महान योद्धा गबर सिंह नेगी : विदेशी इतिहासकारों की दृष्टि में
–शीशपाल गुसाईं –
भारत के सैन्य इतिहास में अनेक वीरों की गाथाएँ दर्ज हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय की सीमाओं से परे जाकर राष्ट्र की स्मृति में स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं। उत्तराखंड की वीरभूमि गढ़वाल से निकले गबर सिंह नेगी ऐसे ही अमर योद्धाओं में गिने जाते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस की धरती पर लड़ी गई एक भीषण लड़ाई में उन्होंने जिस अदम्य साहस और नेतृत्व का परिचय दिया, उसने उन्हें विश्व के सर्वोच्च सैन्य सम्मान Victoria Cross से अलंकृत कराया।
आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धा और गर्व के साथ याद करता है।
हिमालय की गोद से रणभूमि तक
गबर सिंह नेगी का जन्म टिहरी गढ़वाल जनपद के चम्बा क्षेत्र के एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ था। हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में पले-बढ़े नेगी बचपन से ही साहस, श्रम और अनुशासन के संस्कारों से परिचित थे। उस समय गढ़वाल क्षेत्र के युवाओं में सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने की परंपरा मजबूत थी।
इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए गबर सिंह नेगी ब्रिटिश भारतीय सेना की 2nd Battalion, 39th Garhwal Rifles में राइफलमैन के रूप में भर्ती हुए। यह वह दौर था जब प्रथम विश्व युद्ध अपने चरम पर था और ब्रिटिश भारतीय सेना के हजारों सैनिक यूरोप, मध्य-पूर्व और अन्य युद्ध मोर्चों पर लड़ रहे थे।
प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय सैनिक
1914 में आरम्भ हुए प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी। फ्रांस और बेल्जियम के युद्धक्षेत्रों में भारतीय सैनिकों की बहादुरी ने मित्र राष्ट्रों को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की।
युद्ध की प्रकृति अत्यंत कठोर और जटिल थी। सैनिकों को अक्सर खाइयों (Trench Warfare) में रहकर लड़ाई लड़नी पड़ती थी। जर्मन सेना कंटीले तारों, मशीनगनों और मजबूत खाइयों से सुरक्षित थी। इन खाइयों पर कब्ज़ा करना किसी भी सेना के लिए अत्यंत जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण कार्य था।
Neuve Chapelle की निर्णायक लड़ाई
10 मार्च 1915 को फ्रांस में हुई ऐतिहासिक Battle of Neuve Chapelle प्रथम विश्व युद्ध की एक महत्वपूर्ण लड़ाई थी। मित्र राष्ट्रों की सेना ने जर्मन मोर्चों को तोड़ने के लिए एक बड़े हमले की योजना बनाई। इस अभियान में गढ़वाल राइफल्स की टुकड़ी को जर्मन अग्रिम खाइयों पर कब्ज़ा करने का कठिन कार्य सौंपा गया।
हमला शुरू होते ही गोलियों और बमों की भीषण वर्षा होने लगी। जर्मन मशीनगनों से लगातार गोलियां बरस रही थीं और कंटीले तारों के कारण आगे बढ़ना बेहद कठिन हो रहा था। ऐसे खतरनाक वातावरण में भी गबर सिंह नेगी पीछे नहीं हटे।
वे अपनी टुकड़ी के साथ सबसे आगे बढ़े और हाथों में ग्रेनेड तथा राइफल पर लगे बेयोनेट के सहारे दुश्मन की खाई की ओर तेजी से बढ़े। जब उनके साथियों पर गोलियों की बौछार होने लगी, तब भी उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए जर्मन खाई पर सीधा धावा बोल दिया।
अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान
युद्ध के उस निर्णायक क्षण में गबर सिंह नेगी ने अपने साथियों को आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया। उन्होंने दुश्मन की खाई में घुसकर कई जर्मन सैनिकों को परास्त किया और भारतीय सैनिकों के लिए रास्ता साफ कर दिया।
हालांकि यह संघर्ष अत्यंत भीषण था और इसी दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन उनका साहस और नेतृत्व इतना प्रभावशाली था कि उनकी टुकड़ी दुश्मन की खाई पर कब्ज़ा करने में सफल रही।
गबर सिंह नेगी का यह बलिदान भारतीय सैनिकों की वीरता का प्रतीक बन गया। उनके अद्भुत साहस को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च सैन्य सम्मान Victoria Cross प्रदान किया गया।
विदेशी इतिहासकारों की दृष्टि में नेगी
गबर सिंह नेगी की वीरता का उल्लेख कई विदेशी सैन्य इतिहासकारों और लेखकों ने अपनी पुस्तकों में किया है।
इतिहासकार Peter F. Batchelor और Christopher Matson की पुस्तक “The Western Front 1915 – VCs of the First World War” में लिखा गया है कि गबर सिंह नेगी ने जर्मन खाई पर हमला करते समय सबसे आगे बढ़कर नेतृत्व किया और अपने साथियों को आगे बढ़ने का मार्ग दिया।
ब्रिटेन के लेखक Michael Ashcroft ने अपनी पुस्तक “Victoria Cross Heroes” में नेगी को प्रथम विश्व युद्ध के उन सैनिकों में शामिल किया है जिन्होंने असाधारण व्यक्तिगत साहस का परिचय दिया।
इतिहासकार David Omissi द्वारा संपादित पुस्तक “Indian Voices of the Great War (1914–1918)” में भारतीय सैनिकों की वीरता का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि गबर सिंह नेगी जैसे सैनिकों ने यूरोप के युद्ध मोर्चों पर भारतीय सेना की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
सैन्य इतिहासकार Ian Sumner ने अपनी पुस्तक “The Indian Army 1914–1947” में भी गढ़वाल राइफल्स के इस युवा सैनिक के साहस का उल्लेख किया है। वहीं इतिहासकार George Morton-Jack ने “India and the Great War” में लिखा है कि हिमालय के गांवों से आए भारतीय सैनिकों ने यूरोप में असाधारण साहस दिखाया और गबर सिंह नेगी इसका उल्लेखनीय उदाहरण हैं।
स्मृति और सम्मान
आज भी गढ़वाल राइफल्स और उत्तराखंड के लोगों के लिए गबर सिंह नेगी साहस और बलिदान के प्रतीक हैं। हर वर्ष उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और युवा पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया जाता है।
उनकी वीरता इस बात का प्रमाण है कि साहस और कर्तव्यनिष्ठा किसी भी साधारण व्यक्ति को असाधारण बना सकती है।
गबर सिंह नेगी का जीवन केवल एक सैनिक की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस अदम्य आत्मबल की कहानी है जो हिमालय की धरती से जन्म लेता है। एक साधारण ग्रामीण युवक ने अपने साहस और बलिदान से विश्व इतिहास में अमर स्थान प्राप्त किया।
आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करता है और यह संकल्प दोहराता है कि ऐसे वीरों की गाथाएँ आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी। गबर सिंह नेगी की वीरता हमें यह याद दिलाती है कि राष्ट्र की रक्षा और सम्मान के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता—वह इतिहास के पन्नों में अमर हो जाता है।
