कविवर धूमिल से हुई मुलाकात की याद अभी धूमिल नहीं हुई है मेरे मस्तिष्क से

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा –
स्व० सुदामा पाण्डेय धूमिल जी की ख्याति उस समय एक प्रगतिशील कवि के रूप में काफी चर्चा में थी जब १९६९ में मैने उनकी सिर्फ एक झलक बनारस के गोदौलिया चौराहे पर देखी थी, वह रबड़ी- जलेबी की एक मशहूर दुकान से लगे एक पान की दुकान के सामने खड़े दिखाई दिए , तो मेरे साथ मित्र लीलाधर जगूड़ी ने कहा- अरे ये तो धूमिल खड़े हैं , उन्होंने लपक कर उनसे मेरा भी परिचय करवा दिया था। बस वही मेरी पहली और आखिरी मुलाकात थी धूमिल जी से लेकिन मैं उनको पढ़ता रहता था। १९७९ में मरणोपरांत जब उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया तो मैंने मन ही मन खुद से कहा काश! यह उनको जीते -जी मिल गया होता तो कितना अच्छा होता।
आजकल सोशल मीडिया में *जूता प्रकरण* छाया हुआ है तो मुझे उनकी एक बहुपठित और चर्चित कविता * मोचीराम* की याद आई। उसकी चंद पंक्तियां ही शेयर कर रहा हूं , आपने भी जरुर पढ़ी होगी –
“मोचीराम”
रांपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षण-भर टटोला
और फिर
जैसे पतियाए हुए स्वर में
वह हँसते हुए बोला—
बाबूजी सच कहूँ—मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिए खड़ा है।
और असल बात तो यह है
कि वह चाहे जो है
जैसा है, जहाँ कहीं है
आजकल
कोई आदमी जूते की नाप से
बाहर नहीं है।…..
यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं
और आदमी की अलग-अलग ‘नवैयत’
बताते हैं
सबकी अपनी-अपनी शक्ल है
अपनी-अपनी शैली है
मसलन एक जूता है :..
मैं कहना चाहता हूँ
मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है
मैं महसूस करता हूँ—भीतर से
एक आवाज़ आती है—’कैसे आदमी हो
अपनी जाति पर थूकते हो।’…
मुझे हर वक़्त यह ख़्याल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच
कहीं-न-कहीं एक अदद आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं…
जो ज़िंदगी को किताब से नापता है
जो असलियत और अनुभव के बीच
ख़ून के किसी कमज़ात मौके पर कायर है
वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं, शायर है
असल में वह एक दिलचस्प गलतफहमी का
शिकार है
जो यह सोचता कि पेशा एक जाति है
और भाषा पर
आदमी का नहीं, किसी जाति का अधिकार है।”
