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आज़ादी के 82 वर्ष बाद भी सड़क से महरूम सकंड गाँव, ग्रामीणों ने दी आमरण अनशन की चेतावनी

 

गौचर से दिग्पाल गुसाईं–
कर्णप्रयाग विकासखंड का सकंड गाँव आज़ादी के 82 साल बाद भी सड़क सुविधा से वंचित है। पहाड़ के इस दूरस्थ गाँव के लोगों का जीवन आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में आदिम परिस्थितियों जैसा बना हुआ है। लगातार मांग, धरना–प्रदर्शन और आश्वासनों के बावजूद ग्रामीणों को अब तक यातायात सुविधा नहीं मिल पाई है।

सकंड गाँव तक पहुँचने के लिए ग्रामीणों को बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग के गौचर–सिदोली मोटर मार्ग से उतरकर वौंला या खरसाईं नामक स्थान से खड़ी और बीहड़ पहाड़ी चढ़ाई तय करनी पड़ती है। बरसात और सर्दी के मौसम में यह रास्ता और भी जोखिम भरा हो जाता है। यही कारण है कि वर्षों से सड़क की मांग कर रहे ग्रामीण कई बार चुनाव बहिष्कार भी कर चुके हैं।

यातायात सुविधा न होने से आधे से अधिक परिवार गाँव छोड़ चुके हैं। जो लोग अब भी टिके हुए हैं, उनका जीवन रोजमर्रा की मुश्किलों से घिरा हुआ है। क्षेत्र में राजमा, आलू, चौलाई और पहाड़ी ककड़ी जैसी फसलों का भरपूर उत्पादन होता है, लेकिन सड़क न होने के कारण किसान अपनी उपज बाजार तक नहीं पहुँचा पाते और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
छात्र संख्या घटने के कारण प्राथमिक विद्यालय भी बंद हो गया है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ग्रामीणों को आज भी डंडी–कांडी का सहारा लेना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रसव पीड़ा के दौरान कई महिलाओं ने अस्पताल पहुँचने से पहले ही दम तोड़ दिया, लेकिन हालात अब भी नहीं बदले।

यह क्षेत्र स्थानीय विधायक अनिल नौटियाल का गृह क्षेत्र भी है। वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने सात किलोमीटर सड़क निर्माण की घोषणा की थी, लेकिन अब तक केवल दो किलोमीटर निर्माण ही हो पाया है। रानीगढ़ संघर्ष समिति के अध्यक्ष बीरेंद्र सिंह, महेंद्र सिंह और देवराज चौधरी का कहना है कि कई बार आश्वासन मिलने के बावजूद मामला अब भी फाइलों में अटका हुआ है। ग्रामीणों ने 5 जनवरी से धरना–प्रदर्शन और आमरण अनशन की चेतावनी दी है।

उधर, लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता सुनील कुमार का कहना है कि दो वर्ष पहले संकड मोटर मार्ग प्रस्ताव को केंद्रीय वन मंत्रालय ने अस्वीकृत कर दिया था। घना जंगल होने के कारण अब तक नया अलाइनमेंट भी तय नहीं हो पाया है।

ग्रामीणों की उम्मीद अब फिर एक बार प्रशासन और सरकार की ओर टिकी हुई है कि शायद इस बार उनकी दशकों पुरानी मांग पूरी हो सके।

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