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नंदा गौरा छात्रवृत्ति :  स्कॉलरशिप लेते ही पढ़ाई छोड़ने का ट्रेंड!

-डा0 सुशील उपाध्याय –

उत्तराखंड सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में लड़कियों का पंजीकरण बढ़ाने के उद्देश्य से आरंभ की गई नंदा गौरा योजना छात्रवृत्ति के परिणाम पहले वर्ष में तेज पंजीकरण और इसके बाद लगभग उतनी ही तेजी से ड्रॉपआउट के रूप में सामने आ रहे हैं। छात्रवृत्ति की राशि मिलने के बाद गरीब परिवारों में लड़कियों की पढ़ाई के प्रति उदासीनता का माहौल बन जाता है। इस योजना में कुछ आंशिक परिवर्तन करके न केवल लड़कियों की उपस्थिति बनाए रखी जा सकती है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार किया जा सकता है।

भारत सरकार का लक्ष्य यह है कि 17 से 23 वर्ष के युवाओं में से लगभग 50 प्रतिशत युवा उच्च शिक्षा में पंजीकृत हों। इसके लिए सरकार ने वर्ष 2035 तक का लक्ष्य निर्धारित किया है। उत्तराखंड इस लक्ष्य के काफी निकट है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) की 2021-22 की रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड में 17 से 23 वर्ष आयु वर्ग के 40 प्रतिशत से अधिक युवा किसी न किसी कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय में स्नातक उपाधि के लिए पंजीकृत हैं। इनमें लड़कियों की संख्या भी लगभग बराबरी की है। (2025-26 के पंजीकरण को देखें तो यह आंकड़ा 45 फीसद पार कर चुका होगा, हालांकि इसकी पुष्टि AISHE की नई रिपोर्ट आने के बाद ही होगी।) विगत वर्षों में उत्तराखंड सरकार की नंदा गौरा योजना ने लड़कियों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन यह संख्या स्नातक उपाधि के प्रथम वर्ष के बाद बहुत तेजी से घटती चली जाती है। पंजीकरण बढ़ने की प्रमुख वजह नंदा गौरा छात्रवृत्ति है और गिरावट की प्रमुख वजह उसी छात्रवृत्ति का गलत क्रियान्वयन है। (हालांकि इस पर व्यवस्थित अकादमिक अध्ययन की जरूरत है ताकि इसके वास्तविक परिणामों को तथ्यात्मक रूप से जाना जा सके।)
इस योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा उन सभी छात्राओं को 51 हजार रुपये की एकमुश्त राशि प्रदान की जाती है, जिन्होंने 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद राज्य के किसी उच्च शिक्षा संस्थान, चाहे वह कॉलेज हो अथवा विश्वविद्यालय, में प्रवेश लिया हो। इस योजना का लाभ देने के लिए परिवार की आय, एक ही परिवार में लड़कियों की संख्या जैसे कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। इन मानकों का पालन करते हुए भी प्रत्येक वर्ष 25 से 30 हजार छात्राओं को इस योजना का लाभ मिलता रहा है। मौजूदा शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में भी इस योजना के अंतर्गत 30 हजार से अधिक आवेदन महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग को प्राप्त हुए हैं। यही विभाग इस योजना का क्रियान्वयन करता है।
51 हजार रुपये की स्कॉलरशिप इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य किसी प्रोफेशनल डिग्री के लिए आज के समय में बहुत आकर्षक नहीं मानी जा सकती, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बीए, बीएससी, बीकॉम जैसे सामान्य डिग्री कार्यक्रमों में प्रवेश लेने वाली छात्राओं के लिए यह राशि काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रथम वर्ष में प्रवेश के कुछ महीने के भीतर ही सरकार यह राशि सीधे संबंधित छात्रा के खाते में जारी कर देती है। इस योजना के चलते उत्तराखंड के मैदानी ग्रामीण क्षेत्रों में विगत वर्षों में लड़कियों का पंजीकरण काफी तेजी से बढ़ा है, लेकिन यह सुखद स्थिति उस समय चिंता में बदल जाती है जब यह राशि छात्रा के खाते में पहुंचने के बाद अगले सत्र में एक चौथाई से अधिक छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं। (कई स्थानों पर और कुछ अल्पसंख्यक समूहों के मामले में यह संख्या और भी ज्यादा है)
गरीब परिवारों के लिए यह राशि लड़कियों की पढ़ाई की बजाय परिवार की व्यक्तिगत आवश्यकताओं में अधिक खर्च हो रही है। इन परिवारों की अधिकतर छात्राएं ऐसी स्थिति में नहीं होतीं कि वे प्रतिवाद कर सकें कि यह राशि केवल उनकी पढ़ाई के लिए है और इसे किसी अन्य कार्य में खर्च नहीं किया जाना चाहिए। डिग्री कॉलेजों में अनेक अभिभावक प्रवेश दिलाने के तुरंत बाद यह पूछने लगते हैं कि उनकी बेटी के खाते में नंदा गौरा योजना की राशि कब तक आएगी। ऐसे मामलों में अभिभावकों की रुचि छात्रा की पढ़ाई जारी रखने की बजाय इस पैसे को प्राप्त करने में अधिक दिखाई देती है। जबकि सरकार का उद्देश्य यह रहा है कि इस राशि से तीन या चार वर्ष की डिग्री अवधि के दौरान पुस्तकों, अध्ययन सामग्री, दैनिक यात्रा व्यय, यूनिफॉर्म आदि की जरूरतें पूरी की जा सकें, लेकिन कई अभिभावकों के लिए यह एक अतरिक्त इनकम की तरह बन गई है।
