आपदा/दुर्घटना

आपदा के चार महीने बाद भी धराली में अनिश्चितता का साया

 

50 से अधिक लोग अब भी लापता, प्रारंभिक रिपोर्ट में खुलासा

 उत्तरकाशी, 24 नवंबर। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के दूरस्थ गांव धाराली में 5 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश-फ्लड को लगभग चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन यहां के लोग अब भी दुविधा और अनिश्चितता में जी रहे हैं। यह गांव अब भी मानो ठहर-सा गया है — लोग नहीं जानते कि उनका बाजार क्षेत्र फिर से कभी बस पाएगा या नहीं, और जिन लोग अब भी लापता हैं, उनका क्या हुआ। सर्दी के बढ़ते प्रकोप के साथ उनकी चिंताएँ भी और बढ़ गई हैं।

5 अगस्त को संभावित ग्लेशियल झील विस्फोट (GLOF) के कारण आई भारी बाढ़ ने पानी, चट्टानों और मलबे की दीवार बनाकर खीर गाड (खीर गंगा) नाले के रास्ते धाराली को तहस-नहस कर दिया था।
इस बाढ़ ने गांव का बाजार, होटल, दुकानें और कई घरों को जमीनदोज कर दिया, साथ ही यहां की बड़ी आबादी को बेघर कर दिया।प्रारंभिक रिपोर्टों में कम से कम चार मौतों की पुष्टि हुई थी, लेकिन 50 से अधिक लोग अब भी लापता हैं।

स्थानीय निवासी सचेंद्र पंवार के अनुसार बाढ़ के बाद हालात लगभग वैसे ही बने हुए हैं। उनके शब्दों में, “उनका दर्द सिर्फ इस आपदा से नहीं, बल्कि इसके बाद की स्थिति से भी बढ़ गया है।”
दूसरे पीड़ित रजत पंवार ने न केवल अपने पिता को खोया, बल्कि होटल भी। उन्होंने कहा,
“हम अब भी किसी स्थायी जगह की तलाश में हैं। न अभी तक कोई सुरक्षा उपाय किए गए, न पुनर्वास कार्य का कोई आधार तैयार हुआ है।”

एसडीआरएफ और एनडीआरएफ ने राहत एवं बचाव अभियान तो पूरा कर लिया है, मशीनें और खुदाई कार्य बंद हो चुके हैं,
लेकिन धाराली के लोगों की पीड़ा अब भी जस की तस है — “चोटें अब और गहरी हो गई हैं।”

स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले बचाव दलों की आवाज सुनकर लगता था कि शायद कोई बच जाए, लेकिन अब वह उम्मीद भी खत्म हो गई है।

एक स्थानीय निवासी के अनुसार, “हमारी समस्या सिर्फ आपदा नहीं, उसके बाद की स्थितियां भी हैं।”आधिकारिक आंकड़े अभी भी चिंता बढ़ाते हैं।

आपदा प्रबंधन अधिकारी शार्दुल गुसाईं के अनुसार:

कुल 56 लोग बाढ़ के बाद लापता बताए गए,

जिनमें से 4 के शव मिले,

12 को मृत घोषित किया गया,

जबकि 40 लोग अभी भी लापता हैं।
इनमें 12 नेपाली नागरिक भी शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह आपदा सिर्फ बाढ़ नहीं थी, बल्कि “जीवन-यापन का संकट” भी है, क्योंकि लोगों के पास पुनर्वास की कोई स्पष्ट योजना नहीं है—न घर, न आय, न संसाधन।

देहरादून स्थित एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने 9 नवंबर को धाराली का दौरा किया। उन्होंने कहा,
“मैंने यहां त्रासदी की विशालता को करीब से देखा। न राहत कार्य का कोई संकेत है न पुनर्निर्माण का। लोगों का मनोबल टूटा हुआ है और वे ठगा हुआ महसूस करते हैं।”

उन्होंने बताया कि लोग शिकायत कर रहे थे कि “सरकारें और प्रशासन उन्हें लगभग भूल चुके हैं।”
अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि पुनर्वास कार्य कब शुरू होगा।
सर्दियों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, स्थानीय लोगों का मानना है कि आने वाले कई महीनों तक किसी बड़े कदम की उम्मीद नहीं दिखती।

इसी बीच, विशेषज्ञों की रिपोर्ट भी अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है।
उत्तराखंड लैंडस्लाइड मिटिगेशन मैनेजमेंट सेंटर, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, IIT रुड़की, वाडिया हिमालयन भूविज्ञान संस्थान और कई अन्य संस्थानों की टीमों ने 13–16 अगस्त के बीच धाराली और हर्षिल का सर्वे किया था और अपनी रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) को सौंप दी थी।

लेकिन रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है और न ही जिलाधिकारी या एनडीएमए ने बताया है कि इसकी सिफारिशों पर क्या कार्रवाई होगी।

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