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तरसाली गांव, जो आजादी के 76 साल बाद भी एक अदद सड़क के लिए तरस रहा है

ऐसे पहुँचते हैँ तरसाली के लोग अपने गांव

-गौचर से दिग्पाल गुसाईं
सरकार भले ही पहाड़ी क्षेत्रों के अंतिम गांव को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की बात कर रही हो लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। इसका उदाहरण विकास खंड ऊखीमठ का तरसाली गांव है जिसे आजादी के 76 साल बाद भी यातायात सुविधा नसीब नहीं हो पाई है।

किसी भी क्षेत्र के विकास का पैमाना यातायात सुविधा पर निर्भर करता है। सरकार पहाड़ी क्षेत्रों के दूरस्थ गांवों को यातायात सुविधा से जोड़ने की बात को जोर शोर से कहकर स्वयं अपनी पीठ थपथपा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि आजादी के 76 साल तथा अलग राज्य बनने के 23 साल बाद भी कई गांवों को यातायात सुविधा नसीब नहीं हो पाई है। इनमें विकास खंड ऊखीमठ का तरसाली गांव भी सामिल है। ताजुब तो इस बात का है कि इस गांव को जाने के लिए ठीक से पैदल रास्ता भी नहीं है। केदारनाथ मुख्य मार्ग से तरसाली गांव जाने के लिए दो किलो मीटर खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है।

सामाजिक कार्यकर्ता बिसंभर सेमवाल बताते हैं कि दो साल पहले तरसाली के लिए राज्य वित योजना में मोटर मार्ग स्वीकृत किया गया था। लेकिन आज तक मोटर मार्ग नहीं बन पाया है। इस क्षेत्र के नौनिहालों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए पांच किलोमीटर दूर फाटा जाना पड़ता है। सक्षम लोग फाटा में ही किराए के मकान में रहकर अपने पाल्यों को शिक्षा ग्रहण करवाते हैं।

 

उनका कहना है कि गांव का रास्ता बरसात के दिनों से इस कदर क्षतिग्रस्त हो गया है कि इस रास्ते पर इंसान तो रहा दूर जंगली जानवर भी ठीक से नहीं चल पाता है। बीमारी के समय लोगों को बड़ी परेशानी झेलनी पड़ती है।

उन्होंने बताया कि इस संबंध में कई बार लोक निर्माण विभाग के ऊखीमठ डिवीजन से निवेदन किया जा चुका है लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है। अब गांव वालों के सामने आंदोलन के सिवा दूसरा रास्ता बचा नहीं है।

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