अंकिता हत्याकांड में अनिल जोशी मुख्य पैरोंकार बनने पर सामाजिक संगठनों ने उठाये सवाल ।
देहरादून, 13 जनवरी। अंकिता हत्याकांड में अनिल जोशी की एफआईआर में सीबीआई जांच की संस्तुति को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए है । प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अंकिता हत्याकांड पर राजनीतिक प्रशासनिक संरक्षण की गंभीर आंशका व्यक्त की ।
मूल निवास संघर्ष समिति के संयोजक लूशून टोडरिया ने कहा कि उत्तराखंड सरकार अंकिता के माता पिता के पत्र का संज्ञान न लेकर पर्यावरणविद अनिल जोशी की एफआईआर का संज्ञान लेकर सीबीआई जांच की संस्तुति देना सवाल पैदा करता है । अनिल जोशी दो वर्ष से इस पूरे प्रकरण पर चुप्पी साधे हुए थे पर अचानक से ऐसा क्या हुआ कि अनिल जोशी को अंकिता घटनाक्रम की गम्भीरता का अंदाजा हुआ और उन्होंने एफआईआर दर्ज की ।
राष्ट्रीय रीजनल पार्टी की अध्यक्ष सुलोचना इस्टवाल ने कहा कि धराली आपदा, जोशीमठ संकट और देवदार के पेड़ों की कटान जैसे उत्तराखंड के ज्वलंत पर्यावरणीय मुद्दों पर उनकी चुप्पी लगातर अनिल जोशी को संदेह के घेरे में लाती रही है ।
मूल निवास भू कानून संघर्ष समिति के राकेश नेगी ने कहा कि अंकिता हत्याकांड एक ऐसा गंभीर अपराध है, जो प्रथम दृष्टया राजनीतिक एवं प्रशासनिक संरक्षण के साए में घटित हुआ प्रतीत होता है। प्रकरण की जाँच और अब तक की कार्यवाही कई गंभीर सवाल खड़े करती है, जिनका उत्तर सरकार और जाँच एजेंसियों को देना चाहिए।
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के प्रमोद काला ने कहा कि
सीबीआई जाँच सामान्यतः पूरे प्रकरण की होती है, किंतु इस मामले में जाँच को सीमित कर केवल वर्तमान में वायरल ऑडियो तक समेट दिया गया है, जो न्याय की भावना के विपरीत है।
पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल ने कहा कि यह तथ्य सामने आया है कि अनिल जोशी हेस्को (HESCO) से जुड़े हैं और सरकार के विभिन्न कार्यों में उनकी भूमिका रही है। ऐसे में उनका इस प्रकरण में मुख्य पैरोकार बनना पूरे मामले को प्रभावित करने और जाँच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
उत्तराखंड क्रांति सेना के ललित श्रीवास्तव ने कहा जब अंकिता के माता-पिता द्वारा पहले ही शिकायत दर्ज कराई जा चुकी थी, तो उसी शिकायत के आधार पर सीबीआई जाँच कराने के बजाय नई शिकायत दर्ज कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह भी एक गंभीर सवाल है।
आकांक्षा नेगी ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में लगातार यह देखने को मिल रहा है कि सत्ताधारी भाजपा से जुड़े नेता किसी न किसी रूप में वीआईपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि मुख्यमंत्री स्वयं पौड़ी जाकर पीड़ित परिवार से मिल सकते थे, तो फिर परिवार को अपने आवास पर बुलाकर गुप्त बैठक क्यों की गई। स्वयं पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की थी, लेकिन इसके विपरीत अनिल जोशी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई, जबकि वही एफआईआर अंकिता के माता-पिता को मुख्य पैरोकार बनाकर भी की जा सकती थी।
प्रेस वार्ता में अधिवक्ता संदीप चमोली, पौड़ी बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक नमन चंदोला, स्वाभिमान मोर्चा के अनिल डोभाल,जय संविधान संगठन के विकास कुमार उत्तराखंडी, नवनीत कुकरेती,कीर्ति बिष्ट आदि मौजूद रहे।
