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एक प्राचीन जलवायु रहस्य: जब कनाडा की ठंड ने भारत का मानसून चुरा लिया

चित्र 1. मध्य भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरबा जिले का शटल रडार स्थलाकृतिक मिशन (एसआरटीएम) डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम), जिसमें अध्ययन क्षेत्र का स्थान दर्शाया गया है (लाल तारा जांच स्थल को दर्शाता है)। भारत का भौगोलिक मानचित्र, जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य का कोरबा जिला और भारत का कोर मानसून क्षेत्र (सीएमजेड) (गहरे काले रंग और मोटी रेखाएं) दर्शाया गया है (बाएं ऊपरी पैनल)। यह चित्र एआरसीजीआईएस 10.8.2 का उपयोग करके बनाया गया है। निकटतम जलवायु अनुसंधान इकाई समय श्रृंखला (सीआरयू टीएस) 4.07, 0.5 × 0.5 ग्रिडेड जलवायु डेटा बिंदु, 1901-2022, अध्ययन क्षेत्र के आसपास औसत मासिक वर्षा और तापमान को दर्शाता है (निचले पैनल में डाला गया है)। एमएपी = औसत वार्षिक वर्षा; एमएटी = औसत वार्षिक तापमान

 

 AROUND 8,200 YEARS AGO, A DROP IN TEMPERATURE IN CANADA AT ONE END OF THE GLOBE TRIGGERED A DECLINE IN THE INTENSITY OF THE INDIAN SUMMER MONSOONS, SCIENTISTS HAVE FOUND. THE “8.2 KA COOLING EVENT” IS THE LARGEST CLIMATIC EXCURSION OF THE HOLOCENE FROM THE PERSPECTIVE OF GREENLAND TEMPERATURE CHANGE. GREENLAND TEMPERATURE DROPPED BY 3 ºC, AND METHANE DECLINED BY 80 PPBV, WHICH SUGGEST AN IMPORTANT CHANGE IN THE HYDROLOGIC CYCLE. DURING CA. 8220 TO 7600 CAL YR BP ALSO CALLED THE “8.2 KA COOLING EVENT” GREENLAND TEMPERATURE DROPPED BY 3 ºC, AND METHANE DECLINED BY 80 PPBV DUE TO GLACIAL OUTBURST FLOOD OF FRESHWATER FROM LAKE AGASSIZ THOROUGH THE HUDSON BAY INTO THE NORTH ATLANTIC.

 

By- Jyoti Rawat

करीब 8,200 साल पहले पृथ्वी पर एक ऐसी घटना घटी जिसने दुनिया के भूगोल और मौसम को पूरी तरह हिला कर रख दिया था। वैज्ञानिकों ने पाया है कि उस समय कनाडा में आई एक भीषण ठंड की वजह से हज़ारों मील दूर भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून की रफ़्तार सुस्त पड़ गई थी।

क्या थी ‘8.2 हज़ार वर्षकी वह बड़ी घटना?

पृथ्वी के ‘होलोसीन काल’ (Holocene period) के दौरान हुई यह अब तक की सबसे बड़ी जलवायु परिवर्तनकारी घटना मानी जाती है। उस समय कनाडा की ‘अगासिज़ झील’ (Lake Agassiz) से ताजे पानी का एक विशाल हिमनदी विस्फोट हुआ, जिससे भारी मात्रा में बर्फीला पानी हडसन की खाड़ी के रास्ते उत्तरी अटलांटिक महासागर में जा मिला।

इसका परिणाम यह हुआ कि ग्रीनलैंड का तापमान अचानक 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया और वातावरण में मीथेन का स्तर 80 PPBV कम हो गया। यह केवल तापमान की गिरावट नहीं थी, बल्कि पृथ्वी के जल चक्र (Water Cycle) में आया एक बहुत बड़ा बदलाव था।

छत्तीसगढ़ की झील में छिपे ऐतिहासिक सुराग

इस वैश्विक घटना के निशान भारत में खोजने के लिए बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP) के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित तुमान झील को चुना। वैज्ञानिकों ने झील की तलहटी से 1.2 मीटर लंबी मिट्टी (तलछट) की एक प्रोफाइल निकाली। यह मिट्टी दरअसल समय की एक किताब थी, जिसकी हर परत में हज़ारों साल पुराने रहस्य दफन थे।

चित्र 2. वैश्विक स्तर पर 8.2 हजार वर्ष पूर्व मानसून का कमजोर होना और वर्तमान अध्ययन (8220 कैलेंडर वर्ष पूर्व) के साथ इसका सहसंबंध। (ए) वर्तमान अध्ययन और अन्य अध्ययनों के साथ सहसंबंध। (बी) उत्तर-पश्चिमी भारत की रिवासा झील से प्राप्त ऑस्ट्राकोड कैल्साइट (हरा) और बल्क कार्बोनेट (नारंगी) का δ 18O रिकॉर्ड (दीक्षित एट अल. 2014)। (सी) कोटमसर गुफा (कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, जगदलपुर, बस्तर जिला, छत्तीसगढ़), सीएमजेड, भारत से प्राप्त स्पेलियोथेम δ 18 O रिकॉर्ड (बैंड एट अल. (2018)। (डी, ई और एफ) कंवर आर्द्रभूमि से प्राप्त रिकॉर्ड (औसत कण आकार, संतृप्ति समतापी अवशिष्ट चुंबकत्व और निम्न-आवृत्ति चुंबकीय संवेदनशीलता का अनुपात और (एनहिस्टेरेटिक रीमैनेंट मैग्नेटाइजेशन) और एसआईआरएम (सैचुरेशन इज़ोथर्मल रीमैनेंट मैग्नेटाइजेशन) ) (फर्टियाल एट अल., 2024)। (इस चित्र के कैप्शन में रंगों के संदर्भों की व्याख्या के लिए, पाठक इस लेख के वेब संस्करण को देख सकते हैं)