अब प्रश्न यह है कि इस योजना के क्रियान्वयन में ऐसे कौन से परिवर्तन किए जाएं, जिससे छात्राओं के ड्रॉपआउट को रोका जा सके। इसका सबसे सरल उपाय यह हो सकता है कि 51 हजार रुपये की राशि एक साथ जारी करने के बजाय तीन किस्तों में प्रदान की जाए। प्रवेश के समय 17 हजार रुपये, प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने पर 17 हजार रुपये और दूसरा वर्ष उत्तीर्ण करके तीसरे वर्ष में प्रवेश लेने पर शेष 17 हजार रुपये दिए जाएं। जो छात्राएं राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत चार वर्षीय स्नातक उपाधि पूरी करने की इच्छुक हों, उन्हें चौथे वर्ष में भी कुछ अतिरिक्त राशि प्रदान करने पर विचार किया जा सकता है।
एक अन्य तरीका यह हो सकता है कि नंदा गौरा योजना के अंतर्गत चयनित सभी छात्राओं की कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बायोमेट्रिक उपस्थिति अनिवार्य की जाए। सरकार न्यूनतम 180 दिन की उपस्थिति को आवश्यक मानती है (इस बारे में शासनादेश भी निर्गत किया गया है) इसलिए ऐसी छात्राओं को प्रति बायोमेट्रिक उपस्थिति 100 रुपये की दर से प्रोत्साहन राशि निर्धारित की जा सकती है। शैक्षणिक वर्ष के अंत में जिन छात्राओं की उपस्थिति 180 दिन या उससे अधिक हो, उन्हें उनकी वास्तविक उपस्थिति के अनुरूप नंदा गौरा योजना के अंतर्गत राशि जारी की जाए। यह व्यवस्था तब तक जारी रखी जा सकती है, जब तक छात्रा द्वारा स्नातक उपाधि पूर्ण न कर ली जाए। इसके दो बड़े लाभ होंगे। पहला, कक्षाओं में उपस्थिति की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और दूसरा, ड्रॉपआउट की संभावना काफी हद तक कम हो जाएगी। हालांकि इससे संस्थानों के स्तर पर थोड़ा काम बढ़ जाएगा क्योंकि उन्हें प्रत्येक वर्ष छात्राओं का बायोमेट्रिक उपस्थिति रिकॉर्ड विभाग को उपलब्ध कराना होगा।
इस योजना को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के एक साधन के रूप में भी देखा जा सकता है। जो छात्राएं 75 प्रतिशत या उससे अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण हों, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि देने पर भी विचार किया जाना चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों और शैक्षणिक माहौल को ध्यान में रखते हुए अंक प्रतिशत की इस सीमा में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया जा सकता है। इससे छात्राओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण विकसित होगा।
वस्तुतः इस योजना का वास्तविक लक्ष्य केवल 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद छात्राओं का डिग्री स्तर पर पंजीकरण कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह होना चाहिए कि सभी पंजीकृत छात्राएं अपनी स्नातक उपाधि सफलतापूर्वक पूरी करें। इस योजना का विस्तार स्नातक के बाद स्नातकोत्तर स्तर तक भी किया जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अब 12वीं के बाद प्रथम वर्ष में प्रवेश से लेकर पांचवें वर्ष तक निरंतर अध्ययन का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। ड्रॉप आउट के बाद पुनः प्रवेश भी ले सकते हैं।
पैसे के वितरण की व्यवस्था में बदलाव करने से संभव है कि इस योजना में सरकार का कुछ प्रतिशत अतिरिक्त व्यय बढ़ जाए, लेकिन इसके अंतिम परिणामों में व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देंगे। वर्तमान में इस योजना के कुछ मानकों के चलते इसके दायरे में प्रत्येक वर्ष प्रवेश लेने वाली छात्राओं में से लगभग आधी छात्राएं ही पात्र हो पाती हैं। जबकि, बेहतर यह होगा कि इस योजना के अंतर्गत सभी वर्गों (आरक्षित एवं अनारक्षित) और सभी आय समूहों की छात्राओं को सम्मिलित किया जाए, ताकि इसका लाभ व्यापक स्तर पर शिक्षा की निरंतरता और गुणवत्ता को सुनिश्चित कर सके। वैसे भी, अब राज्य में संख्यात्मक (GER) उपलब्धि की बजाय गुणात्मक (QER) की कहीं अधिक जरूरत है क्योंकि उत्तराखंड 50 फीसद GER के राष्ट्रीय लक्ष्य को डेडलाइन (वर्ष 2035) से बहुत पहले हासिल कर चुका होगा।

 

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