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25 वर्ष आसमान में: तेजस लड़ाकू विमान का संघर्षपूर्ण सफर

बेंगलुरु, 8 जनवरी। साल 2001 की 4 जनवरी को भारत में बने स्वदेशी लड़ाकू विमान ‘तेजस’ ने अपनी पहली उड़ान भरी थी। 18 मिनट की इस ऐतिहासिक उड़ान के पीछे तीन दशकों से अधिक का लंबा संघर्ष, तकनीकी प्रयोग, तकरार, देरी और वैज्ञानिक दृढ़ता की कहानी छिपी है। आज पच्चीस वर्ष बाद तेजस भारतीय वायुसेना की रीढ़ बनकर खड़ा है, लेकिन इसकी उड़ान तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं रहा।

पहली उड़ान और उस दिन का तनाव
4 जनवरी 2001 की सुबह बेंगलुरु के एचएएल एयरपोर्ट पर परीक्षण उड़ान की पूरी तैयारी कर ली गई थी। टेस्ट पायलट ग्रुप कैप्टन राजीव कोठियाल विमान के कॉकपिट में बैठे हुए बार-बार अपनी रणनीतियां और manoeuvres दिमाग में दोहरा रहे थे। इंजनों की आवाज और तकनीकी जांचों के बीच हर क्षण महत्वपूर्ण था।

सुबह 9:40 बजे विमान ने स्वचालित 12-मिनट के ‘बिल्ट-इन टेस्ट’ पूरे किए। उड़ान नियंत्रण प्रणाली ने चरणबद्ध तरीके से अपनी जांच पूरी की और अंततः 10:18 बजे कंट्रोल टॉवर से ‘गो’ का संकेत मिला। तेजस उड़ान भरा और 18 मिनट हवा में रहने के बाद सुरक्षित उतरा। यह पहला मौका था जब भारत ने एक पूर्ण स्वदेशी लड़ाकू विमान सफलतापूर्वक उड़ाया।
इस दौरान कुछ तकनीकी दिक्कतें भी आईं। उड़ान के तुरंत बाद ऑटो-ट्रैकिंग सिस्टम ने गलत डेटा देना शुरू कर दिया, लेकिन कोठियाल ने अपने अनुभव से स्थिति संभाल ली। परीक्षण के लिए यह जोखिम भरा था, पर कार्यक्रम नॉन-नेगोशिएबल था।

विकास की लंबी यात्रा
भारत में स्वदेशी लड़ाकू विमान बनाने का विचार 1970 के दशक के अंत में मजबूत हुआ। 1983 में सरकार ने औपचारिक रूप से इस परियोजना को मंजूरी दी और 1984 में एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) का गठन किया गया। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को इसका प्रमुख औद्योगिक भागीदार बनाया गया।
हालांकि परियोजना शुरू होते ही चुनौतियां सामने आने लगीं। तकनीकी विशेषज्ञों के बीच अक्सर बहस होती रही कि क्या भारत अपने दम पर उन्नत लड़ाकू विमान बना सकता है। उड़ान नियंत्रण प्रणाली, डिज़ाइन, सामग्री, इंजन—हर स्तर पर अड़चनें थीं।
आर्थिक संकट और प्रतिबंधों के बीच जारी रहा प्रयास
1990 के दशक में विदेशी मुद्रा संकट और पोखरण-II परमाणु परीक्षण के बाद लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने परियोजना को झटका दिया। कई देशों ने तकनीकी सहायता रोक दी, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने अनुसंधान जारी रखा। इस दौरान कार्यक्रम को बचाने में उद्योग जगत के दिग्गज रतन टाटा और राहुल बजाज की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उस समय ये दोनों इंडस्ट्रियलिस्ट परियोजना की उपयोगिता और स्वदेशी विकास की आवश्यकता लगातार सरकार तक पहुंचाते रहे।
नाम मिला ‘तेजस’
2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस विमान को आधिकारिक रूप से ‘तेजस’ नाम दिया। इस नाम के साथ यह केवल एक तकनीकी परियोजना न रहकर भारत की आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया।
मंज़ूरी में लंबी देरी
पहली उड़ान के लगभग दस वर्ष बाद 2011 में तेजस को ‘प्रारंभिक संचालन मंजूरी’ मिली। इसके बाद कई सुधार किए गए और 2019 में इसे ‘पूर्ण संचालन मंजूरी’ प्राप्त हुई। इस बीच वायुसेना के कुछ अधिकारियों ने इसके प्रदर्शन पर सवाल भी उठाए और और अधिक परीक्षणों की आवश्यकता बताई। कावेरी इंजन के विकास में विफलता के कारण तेजस के लिए अभी भी GE-F404 इंजन पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके बावजूद विमान के एयरफ्रेम और एवियोनिक्स को स्वदेशी स्तर पर विकसित किया गया है।
लागत और बेड़े की स्थिति
अब तक तेजस के विकास पर लगभग ₹17,269 करोड़ खर्च हो चुके हैं।
दिसंबर 2025 तक तेजस के 38 विमान भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल किए जा चुके होंगे। तेजस Mk-2 परियोजना को भी मंज़ूरी मिल चुकी है।
चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ता रहा कार्यक्रम
2012 में तेजस का एक प्रोटोटाइप दुर्घटनाग्रस्त भी हुआ, लेकिन कार्यक्रम नहीं रुका। परीक्षणों, सुधारों और नई आवश्यकताओं के अनुरूप लगातार बदलाव किए जाते रहे। कई अवसरों पर तेजस को लेकर राजनीतिक और तकनीकी आलोचना भी हुई, फिर भी परियोजना अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती रही।
आज का तेजस
आज तेजस भारतीय वायुसेना की दो स्क्वॉड्रनों में शामिल है। यह आधुनिक एवियोनिक्स, हल्के ढांचे और बेहतर maneuverability के कारण एक भरोसेमंद बहुउद्देश्यीय विमान के रूप में स्थापित हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय एयरो-शो में भी तेजस ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है।
तेजस केवल एक लड़ाकू विमान नहीं 
तेजस केवल एक लड़ाकू विमान नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक क्षमता, आत्मनिर्भरता और लंबे संघर्ष का प्रतीक है।
पच्चीस वर्षों में इसने साबित कर दिया है कि चुनौतियाँ चाहे कितनी ही बड़ी हों, संकल्प और निरंतर प्रयास से स्वदेशी तकनीक को आसमान तक पहुंचाया जा सकता है।

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