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शिक्षा का बदलता चेहरा: कोचिंग इंडस्ट्री का बढ़ता साम्राज्य

 

हर तीन में से एक बच्चा ले रहा निजी कोचिंग, ग्रामीण-शहरी शिक्षा में बढ़ी खाई

– उषा रावत

शिक्षा का मकसद हमेशा बच्चों को ज्ञान और कौशल से सशक्त बनाना रहा है, लेकिन आज यह एक महंगा निवेश बन चुका है। भारत में अब हर तीन में से एक बच्चा निजी कोचिंग ले रहा है। यह तथ्य हाल ही में जारी कंप्रीहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे (सीएमएस) 2025 से सामने आया है। यह प्रवृत्ति खासकर शहरी भारत में बेहद तेजी से बढ़ी है, जहाँ माता-पिता अपने बच्चों को निजी स्कूलों और महंगी कोचिंग कक्षाओं में भेजने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

ग्रामीण बनाम शहरी शिक्षा: एक स्पष्ट तस्वीर

सर्वे बताता है कि ग्रामीण भारत में आज भी सरकारी स्कूल बच्चों की शिक्षा का सबसे बड़ा सहारा हैं। यहाँ 66% छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि निजी सहायता प्राप्त स्कूलों का हिस्सा लगभग 24% है। इसके विपरीत शहरी भारत में तस्वीर बिल्कुल अलग है—सिर्फ 30.1% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जबकि 51.4% छात्र निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं।

शहरी परिवारों की आमदनी और आकांक्षाएं उन्हें सरकारी स्कूलों से दूर ले जा रही हैं। यही कारण है कि निजी स्कूलों का नेटवर्क तेजी से बढ़ा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूल अब भी शिक्षा की रीढ़ हैं।

आर्थिक बोझ: शिक्षा महंगी हो रही है

इस रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला पहलू शिक्षा पर खर्च का अंतर है।

  • सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों पर सालाना औसतन ₹2,863 खर्च होता है।
  • निजी स्कूलों में यह खर्च ₹25,002 तक पहुँच गया है, जो सरकारी स्कूल की तुलना में नौ गुना अधिक है।
  • शहरी परिवार औसतन प्रति छात्र कोर्स फीस के रूप में ₹15,143 खर्च कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण परिवार सिर्फ ₹3,979।
  • सिर्फ स्कूल फीस ही नहीं, यूनिफॉर्म, किताबें और परिवहन जैसे खर्च भी शहरी परिवारों के बजट का बड़ा हिस्सा खा रहे हैं। यह शिक्षा प्रणाली में बढ़ती सामाजिक-आर्थिक खाई को उजागर करता है।

 

कोचिंग: नया शैक्षिक दबाव

  • कोचिंग का प्रचलन अब बच्चों की पढ़ाई का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
  • ग्रामीण भारत के 25.5% छात्र निजी कोचिंग लेते हैं।
  • शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात और बढ़कर 30.7% तक पहुँच गया है।
  • ग्रामीण छात्र कोचिंग पर सालाना औसतन ₹1,793 खर्च करते हैं, जबकि शहरी छात्र लगभग ₹3,988।
  • उच्च माध्यमिक स्तर पर यह खर्च ₹6,384 तक पहुँच जाता है।
  • यानी, स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ कोचिंग की बढ़ती निर्भरता ने शिक्षा को एक महंगा सौदा बना दिया है।

फंडिंग: घरवालों पर पूरी जिम्मेदारी

सर्वेक्षण के अनुसार, 95% छात्रों की पढ़ाई का पूरा खर्च उनके परिवारों द्वारा वहन किया जाता है। सरकारी छात्रवृत्तियाँ केवल 1.2% छात्रों को मिलती हैं। इसका मतलब यह है कि सरकारी मदद शिक्षा खर्च का बड़ा हिस्सा नहीं उठा पा रही है, और पूरा दबाव परिवारों पर है।

शिक्षा का बाज़ारीकरण: एक चिंता का विषय

रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि शिक्षा अब बाज़ार-उन्मुख हो चुकी है। जहां ग्रामीण भारत के लिए सरकारी स्कूल अब भी जीवनरेखा हैं, वहीं शहरी भारत में बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और प्रतिस्पर्धा बच्चों को कोचिंग सेंटर्स के हवाले कर रही हैं। इस बदलाव ने शिक्षा को बराबरी का अधिकार देने के बजाय सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का आईना बना दिया है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) समान और सुलभ शिक्षा का सपना दिखाती है, लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि वह सपना अभी दूर है।
शिक्षा अब सिर्फ ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि समाज में आर्थिक स्थिति का प्रतीक बनती जा रही है।

 

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