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संविधान का  वह अंतिम अनुच्छेद जिसने की नए भारत की नयी शुरुआत 

जयसिंह रावत

भारत के संविधान पर चर्चा तो बहुत हो रही है, लेकिन हमारे संविधान के उस अंतिम अनुच्छेद 395 पर कोई चर्चा नहीं, जिसने न केवल भारत की सदियों पुरानी गुलामी के प्रावधानों को पलट दिया, बल्कि एक सम्प्रभुता सम्पन्न धर्म निरपेक्ष समाजवादी गणराज्य के शासन की नीव भी रख दी। इसमें दो राय कैसे हो सकती है कि भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया था। लेकिन असली आजादी तो तभी मानी जायेगी जब भारत अंग्रेजों के बनाये संविधान और और अन्य कानूनी प्रावधानों से मुक्त हो जाय। 26 जनवरी 1950 तक भारत की शासन व्यवस्था 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अनुसार तथा स्वतंत्रता की औपचारिकताएं भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार चल रहीं थी।

15 अगस्त 1947 को भारत उपनिवेश का हुआ था जन्म

ब्रिटिश संसद द्वारा पारित एवं सम्राट किंग जॉर्ज पंचम द्वारा 18 जुलाइ 1947 को अनुमोदित भारत स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार भारत 15 अगसत 1947 को भारत और उससे एक दिन पहले पाकिस्तान नाम के उपनिवेशों का जन्म हुआ था। उस ऐतिहासिक तिथि को भारत की सत्ता अवश्य ही भारतवासियों के हाथों में आ गयी थी। लेकिन शासन चलाने के लिये संविधान के तौर पर भारत सरकार अधिनियम 1935 ही उस समय मौजूद था। बाकी वैधानिक औपचारिकताएं 1947 के स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार पूरी की जा रही थी। इसीलिये यह एक वास्तविक स्वतंत्र राष्ट्र न हो कर एक उप निवेश ही था। भारत और पाकिस्तान नाम के उपनिवेशों के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में ब्रिटिश सम्राट की ओर से नियुक्त गर्वनर जनरल ही थे। 26 जनवरी 1950 को अंतिम गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी से ही भारत के पहले राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति का पद संभाला था। इस अधिनियम ने भारत और पाकिस्तान नाम के उपनिवेशो को अपने-अपने स्वतंत्र संविधान बनाने की अनुमति दी थी। उस समय परिस्थितियां ऐसी थीे कि भारत के नेताओं को एक स्वतंत्र सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के बजाय दो उपनिवेश ही स्वीकार करने पड़े। शायद यही व्यवहारिक भी था।

अनुच्देद 395 ने दफनाये गुलामी के सारे अवशेष

संविधान निर्माताओं ने संविधान का पूरा ड्राफ्ट तैयार करने के बाद उसमें 395 क्रम का एक ऐसा अंतिम अनुच्छेद रख दिया जिसने सदियों की गुलामी एक झटके में ध्वस्त कर नये सम्प्रभुता सम्पन्न समाजवादी धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के शासन की बुनियाद रख दी। संविधान के  अंत में रखे गये इस अनुच्छेद ने तब तक चल रहे 1935 के भारत सरकार अधिनियम के साथ ही भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 का भी निरसन कर दिया। अनुच्छेद 395 का उद्देश्य उपनिवेशी कानूनों को निरस्त करना था। इसने ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत के नए कानूनी ढांचे को पुष्टि किया। जबकि प्रिवी काउंसिल का अंत पहले ही भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 द्वारा हो चुका था।इसलिए, संविधान में अनुच्छेद 395 में प्रिवी काउंसिल को समाप्त करने का कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया था और अब भारतीय न्यायपालिका का प्रभुत्व स्थापित हो चुका था। भारतीय संविधान ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया और यह स्थापित किया कि अब उच्चतम न्यायालय ही भारत का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण होगा और अब भारतीय न्यायिक प्रणाली पूरी तरह से स्वतंत्र है तथा इसमें विदेशी संस्थाओं का हस्तक्षेप नहीं होगा।

