व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा: रणनीतिक साझेदारी की मजबूती और वैश्विक चुनौतियाँ
–जयसिंह रावत –
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 4-5 दिसंबर को भारत की यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है। यह यात्रा 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर हो रही है, जो चार वर्षों के बाद पुतिन की पहली पूर्णकालिक यात्रा है। इस दौरान दोनों नेता ऊर्जा, रक्षा और व्यापार जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा करेंगे, जो वैश्विक भू-राजनीति के बदलते परिदृश्य में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को रेखांकित करता है।
द्विपक्षीय संबंधों की पृष्ठभूमि
भारत और रूस के बीच “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” दशकों पुरानी है, जो सोवियत काल से चली आ रही है। यूक्रेन युद्ध के बावजूद, भारत ने रूस के साथ आर्थिक जुड़ाव बनाए रखा है, जबकि पश्चिमी दबाव के बीच संतुलन साधा है। 2024 में मोदी की मॉस्को और कज़ान यात्राओं के बाद यह शिखर सम्मेलन संबंधों को नई गति देगा। हालाँकि, अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापारिक संबंधों और ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने इस साझेदारी को जटिल बना दिया है।
मुख्य एजेंडा: ऊर्जा, रक्षा और व्यापार पर फोकस
यात्रा का केंद्रीय एजेंडा आर्थिक और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है।
- ऊर्जा क्षेत्र: रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, जो कुल आयात का 35% हिस्सा रखता है। पुतिन छूट वाले रूसी कच्चे तेल की बिक्री बढ़ाने का प्रयास करेंगे, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंध (जैसे रोसनेफ्ट और लुकोइल पर) और द्वितीयक प्रतिबंधों की आशंका से निजी भारतीय रिफाइनरियाँ सतर्क हैं। भारत के रूसी तेल आयात में एक तिहाई की कमी आई है, जबकि अमेरिकी गैस आयात बढ़ा है। चर्चा में भारतीय निर्यात (फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी) को बढ़ावा देकर संतुलन बनाने पर जोर होगा।
- रक्षा सहयोग: एस-400 मिसाइल प्रणाली की अतिरिक्त खरीद (2026 तक विलंबित), पैंटसीर एयर डिफेंस सिस्टम का संयुक्त विकास और वोरोज़ेह रडार सिस्टम की खरीद प्रमुख मुद्दे हैं। पाकिस्तान के साथ हालिया तनाव के बाद रूसी हथियारों की मांग बढ़ी है, जो भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करेगी।
- व्यापार और अन्य: द्विपक्षीय व्यापार 2021-22 के 13.1 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 68.7 अरब डॉलर हो गया है, लक्ष्य 100 अरब डॉलर का। नागरिक उड्डयन, महत्वपूर्ण खनिज और श्रम प्रवास पर भी बात होगी।
भू-राजनीतिक संतुलन और चुनौतियाँ
यह यात्रा भारत के लिए एक कठिन संतुलन परीक्षा है। ट्रंप प्रशासन की 50% टैरिफ नीति और “सैंक्शनिंग रूस एक्ट 2025” (रूसी तेल खरीदने वालों पर 500% शुल्क) से भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है, जो कृषि, ऑटोमोबाइल और स्टील उद्योगों को प्रभावित करेगी। साथ ही, सीएएटीएसए के तहत रक्षा सौदों पर प्रतिबंध की धमकी है। रूस की चीन के साथ बढ़ती निकटता भी भारत के लिए चिंता का विषय है।
फिर भी, अवसर स्पष्ट हैं। यह यात्रा बीआरआईसीएस जैसे मंचों पर सहयोग को मजबूत करेगी, जो पश्चिमी-प्रधान वैश्विक व्यवस्था का मुकाबला करेगा। भारत के लिए रूस “समय-परीक्षित साझेदार” बने रहने से विदेश नीति को बाहरी झटकों से बचाव मिलेगा। मॉस्को को भारत के अमेरिकी झुकाव से नाराजगी हो सकती है, लेकिन ऊर्जा और रक्षा निर्यात से उसकी पकड़ मजबूत होगी। कुल मिलाकर, यह यात्रा भारत की बहु-संरेखण नीति (मल्टी-अलायनमेंट) की सफलता का प्रमाण होगी, जहाँ रूस के साथ गहराई अमेरिका के साथ संबंधों को प्रभावित न करे।
भारत-रूस संबंधों को नई ऊर्जा
पुतिन की यात्रा भारत-रूस संबंधों को नई ऊर्जा देगी, लेकिन वैश्विक दबावों के बीच सतर्कता जरूरी है। यदि दोनों देश प्रतिबंधों का सामना करते हुए विविधीकरण पर ध्यान दें, तो 100 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य हासिल हो सकता है। यह न केवल द्विपक्षीय लाभ देगा, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को सशक्त करेगा। भविष्य में नियमित शिखर सम्मेलन इस साझेदारी को स्थिरता प्रदान करेंगे।

