज़ी फोरम ऑफ इंडिया नामक एक गैर-लाभकारी संगठन के सामूहिक प्रयास के रूप में शुरू किया गया था। यह पोर्टल डिजिटल ब्रेल प्रारूप में पुस्तकों और शिक्षण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करता है। इसमें शामिल संस्थानों को ये करना होगा:
•    सुलभ प्रारूप वाली पुस्तकों की खोज
•    उपलब्ध न होने पर रूपांतरण
•    डुप्लीकेशन से बचने के लिए सुगम्य पुस्तकालय पर अपलोड करना
•    प्रिंट दिव्यांगता वाले छात्रों/संकाय सदस्यों को सदस्यता प्रदान करना
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह “ब्रेल/एक्सेसिबल फॉर्मेट” को केवल दिव्यांगता सहायता केंद्रों तक सीमित रखने के बजाय संस्थानों के मुख्य कार्यप्रवाह में समाहित करता है।
6) ब्रेल शिक्षण सामग्री के वित्तपोषण और संचालन हेतु कार्यक्रम

भारत सरकार ने ब्रेल एक्सेस को वास्तविक और बड़े पैमाने पर उपलब्ध शिक्षण सामग्री में बदलने के लिए समर्पित वित्तपोषण तंत्र बनाए हैं। ये कार्यक्रम व्यापक प्रोडक्शन, मुफ्त डिस्ट्रीब्यूशन और संस्थागत क्षमता विकास पर ध्यान केंद्रित करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दृष्टिबाधित छात्र सुलभ सामग्री के अभाव के कारण शिक्षा से वंचित न रहें।
डीएएलएम (सुलभ शिक्षण सामग्री विकास हेतु वित्तीय सहायता पर परियोजना)
डीएएलएम परियोजना (जिसे पहले ‘ब्रेल प्रेस परियोजना’ के नाम से जाना जाता था), एसआईपीडीए (दिव्यांग व्यक्ति अधिनियम के कार्यान्वयन की योजना) के तहत संचालित है। यह पूरे भारत में दृष्टिबाधित व्यक्तियों को स्कूल और उच्च शिक्षा, दोनों के लिए मुफ्त ब्रेल पाठ्यपुस्तकें और पाठ्यक्रम सामग्री प्रदान करती है। 2014 में अपनी शुरुआत के बाद से, इस परियोजना ने 1,69,782 छात्रों को सुलभ प्रारूप वाली स्कूली पाठ्यपुस्तकें और अन्य शिक्षण सामग्री वितरित की है।
7) ब्रेल बनाए रखने हेतु क्षमता विकास (प्रशिक्षण एवं विशेष शिक्षा)

सरकारी निकाय और वैधानिक नियामक देश भर में प्रशिक्षण के मानकीकरण, संस्थानों को मान्यता देने और प्रोफेशनल क्वालिटी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एनआईईपीवीडी (राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान), देहरादून, ब्रेल साक्षरता को बढ़ावा देने और ब्रेल विकास गतिविधियों के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित कर रहा है।
भारतीय पुनर्वास परिषद
भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 के तहत की गई थी। यह 22 जून 1993 को अस्तित्व में आया जब संसद द्वारा इस अधिनियम को लागू किया गया। वर्ष 2000 में हुए एक संशोधन ने इसके कार्यक्षेत्र का विस्तार किया। इसके उद्देश्य हैं:
•    पूरे भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के साथ काम करने वाले प्रोफेशनल्स के लिए पुनर्वास शिक्षा और प्रशिक्षण को रेगुलेट और स्टैंडर्डाइज करना।
•    पुनर्वास सेवाओं में गुणवत्ता और एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम शैक्षिक और प्रशिक्षण मानक निर्धारित करना और उन्हें कड़ाई से लागू करना।
•    पुनर्वास और विशेष शिक्षा के क्षेत्र में घरेलू और विदेशी दोनों तरह की योग्यताओं, संस्थानों और पाठ्यक्रमों को मान्यता देना और उनकी निगरानी करना।
•    योग्य पुनर्वास प्रोफेशनल्स और कर्मियों के पंजीकरण और नियमन के लिए केंद्रीय पुनर्वास रजिस्टर (सीआरआर) का प्रबंधन करना।
•    पुनर्वास और विशेष शिक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान, डेटा संग्रह और सतत व्यावसायिक विकास को प्रोत्साहित करना।
•    सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अधीन व्यावसायिक, राष्ट्रीय और शीर्ष दिव्यांगता संस्थानों और उनके कर्मियों को मान्यता और पंजीकरण प्रदान करके मानव संसाधन विकास को मजबूत करना।

निष्कर्ष: बाधा-मुक्त भविष्य की ओर एक मजबूत कदम
विश्व ब्रेल दिवस एक सरल किंतु सशक्त सत्य को रेखांकित करता है: सूचना तक पहुँच ही अवसरों तक पहुँच का मार्ग प्रशस्त करती है। भारत का निरंतर विकसित होता ब्रेल इकोसिस्टम न केवल कानून में निहित है, बल्कि यह संस्थागत तंत्रों द्वारा समर्थित और संयुक्त राष्ट्र के अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के साथ पूरी तरह समन्वित है। ब्रेल के मानकीकरण और सुलभ शिक्षण सामग्रियों में निवेश करके, भारत समावेशी शिक्षा की नींव को और अधिक सुदृढ़ कर रहा है। सार्वजनिक सेवाओं में टैक्टिकल इंफॉर्मेशन का समावेश और व्यावसायिक क्षमता का निर्माण, संवैधानिक सिद्धांतों को एक सार्थक और जीवंत सुगम्यता में बदलने में मदद कर रहे हैं। जैसे-जैसे ये प्रयास विस्तार ले रहे हैं, ब्रेल को अब केवल एक विशेष सहायता के रूप में नहीं, बल्कि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए समानता, सहभागिता और गरिमा के एक अनिवार्य सेतु के रूप में पहचाना जा रहा है।

 

 

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