संविधान सभा की चर्चाओं में 395

संविधान सभा की चर्चाओं के दौरान अनुच्छेद 395 पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। इसका उद्देश्य स्वतंत्र भारत के लिए एक पूरी तरह से नया कानूनी ढांचा स्थापित करना था, जो उपनिवेशी अतीत से संबंध तोड़ते हुए उन सभी पुराने कानूनों को समाप्त करता था जो नए संविधान के अनुरूप नहीं थे। चर्चाओं में यह बिंदु प्रमुख था कि पुराने उपनिवेशी कानूनों को समाप्त करना भारत के ब्रिटिश शासन से पूरी तरह से स्वतंत्र होने और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का प्रतीक था। इसके अलावा संविधान सभा के सदस्यों ने एक संयुक्त कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि शासन के विभिन्न पहलुओं से संबंधित कानूनों के बीच भ्रम को समाप्त किया जा सके। डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने इस अनुच्छेद की आवश्यकता और उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए संविधान सभा के अन्य सदस्यों के विचारों का समाधान किया था।

अनुच्छेद 395 का दूरगामी महत्व

इस अनुच्देद का दूरगामी महत्व यह है कि इसने भारत के संवैधानिक ढांचे को पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वायत्त बना दिया। 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी भारतीय समाज और कानूनों में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव को समाप्त करने की आवश्यकता यह न केवल एक कानूनी बदलाव था, बल्कि यह एक प्रतीकात्मक और राजनीतिक कदम भी था जो भारत की संप्रभुता को दर्शाता था। इसके माध्यम से संविधान ने यह संकेत दिया कि भारत अब पूरी तरह से अपने संविधान के तहत एक स्वतंत्र, संप्रभु राष्ट्र बन चुका है। यह ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव को समाप्त करने का एक संवैधानिक और कानूनी तरीका था, और इसके द्वारा भारतीय संविधान को सर्वश्रेष्ठ अधिकार और श्रेष्ठता प्रदान की गई।

 

संविधान सभा का योगदान और अनुच्छेद 395

संविधान सभा ने संविधान की संरचना में विचारशीलता और भविष्य की दृष्टि को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 395 को शामिल किया था। इसका उद्देश्य था कि भारतीय कानूनों का एक नया, पारदर्शी और स्वतंत्र आधार तैयार किया जाए जो न केवल संविधान की शक्ति को स्थापित करे, बल्कि भारतीय राष्ट्रीयता और पहचान को भी मजबूती से परिभाषित करे। संविधान सभा के संकल्प और अनुच्छेद 395 के बीच गहरा संबंध था। जहां संकल्प ने भारतीय संविधान को भारतीय जनता के हक और अधिकार की अभिव्यक्ति माना, वहीं अनुच्छेद 395 ने इसे कानूनी रूप से स्थापित किया। इसने यह सुनिश्चित किया कि भारतीय संविधान का सर्वोच्च स्थान है, और कोई भी पुराना ब्रिटिश कानून, जो भारतीय राज्य के ढांचे में अड़चन डाल सकता था, अब लागू नहीं होगा।

अनुच्छेद 395 और सामाजिक परिवर्तन

अनुच्छेद 395 ने केवल कानूनी बदलावों की बात नहीं की, बल्कि इसने भारतीय समाज में आवश्यक सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों की दिशा भी निर्धारित किया। भारतीय संविधान ने दलितों, महिलाओं, और अन्य पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास किया। अनुच्छेद 395 के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि पुराने उपनिवेशी कानूनों का कोई भी हिस्सा भारतीय समाज की सामाजिक संरचना को बाधित न करे। संविधान सभा ने भारतीय समाज की विविधता और उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक धारा को समझते हुए संविधान तैयार किया था। अनुच्छेद 395 ने इस संविधान के कार्यान्वयन के दौरान यह सुनिश्चित किया कि सामाजिक न्याय, समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांत हर स्तर पर प्रभावी हों।

 

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