राजनीति के अपराधीकरण पर 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर गंभीर सवाल
ADR की वेबिनार में लोकतंत्र, संघवाद और विधि शासन पर जताई गई चिंता

-By-Usha Rawat
नई दिल्ली, 21 जनवरी : राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण से निपटने के लिए प्रस्तावित 130वां संविधान संशोधन विधेयक लोकतंत्र को मज़बूत करेगा या सत्ता के दुरुपयोग का नया औज़ार बनेगा—इस सवाल पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा आयोजित वेबिनार में गहन विमर्श हुआ। “राजनीति का अपराधमुक्तिकरण: क्या 130वां संविधान संशोधन सही रास्ता है?” विषय पर यह वेबिनार 15 जनवरी 2026 को आयोजित किया गया।
वेबिनार में सांसदों, पूर्व चुनाव आयुक्त, विधायी विशेषज्ञों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्तावित संशोधन के संवैधानिक, कानूनी और लोकतांत्रिक पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए।
संसद में अपराधीकरण के चिंताजनक आंकड़े
वेबिनार के संचालक और ADR के ट्रस्टी डॉ. विपुल मुद्गल ने ADR के ताज़ा आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि 2024 में चुने गए 46 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि 31 प्रतिशत सांसद हत्या, बलात्कार, अपहरण और सशस्त्र डकैती जैसे गंभीर अपराधों के आरोपी हैं।
उन्होंने बताया कि 2009 की तुलना में आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या में 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो 2038 तक संसद के सभी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हो सकते हैं।
डॉ. मुद्गल ने कहा, “यह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर बीमारी है। लेकिन इलाज ऐसा नहीं होना चाहिए कि रोग के साथ रोगी की भी मृत्यु हो जाए। किसी भी सुधार पर पूरी गंभीरता से विचार ज़रूरी है।”
विधेयक पर उठे संवैधानिक प्रश्न
PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च के विधायी विशेषज्ञ चाक्षु रॉय ने चार अहम मुद्दों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को हटाने का अधिकार, जो वर्तमान में संसद या विधानसभा के पास है, क्या उसे पुलिस जैसी कार्यपालिका संस्थाओं को सौंपा जा सकता है?
उन्होंने संघवाद पर संभावित प्रभावों की ओर इशारा करते हुए कहा कि केंद्रीय एजेंसी द्वारा किसी मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी या राज्य एजेंसी द्वारा केंद्रीय मंत्री की गिरफ्तारी संवैधानिक टकराव को जन्म दे सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि गिरफ्तारी दोषसिद्धि नहीं होती, और कई मामलों में उच्च न्यायालयों में सज़ाएं पलट जाती हैं।
भाजपा सांसद ने उद्देश्य का समर्थन किया
राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने राजनीति के अपराधीकरण को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा, “जब कानून तोड़ने वाले कानून बनाने लगते हैं, तो जनता न्याय की उम्मीद कैसे करे?”
उन्होंने स्वीकार किया कि यह विधेयक पूर्ण समाधान नहीं हो सकता, लेकिन बदलाव की शुरुआत ज़रूरी है। “ट्रायल और एरर के ज़रिये आगे बढ़ा जा सकता है,” उन्होंने कहा।
विपक्ष ने सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाया
ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय समन्वयक अनामिका यादव ने विधेयक को विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपराधियों को राजनीति से बाहर करने के बजाय, ऐसे लोगों को टिकट देती है जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं।
उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि नाबालिग से बलात्कार के आरोपी को टिकट दिया गया और विधायक बनने के बाद दोषसिद्धि होने पर हटाया गया। साथ ही उन्होंने पिछले 11 वर्षों में ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया।
माकपा ने लोकतंत्र के क्षरण की चेतावनी दी
सीपीआई (एम) के वरिष्ठ नेता डॉ. फुआद हलीम ने कहा कि भारत में लोकतंत्र पहले से ही कमजोर स्थिति में है। उन्होंने तर्क दिया कि जनता केवल विधायिका का चुनाव करती है, न कि कार्यपालिका, न्यायपालिका या मीडिया का।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कार्यपालिका को निर्वाचित प्रतिनिधियों को हटाने का अधिकार दिया गया, तो यह संविधान में निर्धारित शक्तियों के पृथक्करण और विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन होगा।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त की संतुलित राय
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एस. कृष्णमूर्ति ने विधेयक के उद्देश्य को सराहनीय बताया, लेकिन इसे खंडित (piecemeal) समाधान करार दिया। उन्होंने कहा कि देश को व्यापक चुनावी सुधारों की ज़रूरत है।
उन्होंने सुझाव दिया कि संसद की नैतिकता समिति (एथिक्स कमेटी) के माध्यम से ऐसे मामलों की निगरानी अधिक संतुलित तरीका हो सकता है। “इरादा सही है, लेकिन बदले की भावना से इस्तेमाल की आशंका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता,” उन्होंने कहा।
और व्यापक चर्चा की ज़रूरत
वेबिनार के समापन पर डॉ. मुद्गल ने आगाह किया कि यह विधेयक ‘कानून का शासन’ के बजाय ‘कानून द्वारा शासन’ की स्थिति पैदा कर सकता है, खासकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत 90 दिनों तक की हिरासत व्यवस्था के संदर्भ में।
उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से आग्रह किया कि वह 30 दिन की समय-सीमा, विधेयक का केवल मंत्रियों पर लागू होना, और सांसदों-विधायकों को इससे बाहर रखने जैसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार करे। साथ ही यह भी पूछा कि क्या यह संशोधन संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है।
ADR ने दोहराया कि राजनीति का अपराधमुक्तिकरण ज़रूरी है, लेकिन कोई भी संवैधानिक सुधार लोकतंत्र और संघीय ढांचे को कमजोर नहीं करना चाहिए।
