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राष्ट्रीय सहारा पर ताला, कर्मचारियों और प्रबंधन की वार्ता बेनतीजा

 

श्रम विभाग की मध्यस्थता भी नाकाम, कर्मचारियों को चार माह से वेतन नहीं

– अरुण श्रीवास्तव –
देहरादून, 16 जनवरी। अचानक प्रकाशन बंद किए जाने की तलवार लटकने से आक्रोशित राष्ट्रीय सहारा के कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच श्रम विभाग की मध्यस्थता में आयोजित वार्ता प्रबंधन की हीलाहवाली के कारण बेनतीजा रही। इससे पहले कर्मचारी अपने स्तर से समस्या के समाधान के प्रयास करते रहे, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकल सका।
इस बीच राष्ट्रीय विपक्षी दल कांग्रेस की स्थानीय इकाई ने अपर श्रमायुक्त को पत्र लिखकर पूरे मामले से अवगत कराया और सामूहिक रूप से मुलाकात भी की। अपर श्रमायुक्त कार्यालय द्वारा 15 से 26 जनवरी के बीच सुलह-समझौते की तिथि निर्धारित की गई थी।
वार्ता के दौरान सहायक श्रमायुक्त को कर्मचारियों ने बताया कि कंपनी उन्हें पूरा वेतन नहीं दे रही थी और अक्टूबर माह से चार महीने का वेतन बकाया है। इसके अलावा 8 जनवरी की रात से बिना किसी पूर्व सूचना के अखबार का प्रकाशन रोक दिया गया। आरोप है कि अब प्रबंधन मौखिक रूप से कर्मचारियों पर इस्तीफा देने का दबाव बना रहा है और कहा जा रहा है कि इस्तीफा देने पर ही बकाया वेतन का भुगतान किया जाएगा।
कर्मचारियों ने यह भी बताया कि सहारा परिसर से उपस्थिति रजिस्टर हटा दिया गया है, जबकि बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन को टेप लगाकर सील कर दिया गया, ताकि कर्मचारी उपस्थिति दर्ज न कर सकें।
प्रबंधन की ओर से पेश हुए दो वकीलों—एक नोएडा से आए अधिवक्ता और देहरादून की अधिवक्ता काव्या—ने दावा किया कि अखबार बंद नहीं किया गया है, बल्कि अस्थायी रूप से प्रकाशन रोका गया है। इस पर सहायक श्रमायुक्त ने स्पष्ट किया कि वे स्वयं सहारा परिसर का निरीक्षण कर आए हैं और वहां तालाबंदी पाई गई थी, जिसके बाद प्रबंधन के वकील संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
जब वेतन न दिए जाने का कारण पूछा गया तो नोएडा से आए वकील ने कहा कि बकाया वेतन का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि, जब उनसे इस संबंध में या अस्थायी बंदी को लेकर कोई आधिकारिक दस्तावेज या नोटिस प्रस्तुत करने को कहा गया, तो वे कोई कागजात नहीं दिखा सके। वे यह भी स्पष्ट नहीं कर पाए कि सहारा प्रबंधन ने बंदी की सूचना सरकार को दी है या नहीं।
पीड़ित कर्मचारियों ने सहायक श्रमायुक्त से अक्टूबर से जनवरी तक का बकाया वेतन बिना शर्त दिलाने की मांग की। जब सहायक श्रमायुक्त ने इस आशय का निर्देश देने की बात कही, तो प्रबंधन के वकीलों ने इसका विरोध किया और यहां तक कि आदेश की भाषा को लेकर सहायक श्रमायुक्त को निर्देश देने की कोशिश करने लगे। इस पर सहायक श्रमायुक्त ने स्पष्ट किया कि वे यह तय नहीं कर सकते कि आदेश में क्या लिखा जाए।
प्रबंधन पक्ष ने यह दलील भी दी कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है और कर्मचारियों द्वारा दी गई शिकायत की प्रति उपलब्ध कराई जाए, ताकि अगली तिथि पर प्रबंधन से विचार-विमर्श कर अपना पक्ष रखा जा सके। मामला नया बताते हुए वकीलों ने लंबी मोहलत की मांग की, लेकिन कर्मचारियों के दबाव के चलते सहायक श्रमायुक्त धर्मराज ने अगली सुनवाई की तिथि 21 जनवरी निर्धारित की।
इसी तरह, प्रबंधन ने बिना किसी नोटिस के लखनऊ और गोरखपुर संस्करण का कामकाज भी बंद कर दिया। लखनऊ में भी मामले की सुनवाई वरिष्ठ श्रम अधिकारी ने की। उन्होंने सहारा कर्मचारियों के धैर्य और साहस की सराहना करते हुए कहा कि कई महीनों से वेतन न मिलने के बावजूद कर्मचारियों ने अब तक श्रम विभाग में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई, जो उनके संयम को दर्शाता है।
देहरादून की तरह लखनऊ और गोरखपुर में भी मामला अभी प्रारंभिक चरण में है। लखनऊ में कर्मचारियों की ओर से कलानिधि मिश्र और देहरादून में भूपेंद्र कंडारी ने मामले की अगुवाई की। इस दौरान बड़ी संख्या में प्रभावित कर्मचारी तथा पूर्व एवं सेवानिवृत्त सहाराकर्मी भी मौजूद रहे।

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