गढ़वाल विश्वविद्यालय में छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का सफल समापन

श्रीनगर (गढ़वाल), 22 फरवरी. हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में एम.एम.टी.टी.सी. के तत्वावधान में “पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण” विषय पर 16 फरवरी से 21 फरवरी 2026 तक आयोजित छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का सफल समापन हो गया।
समापन समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ तथा कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। इस अवसर पर एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. देवेंद्र सिंह नेगी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया तथा मुख्य अतिथि प्रो. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ को स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र भेंट कर उनका विशेष आभार व्यक्त किया।
अपने संबोधन में मुख्य अतिथि प्रो. पवन सिन्हा ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आत्मनिर्भरता, सस्टेनेबिलिटी (सतत विकास) और क्षमता निर्माण का वास्तविक आधार हमारी स्वदेशी ज्ञान परंपरा में निहित है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि स्वदेशी तकनीक, जैसे क्रायोजेनिक तकनीक, ने न केवल भारत को वैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाया, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सम्मान दिलाया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कोरोना जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में देशी अनुसंधान एवं तकनीकी क्षमता निर्णायक सिद्ध हुई।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पुनः उपयोग, पर्यावरण संतुलन और जीवन के समग्र विकास की शिक्षा देती है। प्राचीन गुरुकुल पद्धति, पंचकोशीय विकास, स्त्री स्वातंत्र्य, लोकतांत्रिक परंपरा, कौटिल्य के राज्यशास्त्र तथा वेदांत और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक दृष्टि है। शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना नहीं, बल्कि चरित्र, विवेक और राष्ट्रीय चेतना का निर्माण होना चाहिए।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय की शैक्षणिक दृष्टि को सुदृढ़ करते हैं तथा पारंपरिक ज्ञान और समकालीन चिंतन के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज अकादमिक शोध में प्राचीन भारतीय परिप्रेक्ष्य को समझना अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर संकायाध्यक्ष प्रो. मोहन सिंह पंवार, चौरास परिसर निदेशक प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओ.पी. गुसाईं तथा डॉ. अमरजीत परिहार ने प्रतिभागियों को संबोधित किया। यूजीसी के पर्यवेक्षक प्रो. आर.एल. नारायण सिम्हा ने अपना संबोधन संस्कृत भाषा में दिया। अंत में डॉ. राहुल कुंवर ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस कार्यक्रम में 95 शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया, जिन्हें अंतिम दिन प्रमाणपत्र वितरित किए गए।
