सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड राज्य निर्वाचन आयोग पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया

नाम एक से अधिक मतदाता सूची में होने पर उम्मीदवार की नामांकन स्वीकार्यता पर आयोग की सफाई को ठुकराया
नई दिल्ली, 26 सितम्बर। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तराखंड राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) को कड़ी फटकार लगाते हुए उस पर दो लाख रुपये का जुर्माना ठोका। अदालत ने यह कार्रवाई आयोग द्वारा जारी उस स्पष्टीकरण के खिलाफ की, जिसमें कहा गया था कि किसी उम्मीदवार का नाम एक से अधिक ग्राम पंचायत, क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र या नगरीय निकाय की मतदाता सूची में दर्ज होने के बावजूद उसका नामांकन रद्द नहीं किया जाएगा।

दरअसल, जुलाई माह में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण पर रोक लगाते हुए कहा था कि यह राज्य के पंचायत राज अधिनियम, 2016 की धारा 9(6) और 9(7) के स्पष्ट प्रावधानों के खिलाफ है। उक्त धाराओं में स्पष्ट रूप से यह निषेध है कि कोई भी मतदाता एक से अधिक क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र अथवा एक से अधिक मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंदर और न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ ने उस समय टिप्पणी की थी कि निर्वाचन आयोग का यह स्पष्टीकरण “कानूनी प्रावधानों की भावना और उद्देश्य के विपरीत” है। अदालत ने कहा था, “जब अधिनियम स्पष्ट रूप से एक मतदाता का नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्र अथवा मतदाता सूची में दर्ज करने से रोकता है, तब आयोग का यह स्पष्टीकरण प्रत्यक्ष रूप से विधि के प्रावधानों का उल्लंघन प्रतीत होता है। अतः इसे रोका जाता है और इस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं होगी।”
इसके खिलाफ राज्य निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। शुक्रवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने आयोग की अपील को खारिज करते हुए पूछा कि आयोग कैसे विधिक प्रावधानों के विपरीत जाकर ऐसा स्पष्टीकरण जारी कर सकता है। अदालत ने न केवल अपील खारिज की बल्कि आयोग पर दो लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया।
यह मामला शक्ति सिंह नामक याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि निर्वाचन आयोग ने उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों की विधिवत जांच और सत्यापन का दायित्व निभाने में लापरवाही की। उनके अनुसार इस लापरवाही के चलते कई व्यक्तियों के नाम अलग-अलग मतदाता सूचियों में दर्ज रहे और इसके बावजूद उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई। इससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग गया।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि इस विषय पर अनेक शिकायतें दर्ज होने के बाद भी आयोग ने सुधारात्मक कदम उठाने के बजाय विवादित स्पष्टीकरण जारी कर दिया। हाईकोर्ट द्वारा रोक लगाने के बाद आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी खारिज कर दिया है।