 

परागकण: प्रकृति केफिंगरप्रिंट

इस शोध का सबसे दिलचस्प हिस्सा था जीवाश्म पराग (Fossil Pollen) का विश्लेषण। हर पौधा एक विशिष्ट प्रकार का परागकण पैदा करता है। वैज्ञानिकों ने प्रति नमूने में 300 स्थलीय परागकणों की पहचान की। इस तकनीक से अतीत का एक “हाई-रिज़ॉल्यूशन क्लाइमेट रिकॉर्ड” तैयार किया गया:

नम पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous Forest): अगर मिट्टी में इनके पराग अधिक मिले, तो इसका मतलब था कि उस समय मानसून बहुत मजबूत था और बारिश खूब होती थी।

शुष्क या शाकीय पराग (Dry or Herbaceous Pollen): इनकी अधिकता का मतलब था कि मानसून कमजोर था और मौसम सूखा रहता था।

कैसे जुड़ा है ग्रीनलैंड और भारत का मानसून?

‘क्वाटरनरी इंटरनेशनल’ पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि 8.2 हजार वर्ष पहले भारत में मानसून बेहद कमजोर पड़ गया था। रेडियोकार्बन डेटिंग और सांख्यिकीय मॉडलिंग के जरिए वैज्ञानिकों ने एक सटीक समयरेखा तैयार की, जिससे एक चौंकाने वाला “टेलिकनेक्शन” (Tele-connection) सामने आया।

जब ग्रीनलैंड और उत्तरी अटलांटिक में तापमान गिरा, तो वहां के समुद्री परिसंचरण (Ocean Circulation) में भारी व्यवधान आया। इस गड़बड़ी ने दुनिया भर की हवाओं के पैटर्न (Global Wind Belts) को बदल दिया। चूँकि पृथ्वी का वातावरण आपस में जुड़ा हुआ है, इसलिए उत्तरी गोलार्ध में आई इस ठंडक ने भारतीय मानसून की हवाओं को कमजोर कर दिया, जिससे भारत में वर्षा में भारी कमी आई।

यह खोज हमें क्या सिखाती है? यह शोध साबित करता है कि मध्य होलोसीन काल में भी भारतीय मानसून केवल स्थानीय कारकों पर निर्भर नहीं था। यह ऊंचे अक्षांशों (जैसे आर्कटिक और अटलांटिक) में होने वाले महासागरीय बदलावों और उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र की हलचलों के प्रति अत्यंत संवेदनशील था। आज के जलवायु परिवर्तन के दौर में, अतीत का यह सबक हमें भविष्य की चुनौतियों के लिए सतर्क करता है।

समय की गणना करने वाली प्राकृतिक घड़ी: रेडियोकार्बन डेटिंग

रेडियोकार्बन डेटिंग या C-14 डेटिंग एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जो हमें बताती है कि कोई जैविक वस्तु, जो कभी जीवित थी, कितनी पुरानी है। इसकी प्रक्रिया हमारे वायुमंडल से शुरू होती है, जहाँ अंतरिक्ष से आने वाली किरणों के प्रभाव से लगातार कार्बन-14 () नामक एक रेडियोधर्मी तत्व बनता रहता है। सभी पेड़-पौधे और जीव-जंतु अपने जीवनकाल में सांस और भोजन के माध्यम से इस कार्बन-14 को अपने शरीर में सोखते रहते हैं। जब तक कोई जीव जीवित रहता है, उसके शरीर में कार्बन-14 और सामान्य कार्बन-12 का अनुपात वायुमंडल के समान ही बना रहता है। लेकिन जैसे ही उस जीव की मृत्यु होती है, वातावरण से नया कार्बन लेने की प्रक्रिया रुक जाती है। मृत्यु के क्षण से ही शरीर में पहले से मौजूद कार्बन-14 धीरे-धीरे एक निश्चित गति से क्षय यानी कम होना शुरू हो जाता है, जबकि सामान्य कार्बन-12 की मात्रा वैसी ही रहती है। वैज्ञानिकों को पता है कि कार्बन-14 की ‘अर्ध-आयु’ लगभग 5,730 वर्ष होती है, जिसका अर्थ है कि इतने समय बाद इसकी मात्रा घटकर आधी रह जाएगी। अंततः प्रयोगशाला में आधुनिक मशीनों के जरिए अवशेषों में बचे हुए कार्बन के इन दोनों रूपों के अनुपात को मापा जाता है। इसी अंतर के गणितीय विश्लेषण से यह सटीक जानकारी मिल जाती है कि वह जीव या वस्तु कितने हजार साल पुरानी है। यह तकनीक पुरातात्विक खोजों और प्राचीन जलवायु को समझने में मील का पत्थर साबित होती है।

प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.1016/j.quaint.2025.110103

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